DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

एक सिला, जो सिलसिला बन गया

shashi shekhar

कभी सुना था, वर्तमान अगर आंखें चुराता नजर आए, तो अतीत में झांकिए। आपको तमाम समस्याओं के हल आस-पास डुबकियां लगाते नजर आएंगे। वैचारिक संशय के इस युग में यह और आवश्यक हो गया है, पर क्या आने वाली नस्लों के लिए हम नए प्रतिमान गढ़ रहे हैं? इस मामले में पौराणिक चरित्र भाग्यशाली थे। उनके आकलन के पैमाने और प्रतीक पारदर्शी थे। 

जरा सोचिए, अगर महाभारत काल में ‘सोशल मीडिया’ होता, तो यह अजर-अमर महाकाव्य क्या आकार ले पाता? महर्षि व्यास के सामने इतने अलग-अलग अर्थों वाली कथाएं होतीं कि वे भ्रम में पड़ गए होते। मसलन, गांधारी ने जब धृतराष्ट्र को देखने के बाद यह निर्णय किया कि वे अपनी आंखों पर आजन्म पट्टी बांधे रहेंगी, तो नारीवादियों का एक धड़ा इसे नारी की अस्मिता और अस्तित्व का अपमान करार दे देता। कुछ परंपरावादी गांधारी की भावना को सर्वोच्च दर्जा प्रदान कर रहे होते, तो कुछ की नजर में यह निरा पाखंड होता। यह संभव है कि गांधार के लोग हस्तिनापुर के राजवंश के साथ-साथ उसकी जनता से भी खफा हो गए होते। इधर, हस्तिनापुर जवाबी अभियान में राष्ट्रीय अस्मिता का राग गा रहा होता। 

सिर्फ यही नहीं, द्रोणाचार्य के आश्रम में एकलव्य के साथ हुए कांड को जाति, वर्ग और संप्रदाय के खानों में बांटकर इतना हो-हल्ला मचाया जाता कि शायद समूचे भू-भाग में महाभारत से पहले ही दंगे भड़क गए होते। यही हश्र कर्ण के साथ घटी घटनाओं का भी होता। और तो और, स्वयंवर के बाद सिर्फ अर्जुन की बजाय पांच पतियों का वरण करने वाली द्रौपदी पांचाल और हस्तिनापुर के बीच एक पासे की तरह प्रयोग होतीं। पांडवों ने तब शायद उन्हें चौसर के खेल में नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के संग्राम में हारा होता! 

इन हालात में महाभारत या तो बहुत पहले हो गया होता या फिर एक अंतहीन लड़ाई में तब्दील हो जाता।
 
ये सब कुछ सैकड़ों साल पहले घटा। अगर 30-40 साल पहले के घटनाक्रम पर भी नजर डालें, तो आपको सोशल मीडिया से पहले और बाद के समय का फर्क साफ नजर आ जाएगा। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की बात करता हूं। उस दौरान जो कुछ हुआ, उसके इतने झूठे-सच्चे ऑडियो, वीडियो अथवा आलेख सामने आ जाते कि समाज का एक तबका स्थायी क्रोध का शिकार हो गया होता। बाद में, इंदिरा गांधी की हत्या और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद समूचे देश में दंगे हुए। अगर उनके वीडियो वायरल होते, तो आनेवाली शताब्दियों की तरुणाई सिर्फ खौलते खून के उबाल का प्रतीक बन गई होती। यकीन न हो, तो आप अलकायदा अथवा आईएस की प्रचार रणनीति पर एक बार गौर जरूर फरमाइए। पूरी दुनिया में मुसलमानों पर हो रहे तथाकथित अत्याचार, अतीत की अपने तरीके से की गई व्याख्या और भविष्य के झूठे सपनों ने अब तक हजारों नौजवानों की बलि ले ली है। सोशल मीडिया की सहायता से अमन के नाम पर जिस तरह समूची दुनिया को खतरे में डाल दिया गया है, उस पर आने वाली नस्लों को यकीनन आश्चर्य होगा।

मैं आज आपको अतीत की इस यात्रा पर इसीलिए ले चला, क्योंकि पिछले कुछ साल में हमारे देश में भी इसी तरह का जहर बोने की कोशिश हुई है। अखलाक से लेकर अंकित तक तरह-तरह की कथाएं प्रचारित की गईं। यह वो समय है, जब मौत पर शोक व्यक्त करने की बजाय उसे एक मौके के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। अखलाक का उदाहरण लें। दिल्ली के पास स्थित दादरी कस्बे में रहने वाले इस शख्स की गोमांस रखने के आरोप में हत्या कर दी गई थी। उसके बाद किस तरह से ‘बुद्धिजीवियों’ से लेकर ‘फिरकापरस्तों’ तक की ओर से तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। ऐसा लगा, जैसे समूचा देश विचार और प्रचार युद्ध की लपेट में आ गया है। इन गला फाड़कर चिल्लाने वालों से कोई पूछे कि क्या उन्हें मालूम है, आज अखलाक का परिवार कहां है? वह अपना घर छोड़कर जा चुके हैं। हत्या के आरोपी जमानत पर बाहर हैं और पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। इंसाफ अपनी मशहूर कछुआ गति से कितने बरस में रास्ता तय करेगा, कोई नहीं जानता।

हंगामा मचाने वालों से कोई तो पूछे कि उन्होंने अखलाक के घर वालों को ‘घर’ से जुदा न होने देने के लिए क्या किया? मुझे डर है कि अंकित की अकाल मौत भी कल इसी हश्र को न हासिल हो जाए! 

ऐसा नहीं है कि हमारे देश में महज सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है। जातीय और क्षेत्रीय नफरतों की फसल से नाम और दाम कमाना चलन का आकार ले रहा है। पद्मावत  पर जो हंगामा खड़ा किया गया, वह सिहराता है। बिना फिल्म देखे कुछ लोगों ने जातीय अपमान का आलाप करना शुरू किया और वह आधे से अधिक भारत को दहकाने लगा। बाद में करणी सेना के कर्णधारों ने यू टर्न लेते हुए फिल्म को ‘अपमान’ नहीं, ‘गौरव’ का विषय करार दे दिया। अब कंगना रनौत की मणिकर्णिका : झांसी की रानी  को विवादों का शिकार बनाने की कोशिश की जा रही है। 125 करोड़ की ताकतवर आबादी वाला देश मुट्ठीभर शोशेबाजों का रह-रहकर बंधक क्यों बन जाता है? क्या इससे देश की प्रगति और उसके लिए जारी प्रयास नेपथ्य में नहीं चले जाते?

सोशल मीडिया पर रौद्र रूप धारण करने वाले कृपया ध्यान रखें कि इस दुनिया में असली और नकली का फर्क मिट गया है। फेसबुक ने खुद माना है कि उसके दो करोड़ ‘यूजर’ नकली हैं। उसके पास इसका कोई डाटा नहीं है कि असली भी कितने असली हैं। कुछ ‘कंप्यूटर्स’ के सहारे जब ‘ट्रोलर्स’ की फौज खड़ी की जा सकती हो और खुफिया एजेंसियां दूसरे देशों को अस्थिर करने के लिए इस ‘टूल’ का प्रयोग कर रही हों, तो क्या हमें सजग नहीं हो जाना चाहिए? हमें यह भी समझना होगा कि हर देश की अपनी अलग संवेदनाएं और ऐतिहासिक समझ है। हम अगर उनका सम्मान नहीं करेंगे, तो यकीनन इतिहास की वह ‘गर्त’ हमारा इंतजार कर रही होगी, जहां बर्बाद सभ्यताएं दफन हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि सिंधु, सुमेर, दजला और फरात घाटी की सभ्यताएं खत्म क्यों हो गईं? कुछ को प्राकृतिक आपदाओं ने मारा, तो कुछ को वैचारिक अंधेपन ने समाप्त कर दिया। 

यह सौभाग्य की बात है कि हमारे पूर्वजों की रौशनख्याली ने न केवल उन्हें बचाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीने-रहने का इंतजाम किया। अफसोस, हम इस नेक परंपरा को मजबूत करने की जगह, उसे तबाह करने पर तुले हैं।

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें
shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 11 February