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आरोपों की आंधियों में चुनाव

शशि शेखर

बात कुछ बरस पुरानी है। उस दिन ‘बेस्टिल डे’ था और संयोगवश मैं फ्रांस में था। परंपरानुसार पेरिस की सड़कों पर वैसी ही भव्य झांकियां निकल रही थीं, जैसी कि हम गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में देखने के अभ्यस्त हैं। कुछ रस्मन, तो कुछ तफरीहन फ्रांसीसी राजधानी में देशी-विदेशी लोग उमड़ पडे़ थे। उस लम्हे में मेरे मन में सवाल उठा था, आजादी अथवा गणतंत्र के प्रतीक लुभाते हैं, पर क्या हम उसकी वाकई परवाह करते हैं? 
आज बहुत दिनों बाद वह वाकया स्मृतियों के बंद दरवाजों से फिर झांक उठा है, इस समय दिल्ली में गणतंत्र दिवस समारोह का रोमांच अपने अंतिम मुकाम पर है। आप जब तक इन पंक्तियों को पढ़ेंगे तब तक जश्न गुज़र चुका होगा, पर शायद उस समय भी यह प्रश्न अनुत्तरित रहेगा कि हमारी सफलता कितनी नैतिक है? नैतिकता के बिना गणतंत्र की देवी प्रफुल्लित नहीं रह सकती। 

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से दंतकथाओं की अभ्यस्त भारतीय राजनीति को अब रहस्य, रोमांच और अपराध के कोलतार में डुबोने की कोशिश हो रही है। ऐसी-ऐसी कथाएं रची जा रही हैं, जिनसे लगता है कि हमारा राजनीतिक वर्ग सिर्फ हत्याओं, अपहरणों, घोटालों, यहां तक कि देश-विरोधियों से दोस्ती तक में मशगूल है। क्या हमारी राजनीति इस कदर मलिन हो चुकी है? यकीनन, ऐसा नहीं है, पर ऐसी कोशिशें जारी हैं।

इस लंबे सिलसिले की नवीनतम कड़ी के तौर पर पिछले दिनों लंदन में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस का हवाला देना चाहूंगा। वहां सैयद शुजा नाम के एक शख्स ने तमाम विवादास्पद दावे किए। कमाल यह कि उस दिन तक अनाम इस शख्स ने न तो सशरीर वहां आने की जहमत उठाई, न चेहरा दिखाने की। वह स्काइप के जरिए रू-ब-रू था। आखिर ऐसा क्या है कि वह अपना चेहरा दिखाने से डर रहा था? बकौल उसके, उस पर कुछ दिन पहले हमला हुआ और इस वक्त भी उसके सीने पर 18 टांके लगे हुए हैं। इतना चोटिल होने के बावजूद वह बैठकर आराम से बातचीत कर रहा था! मैं मेडिकल साइंस का विद्यार्थी नहीं हूं। सिर्फ चिकित्सक ही बता सकते हैं कि इतना घायल होने के बावजूद कोई इतनी सहजता से संवाद कर सकता है या नहीं? इस मौके पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल की मौजूदगी ने भी तमाम सवालों को जन्म दिया। 

एक टेलीविजन चैनल ने शुजा के आरोपों की परख के लिए अपने पत्रकारों की पूरी टीम लगा दी। उन्होंने पाया कि देश और विदेश में उसने जो पते दिए थे, वे गलत थे। इस बीच चुनाव आयोग के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने भी प्राथमिकी दर्ज कर ली है। उम्मीद है, पुलिस जांच में दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। मैं इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा टीका-टिप्पणी करने की बजाय सिर्फ एक आम हिन्दुस्तानी की नजर से उसके दो दावों को परखना चाहूंगा। शुजा के अनुसार, 2014 के चुनाव के दौरान ईवीएम हैक की गई थीं। अब आप ही बताइए कि क्या उस दौरान समूचे देश में परिवर्तन की हवा नहीं बह रही थी? गजब दिन थे वे। मोदी का भाषण सुनने के लिए उनकी सभाओं में मेला जुटता और दूर-दराज के लोग टेलीविजन स्क्रीन के सामने आ जमते। राजीव गांधी के बाद किसी सियासी शख्सियत ने पहली बार ऐसा जन आकर्षण हासिल किया था। उन दिनों राजनीतिक दृष्टि से शून्य व्यक्ति भी दावे से कह सकता था कि नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। बदलाव की यह            लहर इतनी जबरदस्त थी कि आने वाले साढे़ तीन साल उसका असर कश्मीर से कन्याकुमारी तक दिखता रहा और तमाम स्थापित नेता और सरकारें सत्ता बदर हो गईं। 

यह परिवर्तन कामना भाजपा के साथ आम आदमी पार्टी के लिए भी खुशखबरी लाई। शुजा ने हैकिंग के मामले में अरविंद केजरीवाल को भी लपेटा है। मैं खुद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहता हूं और अपनी आंखों-देखी के आधार पर कह सकता हूं कि जिस तरह 2014 की शुरुआत में साफ दिख रहा था कि संसद का अंक गणित बदलने वाला है, वैसे ही स्पष्ट था कि दिल्ली की होली भी नए सत्तानायक के साथ मननी है। जनचर्चा थी, केजरीवाल मोदी लहर को रोकने जा रहे हैं। ऐसा हुआ भी।

रही बात ईवीएम की, तो 1998 में इस मशीन की आमद ही विवादों के बीच हुई थी। सभी राजनीतिक दलों ने कभी न कभी इसका विरोध किया है। बार-बार के वितंडावाद से बचने के लिए पिछले साल चुनाव आयोग ने खुली चुनौती दी थी कि कोई सार्वजनिक तौर पर ईवीएम को हैक करके तो दिखाए! आश्चर्य, आरोप लगाने वाले तक वहां नहीं पहुंचे। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे विवाद सियासी लाभ के लिए उत्पन्न किए जाते हैं, इसलिए चुनाव आयोग से यह उम्मीद करना नाजायज नहीं होगा कि वह अपने नियमों को कुछ और पारदर्शी बनाए। अभी तक यह व्यवस्था है कि हर विधानसभा से किसी एक ईवीएम के साथ जुडे़ वीवीपैट की पर्चियों का मिलान किया जाए। पांच राज्यों के पिछले विधानसभा चुनावों में यह गिनती सौ फीसदी सही पाई गई थी। इससे असंतुष्ट सियासी दल 10 से 50 फीसदी तक मिलान की मांग कर रहे हैं। इतनी न सही, पर यह संख्या कुछ तो बढ़ाई ही जा सकती है।

व्यवस्था और विवादों के बीच सनातन साझीदारी रही है। इसीलिए हुकूमतों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक से अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिशें होती रही हैं। सिलसिला जारी रहे, इसीलिए गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर ये पंक्तियां लिखते वक्त विचार कौंध रहा है कि हम ‘परेड’ में अपने शस्त्रों-औजारों का प्रदर्शन तो करते हैं, पर क्यों नहीं कभी सत्य और पारदर्शिता को ‘थीम’ बनाया जाता? सैयद शुजा ने अपने आरोपों में तमाम राजनीतिक दलों और हस्तियों को दलदल में खींचने की कोशिश की है। ऐसे आरोपों को हमेशा के वास्ते नेस्तनाबूद करने के लिए क्यों न हमारे राजनेता मिलकर एक पारदर्शी निजाम बनाने का संकल्प लें? उन्हें समझना ही होगा कि जो भूल-भुलैया उन्होंने अपने निजी स्वार्थों के लिए रची थी, अब वे खुद ही उसका शिकार बन रहे हैं। इस बला से खुद को बचाने की जिम्मेदारी भी तो उन्हीं की है।

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