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2018 के पदचिह्न और प्रश्न

शशि शेखर

आप अगर गुजरते 2018 के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर नजर डालें, तो पाएंगे कि इस साल ने सभी को कुछ दिया और सभी से कुछ लिया। संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र की यही खूबी है कि वह अपनी विविधताओं और विरूपताओं के साथ झूमता हुआ आगे बढ़ता जाता है। उसकी गतिविधियों का पूर्व आकलन असंभव है।

भरोसा न हो, तो 2018 के पहले महीने पर नजर डालकर देखिए। शुरुआत जनवरी में अजमेर और अलवर में लोकसभा के उप-चुनावों से हुई। कुछ ही महीने पहले अलवर में तथाकथित गोरक्षकों ने पहलू खान को सड़क पर पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था। सियासी फिजा में सवाल गूंज रहा था कि इसका चुनाव पर क्या असर पड़ेगा? परिणाम चौंकाने वाले थे। दोनों सीटें कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भाजपा से भारी मार्जिन से छीन ली थीं। 

इससे सोशल मीडिया के सूरमाओं को बहस का मुद्दा मिल गया। वे सवाल उछालने लगे, क्या केंद्र सरकार की उलटी गिनती शुरू हो गई है? अब तक हुए लोकसभा के ज्यादातर उप-चुनावों में एनडीए को मुंह की खानी पड़ी है। अलवर और अजमेर इस सिलसिले की अगर अगली कड़ी हैं, तो 2019 तक क्या यह कारवां बढ़ता जाएगा? तर्कों का यह गुब्बारा महीने भर में फुस्स हो गया। फरवरी में भारतीय जनता पार्टी ने त्रिपुरा में वामदलों का 25 वर्ष पुराना किला ढहा दिया। असम तो भगवा दल पहले ही जीत चुका था और इसी के आसपास मेघालय और नगालैंड में भी एनडीए ने सरकार बना ली। तब किसे मालूम था कि साल के अंत में मिजोरम में भी कांग्रेस की हुकूमत साफ हो जाएगी। आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब सतबहनी राज्यों में किसी पर भी कांग्रेस का कब्जा नहीं है। 

फरवरी से दिसंबर तक पूर्वोत्तर भले ही कांग्रेस की आशाओं पर पानी फेरता रहा हो, मगर इस बीच उसने कर्नाटक के भीषण सियासी रण में साधन संपन्न भाजपा को पटखनी देने में कामयाबी हासिल कर ली थी। 2017 के आखिर में राम-राम कर गुजरात में जीती भाजपा को यह बड़ा धक्का था। बहुमत न मिलने के बावजूद राहुल गांधी कर्नाटक में जेडीएस के साथ सत्ता हथिया चुके थे। इसे भले ही उनके विरोधी राजनीतिक लाचारी का नाम दें, पर एनडीए विरोधी राजनीति के लिए यह निर्णायक बिंदु था। कांग्रेस ने संदेश दे दिया था कि केंद्र की सत्ता के लिए नरेंद्र मोदी से मुकाबले को अगर उसे नितांत क्षेत्रीय सियासी दलों के आगे थोड़ा झुकना भी पड़े, तो वह तैयार है। इससे पहले उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर उप-चुनावों ने साबित कर दिया था कि अगर क्षेत्रीय दल मिलकर मजबूती से कांग्रेस और भाजपा का विरोध करें, तो बाजी पलटी जा सकती है। कांग्रेस ने वहां उम्मीदवार खड़े किए थे, पर परिणामों ने जता दिया था कि आने वाली लड़ाइयां कुछ राज्यों में अकेले नहीं लड़ी जा सकतीं। 

यही वजह है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में देश की सबसे पुरानी पार्टी ने बसपा से गठजोड़ की कोशिश की, पर बात बनी नहीं। यह ठीक है कि राजस्थान और मध्य प्रदेश में सरकार गठन में इन पार्टियों  का सहयोग मिला, पर यह सियासी संगम चुनाव से पहले हुआ होता, तो जीत की रंगत कुछ और होती। 

एनडीए और यूपीए के इस सीधे और सपाट मुकाबले के बीच एक और गुल खिला। तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव तकरीबन अपने बूते ही समर में उतर पड़े थे। उनके सामने कांग्रेस-सीपीएम और टीडीपी का गठबंधन था। भाजपा भी इस संग्राम में हाथ आजमा रही थी। शानदार जीत के बाद अब केसीआर पूरे देश में कांग्रेस और भाजपा मुक्त तीसरे मोर्चे की वकालत कर रहे हैं। वह जानते हैं कि इस बासी कढ़ी में उबाल आने की संभावना बहुत कम है, पर सुदूर हैदराबाद में बैठकर अगर दिल्ली को अपनी धमक दिखानी है, तो शायद सबसे अच्छा तरीका यही है। कभी नंदमूरि तारक रामाराव यानी एनटीआर ने भी इसी शहर से ऐसे सपने बिखेरे थे। 

एक तरफ केसीआर नए दोस्त बना रहे हैं, तो वहीं चुनाव सामने देखकर एनडीए के पुराने दोस्त उसे आंखें दिखा रहे हैं। महाराष्ट्र में पुरानी सहयोगी शिवसेना बेगानों जैसा व्यवहार कर रही है। इसी तरह, बिहार के खास तबके में दखल रखने वाले उपेंद्र कुशवाहा पहले तो धमकाते रहे और अब यूपीए का हिस्सा बन गए हैं। महबूबा मुफ्ती की पीडीपी भी एनडीए से अलग हो चुकी हैं और अकाली दल भी ज्यादा सीटें हासिल करने के लिए रह-रहकर तेवर दिखाता रहता है। जहां तक कांग्रेस की बात है, तो बसपा और सपा से उसका खट्टा-मीठा रिश्ता सबके सामने है। 

इन उलटबांसियों से साफ है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में सिद्धांतों के नकाब भले ही ओढे़ जाएं, पर उसके अंदर सियासी स्वार्थों का घिनौना चेहरा छिपा होगा। इस दौरान पुराने दोस्त दुश्मन बन सकते हैं और दुश्मन दोस्त। मैकियावली ठीक कहता था-सियासत में न कोई दोस्त है और न कोई दुश्मन। इसलिए दोस्तों पर अंधा भरोसा मत करो और दुश्मनों की ऐसी कटु निंदा मत करो कि वे फिर कभी बगलगीर न हो सकें। 
2018 एक और मामले में याद रहेगा। इस पूरे साल कहीं न कहीं चुनाव अथवा उप-चुनाव होते रहे और उन्हें जीतने की लालसा में हमारे नेता निरर्थक बातें करते रहे। देश के शीर्षस्थ नेताओं ने एक-दूसरे की इतनी कटु लानत-मलामत की कि समूचा राजनीतिक विमर्श प्रदूषित हो गया। ऐसा करते वक्त वे भूल गए कि उनके कटु वचनों से सामाजिक ताने-बाने को चोट पहुंच सकती है। 

कहने की जरूरत नहीं कि धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के प्रति आस्थाएं स्वाभाविक हैं, पर ये तभी तक फलवती साबित होती हैं, जब तक उन पर निजता का विशेषाधिकार लागू होता है। निजता का विशेषाधिकार, यानी हर नागरिक को अपनी आस्था के अनुपालन की पूरी छूट हो और साथ ही उन पर मुमानियत लागू होती हो कि वह दूसरे के विश्वासों पर चोट नहीं पहुंचाएगा। हमारे नेताओं के छिछलेपन और उनके द्वारा पोषित सोशल मीडिया के ‘सुपारी किलर्स’ की कारगुजारियों ने सवाल उठा दिया है कि भारत कहीं वैचारिक अंधे युग का शिकार तो नहीं बन रहा?

आपको नए साल की शुभकामना के साथ यह मंगलकामना भी है कि अगले साल होने वाले चुनाव नफरत की खाई को और विस्तार नहीं देंगे। 

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