DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

त्वरित टिप्पणी: भाजपा का अश्वमेध और कांग्रेस की बढ़ती चुनौतियां

शशि शेखर

नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में शनिवार की दोपहर एक मानिंद शख्स ने पूछा कि क्या आपको उम्मीद थी कि त्रिपुरा में ऐसे चुनाव  परिणाम आएंगे? मैंने स्वीकार किया- ‘यह तो लगता था कि भारतीय जनता पार्टी बहुत अच्छा प्रदर्शन करेगी पर ऐसे नतीजे आएंगे, इसकी उम्मीद किसी को न थी।’
 
साथ बैठे एक बड़े उद्योगपति ने कहा कि मैं ‘नॉर्थ-ईस्ट’ को जानता हूं। वहां भाजपा की ऐसी लहर चमत्कार से कम नहीं। भोजन की टेबल पर यह दिल्ली के उस भद्रलोक की बातचीत थी, जो राजधानी के ‘लुटियंस जोन’ में रहकर समूचे देश का नसीब बांचने और बनाने का दंभ भरता है। वे बातचीत में मशगूल थे पर मेरी आंखों के सामने सवेरे टी.वी. पर देखा एक दृश्य घूम रहा था। टेलीविजन एंकर का माइक पकड़कर एक महिला बेहद विह्वल भाव से कह रही थी- ‘हम आजाद हो गए, हम आजाद हो गए।’ यह था 25 वर्ष लंबे वाम-शासन का हश्र!
 
त्रिपुरा और अन्य दो राज्यों के नतीजों ने फिर साबित कर दिया है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के रूप में भारतीय जनता पार्टी को ऐसी चुनाव-मशीन  हासिल हो गई है, जिसमें विपक्षियों को ‘बुलडोज’ करने की अद्भुत क्षमता है।
 
बताने की जरूरत नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में स्वयं को प्रस्तुत करने की असीमित सामर्थ्य है। वे जो कहते हैं, इतनी शिद्दत से कहते हैं कि लोग उन पर भरोसा करने को विवश हो जाते हैं। लगभग चार साल पहले जब उन्होंने सत्ता संभाली थी, तो विपक्षियों को खुशफहमी थी कि लंबे-चौड़े चुनावी वायदों और मतदाताओं की अपार उम्मीदों का बोझ उनकी छवि पर बहुत जल्द प्रतिकूल असर डालेगा। इससे पहले 1984 में 404 सीटें जीतने वाले राजीव गांधी और 1971 में 352 सीट जीतकर सत्तासीन हुई इंदिरा गांधी इसी ‘सिंड्रोम’ का शिकार हुई थीं। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनावों ने साबित कर दिया है कि नरेंद्र मोदी इस सियासी छूत से खुद को बचाने में कामयाब रहे हैं।
 
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्होंने सत्ता चलाने के लिए ऐसी कोई कोटरी नहीं बनाई जो उनके नाम का दुरुपयोग कर सके। इसीलिए उनके ऊपर भ्रष्टाचार या पक्षपात के असरकारी आरोप नहीं लगते। इसके साथ ही उन्होंने आम आदमी तक यह संदेश पहुंचाने में कामयाबी हासिल की है कि वे सप्ताह के सातों दिन सिर्फ काम करते रहते हैं। मोदी की बेदाग और कर्मठ छवि इसी की उपज है और आम आदमी के भरोसा की नीव भी कि वे गरीबों के हितचिंतक हैं। इसी के चलते समाजवादियों और वामपंथियों का जो एकाधिकार गरीब-गुरबों पर हुआ करता था, उसे वे छीनने में कामयाब रहे हैं।
 
नरेंद्र मोदी ठहराव के खिलाफ हैं। लिहाजा अब वे अपनी छवि को नया रूप देने में जुटे हैं। इसकी बानगी शनिवार की शाम फिर देखने को मिली। भाजपा मुख्यालय में जीत के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह को उन्होंने संबोधित करना शुरू ही किया था कि पास की मस्जिद में अजान शुरू हो गई। उन्होंने कहा कि अजान खत्म होने तक दो मिनट के लिए मौन रहते हैं। उस समय वे टी.वी. पर ‘लाइव’ थे। मोदी जानते हैं कि उनके मुंह से निकली यह बात यकीनन दूर तलक जाएगी।
 
नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का लाभ उठाने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुआई में पेशेवरों का एक दल साल में 365 दिन जनरुचि के मुद्दों को तलाशता है और उनकी बारीकी से समीक्षा करता रहता है। उसी के आधार पर चुनावी रणनीति तय होती है। शाह प्रत्याशियों के चयन में भी बेमुरव्वत हैं। वे उन्हीं को पार्टी का चिह्न आवंटित करते हैं, जिनमें जीतने की क्षमता हो। इस मामले में किसी नेता की सिफारिश नहीं सुनी जाती। भाजपा अध्यक्ष जानते हैं कि अगर हार का ठीकरा उनके सिर फूटना है, तो फिर जीत के लिए उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय करने का हक है।
 
बात यहीं खत्म नहीं होती। शाह की टीम बूथ कार्यकर्ताओं पर भी जबरदस्त काम करती है। एक वोटर लिस्ट में जितने पन्ने होते हैं, उनमें से हरेक में दर्ज मतदाताओं को साधने के लिए एक ‘पन्ना प्रमुख’ बनाया जाता है। जो लोग त्रिपुरा के चुनावी फैसलों से अचंभित हैं, उन्हें बता दूं कि वहां हर साठ वोटर पर एक ‘पन्ना प्रमुख’ था। इसके अलावा विपक्ष की संभावित रणनीति, हर नई चाल की काट और किसी भी अप्रत्याशित हमले से निपटने के लिए अलग टीमें होती हैं।
 
एक और बात। मोदी और शाह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से खासा सामंजस्य बना रखा है। पूर्वोत्तर की सफलता में संघ की बरसों की मेहनत का खासा योगदान है। कर्नाटक में भी संघ ने महीनों पहले से अपने कार्यकर्ता झोंक रखे हैं। यह मोदी-शाह की जोड़ी को मिलने वाला ऐसा लाभ है, जिसकी काट विपक्ष के पास नहीं। इसीलिए आज देश में 29 पूर्ण राज्यों में से 20 राज्यों में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए की हुकूमत है। इसके बरक्स कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए सिर्फ तीन राज्यों में सत्ता में है।

हालांकि , यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि तमाम राज्यों में भाजपा और उसके गठबंधन की सरकारें  भगवा कैडर पर नहीं बल्कि दल-बदलुओं पर टिकी हैं। पूर्वोत्तर भी इसका अपवाद नहीं है।
 
ध्यान दिला दूं। त्रिपुरा के चुनावों के दौरान एक और शख्सियत आश्चर्यजनक तौर पर उभरी, वे हैं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। उनकी सभाओं में जिस तरह से भीड़ जुटी, वह आश्चर्यजनक है। यह ठीक है कि सीमावर्ती राज्य में नाथ संप्रदाय के लोग बहुत बड़ी तादाद में हैं पर योगी अन्य राज्यों में भी हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय के तौर पर उभर रहे हैं। कर्नाटक में उन्होंने प्रचार शुरू करते हुए उसे हनुमान जी की जन्मभूमि करार दे दिया। वहां आगे भी उनका उपयोग किया जाने वाला है।
 
मतलब साफ है- विकास, आम आदमी का विश्वास और हिंदुत्व की इस कॉकटेल का जवाब फिलहाल विपक्ष के पास नहीं।  त्रिपुरा के नतीजों ने वामदलों के भविष्य पर सवाल खड़ा कर दिया है। अब उनके पास महज केरल बचा है। 

कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए यह समय चुनौती भरा है। कर्नाटक में उनके सामने ‘करो या मरो’ की स्थिति है। उन्हें अब चिंतन के बजाय कठोर फैसले लेने ही होंगे। शायद इसीलिए उन्होंने अपनी रणनीति में कुछ बदलाव किये हैं। मसलन, मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के बावजूद कांग्रेस बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर है। मणिपुर और गोवा की तरह भाजपा इस राज्य की सत्ता भी न गटक ले इसलिए उन्होंने अपने दो सबसे चतुर सिपहसालारों- अहमद पटेल और कमल नाथ को शिलांग में तैनात कर दिया है। पार्टी को ऐसे और हरावल दस्ते बनाने होंगे।
 
कर्नाटक में वे सिद्धारमैया को खुद से अधिक तरजीह दे रहे हैं। यह एक सही रणनीति है क्योंकि राजस्थान में उन्होंने नौजवान नेता सचिन पायलट को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने का जो फैसला किया था उसके नतीजे पिछले उपचुनावों में देखने को मिले। क्यों न वे नये-पुरानों के बीच तालमेल बैठाते हुए राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अभी से अपने मुख्यमंत्रियों के नाम घोषित कर दें? उनके सामने जमीनी लड़ाई लड़ने वाले शाह और मुद्दों की ‘कारपेट बाम्बिंग’ करने वाले मोदी मौजूद हैं। ऐसे में उन्हें भी अभी से युवा नेताओं को प्रदेश स्तर पर कमान सौंपनी चाहिए, जिससे वे जमीन पर काम कर सकेंगे और ‘कारपेट बाम्बिंग’ के प्रत्युत्तर के लिए राहुल खुद को मुक्त महसूस करें। गुजरात चुनाव के बाद मतदाता उन्हें गंभीरता से लेने लगे हैं। वे चाहें तो आगे इस इमेज को और दमदार बना सकते हैं।
 
रही बात पूर्वोत्तर के झटके की तो अब, जब हर कुछ महीने में चुनाव होते हैं, पुरानी सनसनाहटें भला कब तक कायम रहेंगी? इन फैसलों ने गुजरात और उपचुनावों का खुमार उतार दिया है। सियासी गली के अगले मोड़ पर कर्नाटक भाजपा और कांग्रेस के साथ राजनीति में स्वाभाविक रुचि रखने वाले हिंदुस्तानियों की प्रतीक्षा कर रहा है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Shashi Shekhar article on tripura meghalaya nagaland election results