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अब नारी की बारी

Hindustan Editor Shashi Shekhar

आपको सात साल पहले ले चलता हूं। सन् 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव प्रदेशवासियों के दिल-ओ-दिमाग पर दस्तक दे रहे थे। इसके साथ ही ‘हिन्दुस्तान’ कार्यालय में हमारे वरिष्ठतम सहयोगी इस सवाल से जूझ रहे थे कि चुनाव आते और चले जाते हैं, पर इसका देश के सर्वाधिक आबादी वाले सूबे की प्रगति पर वांछित असर क्यों नहीं पड़ता। एक जिम्मेदार अखबार होने के नाते हमें हरदम लगता है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव ‘चुनाव’ में जनता की भागीदारी ही तमाम समस्याओं का समाधान है। इसी वैचारिक कशमकश के दौरान विचार कौंधा कि क्यों न हम जन-भागीदारी के लिए एक बड़ा वैचारिक आंदोलन आरंभ करें और वहीं से ‘आओ राजनीति करें’ ने आकार लेना शुरू किया। आपको याद होगा कि उस दौरान हमने सवा करोड़ से अधिक लोगों को मतदाता पंजीकरण और फिर अपने मताधिकार का सदुपयोग करने के लिए प्रेरित किया था। अखबारों की दुनिया में यह एक सार्थक प्रयोग साबित हुआ।
 

इसके बाद लोकसभा, विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं और स्थानीय निकाय चुनावों में आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ ने ‘आओ राजनीति करें’ अभियान को विभिन्न पहलुओं के साथ आपके सामने रखा। यह आपका अविरल सहयोग था कि हिंदी पट्टी के हमारे राज्य लगातार मतदाता पंजीकरण और मतदान, दोनों में बेहतर से बेहतरीन भूमिका अदा करते रहे। चुनाव आयोग ने भी लगातार दो बार भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘हिन्दुस्तान’ को सम्मानित करवाया। अब, जब आम चुनाव सामने हैं, तब हम अपने इस परिवर्तनकामी आंदोलन को नई थीम के साथ लेकर आपके सम्मुख उपस्थित हैं। इस बार का विषय है- ‘अब नारी की बारी’।
 

सवाल उठता है, ‘हिन्दुस्तान’ ने यह विषय क्यों चुना? मैं आपको आंकड़ों की भूलभुलैया में नहीं भटकाना चाहता पर पिछले साल का एक शोध  गमगीन करने वाले तथ्य उजागर करता है। हमारे देश में हर वर्ष 2.39 लाख बच्चियां पांच वर्ष तक की उम्र भी नहीं पातीं। लैंगिक भेदभाव उन्हें शिकार बना लेता है। जो इस चक्रव्यूह को भेदने में सक्षम साबित होती हैं, उनका भी यह अभिशाप पीछा नहीं छोड़ता। 2011 की जनगणना के अनुसार महिलाओं में साक्षरता दर विश्व औसत से कम यानी 65.46 फीसदी है। भारत में 63.5 प्रतिशत बच्चियां किशोरावस्था में ही स्कूल छोड़ देती हैं, सुरक्षा को लेकर्र ंचताएं, छेड़छाड़ की घटनाएं और स्कूलों में सुविधाओं की कमी इसकी मुख्य वजह है। यही वजह है कि  भारतीय कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 27 फीसदी के करीब है। क्या-क्या गिनाऊं? बर्बादी के आंकड़े अनन्त हैं और व्यथा कथाएं भी। सवाल उठना लाजिमी है कि कोई लोकतंत्र आधी आबादी के सम्मान के बिना खुद को सच्चा और सफल कैसे कह सकता है? हमारा यह प्रयास देश की उन महिलाओं के उत्थान को समर्पित है, जिन्हें आवश्यक अवसरों की जरूरत है। भरोसा है, हमेशा की तरह आपका साथ सम्बल बना रहेगा।

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