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आइए लोकतंत्र को अर्थवान बनाएं

शशि शेखर

इस साल देश में आम चुनाव होने हैं और इस नाते हमारे-आपके कंधों पर एक बड़ी जिम्मेदारी खुद-ब-खुद आ जाती है। संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र में मतदाता की हैसियत से हमें तय करना है कि आने वाले पांच साल हम अपने वतन को किन लोगों को सौंपने जा रहे हैं? साथ ही आपको यह भी निर्धारित करना है कि इस बार चुनावों के दौरान आप अपने नेताओं के असर में आना चाहेंगे या उन पर प्रभाव डालना चाहेंगे?

मेरे पितामह स्वतंत्रता सेनानी थे। वह अक्सर हम बच्चों से कहा करते कि आजादी तुम्हें जन्मजात अधिकार की भांति हासिल हो गई है। इसकी कीमत समझो। इसे पाने के लिए तुम्हारे पुरखों ने बड़ी कुर्बानियां दी हैं। आज जब पलटकर पांच दशक पहले सुनी उन बातों को याद करता हूं, तो लगता है कि वह सही थे। हिन्दुस्तानी अपनी पीठ थपथपाते आए हैं कि हम संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं। चर्चिल जैसे तमाम पश्चिमी राजनीतिज्ञों की आशंकाओं को ध्वस्त करते हुए हमने इस नायाब शासन-पद्धति को बचाए और बनाए रखने में कामयाबी हासिल की है। आत्मघाती मुग्धता के साथ पड़ोसियों के उदाहरण दिए जाते हैं, जहां लोकतंत्र की अवधि वहां के सैनिक हुक्मरां तय करते हैं। हकीकत से आंखें चुराना हम भारतीयों का पुराना कुटेव है।

लोकतंत्र अगर सिर्फ सत्ता प्रणाली है, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि हमने इसे सात दशकों तक बचाए रखने में कामयाबी हासिल की है, पर यह सत्य का एक आयाम भर है। इसके स्याह पहलू पर भी नजर डाल देखिए। आम आदमी के विकास का जो मॉडल हमारे हुक्मरानों को अपनाना चाहिए था, उन्होंने उस पर जरूरत के मुताबिक ध्यान नहीं दिया। यही वजह है कि जहां दुनिया चांद और मंगल पर बस्तियां बसाने की योजना बना रही है, वहीं लगभग सात करोड़ हिन्दुस्तानियों के लिए दो जून की रोटी तक मयस्सर नहीं है। वजह? हमारे चुनाव नेताओं के रिपोर्ट कार्ड पर नहीं, आकर्षक जुमलों पर लडे़ जाते रहे हैं।

आजादी के बाद चुनाव-दर-चुनाव सत्तानायक पांच साल का हिसाब देने की बजाय हर बार नए नारे उछालते आए हैं। कभी ‘गरीबी हटाओ’, तो कभी ‘हर हाथ को काम, हर खेत को पानी’, तो कभी ‘रोटी-कपड़ा और मकान’। जब ये नारे खोखले साबित होने लगे, तो धर्म, जाति, क्षेत्र और भेदभावके कुतर्क गढ़े जाने लगे। शोर-ओ-गुल के बीच ठिठककर सोचिए कि कैसे हमारे नेता हमें 21वीं शती की चुनौतियों से मुकाबिल करने की बजाय अतीत की कब्रगाहों में पहुंचा रहे हैं?

मैंने इसीलिए इस कॉलम की शुरुआत में आपसे पूछा था कि आप चुनावों के असर में आना चाहेंगे या उन पर असर डालना चाहेंगे? क्या आप एक बार फिर किसी न किसी उन्माद या प्रमाद की गोली गटकना पसंद करेंगे? या, अपने प्रतिनिधि से पूछना चाहेंगे कि पांच बरस पहले आपने जो कहा था, उस पर कितना अमल किया? यकीन करें, आपका सिर्फ एक प्रश्न हमारे लोकतंत्र को नए अर्थ दे सकता है। इससे वोट के सौदागरों को एहसास हो जाएगा कि हुकूमत उनकी मिल्कियत नहीं, बल्कि ऐसी जिम्मेदारी है, जिसे जनता असंतुष्ट होकर किसी अन्य को सौंप सकती है।
यह सुकूनदेह है कि भारतीय मतदाता ने इसकी शुरुआत कर दी है। 

आप गए दिसंबर में आए पांच राज्यों के चुनाव परिणामों पर नजर डाल देखिए। जनता ने जिसको सबक देना था, उसे सबक और जिसे शाबाशी देनी थी, उसे शाबाशी दे दी। तेलंगाना से शुरू करते हैं। के चंद्रशेखर राव ने इस प्रदेश के गठन में बड़ी भूमिका अदा की थी। मतदाता ने पिछले चुनाव में इसीलिए उन्हें सत्ता नवाजकर सटीक सिला दिया था। चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के विभाजन के विरोध में थे, इसलिए उन्हें तेलंगाना में हारना पड़ा था। इस बार नायडू कांग्रेस से हाथ मिलाकर तेलंगाना राष्ट्र समिति यानी केसीआर की पार्टी के खिलाफ ताल ठोक रहे थे। जनता ने उन्हें दोबारा ठुकरा दिया। केसीआर के पुराने संघर्ष और सत्ता के दौरान किए गए कामों पर मुहर लगाकर जन-साधारण ने साबित कर दिया कि सिर्फ गठबंधन ही सत्ता की कुंजी नहीं साबित हो सकता। केसीआर अपना रिपोर्ट कार्ड और भविष्य की रणनीति लेकर मैदान में उतरे थे। दूसरी तरफ, सियासी अंकगणित का विधान था। नतीजा सामने है।

इसी तरह, राजस्थान और मध्य प्रदेश में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न देकर मतदाता ने जता दिया कि हमारे विकल्प खुले हैं। शुरुआती दौर में राजस्थान में कांग्रेस इकतरफा मुकाबला मान रही थी। इसी तरह, भाजपा मध्य प्रदेश को लेकर आश्वस्त थी। दोनों की आकांक्षाओं पर पाला पड़ गया। सरकार भले ही कांग्रेस ने बना ली हो, पर अपाहिज जनादेश का संदेश साफ है। जागते रहिए, हम देख रहे हैं। छत्तीसगढ़ के परिणामों ने तीसरी प्रवृत्ति को हमसे रू-ब-रू कराया है, वह है परिवर्तन-कामना। रायपुर की सत्ता पर 15 वर्षों से काबिज रमन सिंह की कोई निंदा नहीं करता था, फिर भी वह महज इसलिए हार गए, क्योंकि लोग बदलाव चाहते थे। इसका एक अर्थ यह भी है कि वोटर असंतुष्ट न होने के बावजूद सत्तारथियों के चेहरों में बदलाव चाहता है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास रमन सिंह के पाए का कोई नेता न था, फिर भी उसने पंजे पर मुहर लगाई। मतलब साफ है। सिर्फ विकल्पहीनता का दावा कर चुनावी वैतरणी नहीं पार की जा सकती। लोकतंत्र में जनता को इसीलिए जनार्दन कहा जाता है। वह राजा को रंक और राह चलतों को राज-पाट सौंपती आई है। रायपुर का सत्ता-सदन इसका नवीनतम उदाहरण है।

क्या आपको अब भी नहीं लगता कि इन राज्यों के मतदाताओं ने अनायास बदलाव की शुरुआत कर दी है? उनकी इस नेक पहल को मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी है कि अगले आम चुनाव में आप मतदान से पहले प्रश्नदान करें। बिना सवाल पूछे दिए गए वोट आपके सत्तानायकों को जवाबदेह की जगह मदांध बनाते आए हैं। आपकी इतनी सी कोशिश उन्हें जिम्मेदार बना सकती है।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on democracy on 6 january