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संपादकीयनदारद मुद्दे, निराश मतदाता

शशि शेखरPublished By: Gunateet
Sat, 11 May 2019 10:09 PM
नदारद मुद्दे, निराश मतदाता

भारतीय राजनीति का तिलिस्म अब अपने द्वारा गढे़ गए घटाटोप का शिकार होता जा रहा है। इतिहास की अंधेरी खोह में सड़ते-बजबजाते अद्र्धसत्य अथवा असत्य जब सच की चासनी चुपड़कर परोसे जाएंगे, तो ऐसा ही होगा। नेता सोचते हैं कि नकारात्मक तर्क उनके प्रति सकारात्मक माहौल बनाते हैं, पर वे गलत हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि पश्चिम के तमाम समाजशास्त्री इस बदलते वक्त को ‘पोस्ट ट्रूथ एरा’ पुकारते हैं।

यही वजह है कि भारत सहित विश्व के तमाम तरक्कीपसंद देशों में मतदान प्रतिशत में उतनी बढ़ोतरी नहीं हो रही, जितनी की उम्मीद की जाती है। भारत का चुनाव आयोग अन्य मामलों में भले ही कुछ लोगों को असंतुष्ट करता आया हो, पर उसके आलोचक भी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते कि मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए उसने जी तोड़ कोशिश की। तरह-तरह के आकर्षक अथवा लोकप्रिय चेहरे लगातार जोशीले नारे लगाते रहे, पर नतीजा? 2014 में 66.44 फीसदी मतदान के मुकाबले अभी तक औसत मतदान में खास बढ़ोतरी नहीं देखी गई है। पुरजवान 21वीं शताब्दी के भारत से इससे कहीं ज्यादा की उम्मीद थी। इससे ‘हाई’ जोश तो आजाद भारत के पहले आम चुनाव में देखा गया था। 1951-52 में 61.16 फीसदी लोगों ने मतदान का प्रयोग किया था। तब रैलियों और सीमित प्रसार संख्या के अखबारों के अलावा प्रचार के लिए गांव-गांव मुनादी का इस्तेमाल किया जाता था। यातायात के साधन नहीं थे और मतदाताओं को मीलों पैदल चलकर अपने अधिकार का उपयोग करना पड़ता था। क्या तब के वोटर को अपना जोश ‘हाई’ करने के लिए उरी  जैसी किसी फिल्म की जरूरत नहीं महसूस होती थी? कुदरती उत्साह और प्रायोजित तरंग में अंतर तो होगा ही।

जाहिर है, शोर-शराबे में डूबता-उतराता हमारा लोकतंत्र सही और सार्थक रास्ते पर नहीं चल रहा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण दक्षिण मुंबई है। वैभव, विलासिता और अपने ‘अप-मार्केट ऐटीट्यूड’ के लिए पहचाने जाने वाले इस इलाके में महज 52.15 फीसदी मतदान हुआ। यहां इस सदी में जन्मे वे लोग भी खासी तादाद में हैं, जिन्हें ‘मिलेनियल’ कहा जाता है, जिन्हें पहली बार मतदान का हक-हुकूक हासिल हुआ था, पर उन्होंने उत्साह नहीं दिखाया। हमारे राजनेता सोचते क्यों नहीं कि उनके भाषण नई उम्र की नई फसल के लिए आकर्षण विहीन साबित हो रहे हैं। 

सिर्फ ‘मिलेनियल’ क्यों? मौजूदा राजनीतिक रुख-रवैये के प्रति सभी संवेदनशील वर्गों की असहजता बढ़ती जा रही है। यह ठीक है कि हमारे लोग धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर बंटे हुए दिखाई पड़ते हैं, मगर यह भी सच है कि जब भी किसी राजनेता अथवा सामाजिक अग्रदूत में हिन्दुस्तानियों को उम्मीद की किरण नजर आती है, तो वे उसकी ओर खिंचे चले आते हैं। बहुत दूर क्यों जाएं, सन 2011 में अन्ना हजारे ने जब दिल्ली में अनशन शुरू किया था, तो सिर्फ देश की तरुणाई नहीं, बल्कि हर उम्र और हर वर्ग के लोग उमड़ पड़े थे। जो दिल्ली पहुंच सकते थे, वे यहां आ जुटे थे। जो नहीं आ सके, उन्होंने अपने-अपने शहरों में प्रतीकात्मक उपवास, धरने और प्रदर्शन आयोजित किए। 

2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी उसी परिवर्तन कामना पर सवार होकर अहमदाबाद से निकले थे। यही नहीं, दूसरी धारा के अरविंद केजरीवाल भी ऐसे ही ज्वार पर सवार थे। दोनों ही अलग-अलग सत्ता सदनों में दाखिल हुए और अब न केवल ये दोनों, बल्कि सभी दल और शख्सियतें हमारे समक्ष हैं। 2019 के आम चुनाव के परिणाम जो भी आएं, पर जन-भागीदारी के हिसाब से इसे बहुत अच्छा नहीं माना जाएगा। 

अनंत कोलाहल में गोते लगाता आम आदमी अगर बेरुखी नहीं दिखा रहा है, तो उसमें कोई खास उत्साह भी नहीं दीख रहा। आप याद करें, जम्मू-कश्मीर से एक वीडियो वायरल हुआ था। पहले चरण के मतदान के दौरान एक शख्स मतदान केंद्र पर डांस कर रहा था। अति उम्मीदवानों ने इसे लोकतंत्र के उत्साह, उछाह और न जाने किन-किन विशेषणों से नवाज दिया था, पर अगले चरण से ही घाटी में मतदान फीका पड़ता गया। वहां अब तक 2.5 फीसदी की गिरावट दर्ज हो चुकी है। क्या यह वर्तमान परिस्थितियों के प्रति निराशा का प्रतीक नहीं है? घाटी को छोड़ भी दें, तब भी तय है कि मतदाता पिछले चुनाव की तरह मुखर नहीं है। क्या इसका एक बड़ा कारण यह नहीं है कि पिछले तीन सालों के दौरान हमने जिन मुद्दों पर बडे़ आंदोलन देखे थे, वे इस बार नेताओं के धुआंधार भाषणों से पूरी तरह गायब हैं? 

सवाल उठता है कि नरमुंडों की माला पहने हुए वे किसान कहां चले गए, जो जंतर-मंतर पर लंबे समय तक विलाप करते हुए दिखाई पड़ते थे? उन्होंने कभी घास खाकर, तो कभी स्वमूत्र पीकर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां लूट ली थीं। बेरोजगारी के ऊपर भाषण देकर चमके हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी जैसे नेता चर्चा से गायब क्यों हैं? छीजती हुई नदियों के किनारे गड्ढे खोदकर पानी जमा करती महिलाओं के फोटो भी नदारद हैं। वे अवकाश प्राप्त सैनिक और उनके अफसरान किधर बिला गए, जो जंतर-मंतर पर अपने सीने पर शौर्य के प्रतीक टांककर पुलिस द्वारा धकियाए 
गए थे? सामाजिक आंदोलनों की नियति यही है। राज्य के पोषण के बिना वे लंबे समय तक खुद को नहीं खींच पाते। रही बात राज्य की, तो उसे राजनीति हांकती है।

यही वजह है कि मौजूदा चुनाव कोलाहल तो रच रहा है, पर मुद्दों के सार्थक और सटीक हल के वांछित विकल्प नहीं सुझा रहा। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

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