DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मी लॉर्ड! देश आपको देख रहा है

शशि शेखर

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा इंसाफ के सबसे बड़े ओहदे से अवकाश ग्रहण कर चुके हैं। बतौर प्रधान न्यायाधीश उनका 13 महीने लंबा कार्यकाल तमाम वजहों से लंबे समय तक याद किया जाएगा। भारतीय न्यायपालिका के गौरवपूर्ण इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब समूची न्याय-व्यवस्था आम आदमी की बतकही का हिस्सा बनी और बनती चली गई।

इस दौरान कुछ ऐसे सवाल उठे, जिन पर समीक्षकों ने आनन-फानन में फैसला सुना दिया। ऐसा करते वक्त वे भूल गए कि इस ओहदे पर बैठे व्यक्ति को दो तरीके से आंका जा सकता है। पहला, उसके फैसलों की गुणवत्ता और दूसरा, प्रशासनिक क्षमता। इसके साथ ही ठंडे दिमाग से देशकाल और समाज की परिस्थितियों का आकलन किया जाना चाहिए था। कल्पना कीजिए, अगर राम जन्मभूमि का विवाद उनके समय में आला अदालत न पहुंचा होता, तब भी क्या उनके ऊपर इसी तरह के दोषारोपण होते? 

कृपया जान लें। न्यायमूर्ति मिश्रा का करियर शानदार रहा है। बतौर न्यायाधीश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने सैकड़ों मुकदमों का निपटारा किया, पर ऐसे विवादों से कभी उनका वास्ता नहीं पड़ा। वह हमेशा सक्रिय जज के तौर पर जाने जाते थे। एक ऐसा न्यायाधीश, जो बेजा टिप्पणियों से बचता था और जिसके फैसलों में न्याय-मीमांसा की झलक साफ दिखाई पड़ती थी। हम कुंद स्मृतियों के लोग अक्सर वर्तमान को ही संपूर्ण सत्य का दर्जा दे छुट्टी पा लेते हैं, पर कभी-कदा अतीत हमें सही रास्ता दिखाने में मददगार साबित होता है। 

इस पुराने सिद्धांत का पालन करते हुए मैं आपका ध्यान पांच साल पहले के एक मुकदमे की ओर खींचना चाहूंगा। मुंबई बम धमाकों में शामिल याकूब मेमन को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी। वरिष्ठ वकीलों का एक तबका मानता था कि इस निर्णय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। समूचा देश टकटकी लगाए आला अदालत की ओर देख रहा था। आपको याद होगा कि तब रात भर चले बहस-मुबाहिसे के बाद अदालत भोर में इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि याचिका खारिज की जानी चाहिए। कहने की जरूरत नहीं कि याकूब मेमन को उसी सुबह फंदे पर लटका दिया गया। हो सकता है, याचिकाकर्ता निर्णय से संतुष्ट न हुए हों, परंतु ऐसे मामलों में चटपट इंसाफ के हामी हजारों लोगों को लगा था कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया है। 

ऐसे हैं दीपक मिश्रा। इंसाफ के लिए उन्होंने लोकप्रियता की चिंता कभी नहीं की। सजा-ए-मौत को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ माना जाता है। उन्होंने मेमन मामले की सुनवाई को यही अंदाज दिया। बाद में शायद इसीलिए आधार या समलैंगिकता जैसे मामलों में उन्होंने लोक मान्यता से ज्यादा इंसानियत और संविधान की मूल भावना को तरजीह दी। सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान के गायन का मुद्दा भी ऐसा ही था। बहुत से लोगों को यह पसंद नहीं आया, पर क्या किसी न्यायमूर्ति को तरल जनभावना का ख्याल रखना चाहिए? अगर ऐसा हुआ, तो समूची न्याय प्रक्रिया भावनात्मक ज्वार-भाटा का शिकार हो जाएगी। 

यहां उनके एक कम चर्चित, पर बेहद जरूरी फैसले का जिक्र करना चाहूंगा। सितंबर 2016 में उन्होंने निर्णय सुनाया था कि पुलिस को हर एफआईआर को वेबसाइट पर डालना होगा। इस फैसले का महत्व वही समझ सकता है, जिसने थानों में रखे रोजनामचों में छेड़छाड़ का दंश भोगा हो। अब आते हैं राम जन्मभूमि विवाद पर। यह इस कालखंड का सबसे दाहक और विवादित मुद्दा है, लिहाजा सवाल उठने तय थे। मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि अगर वह फैसले के साथ कुछ टिप्पणियां दर्ज कराने से खुद को बचा पाते, तो शायद अच्छा होता। 

रही बात उनकी प्रशासनिक क्षमता की, तो कोई दो राय नहीं कि उनके वक्त में दो ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने गल्पविदों को अपनी-अपनी हांकने का मौका दे दिया। इस देश के खास-ओ-आम की स्मृतियों में आज भी सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायमूर्तियों की प्रेस कॉन्फ्रेंस ताजा है। इससे पहले कभी इस ओहदे के लोगों ने पद पर रहते हुए सार्वजनिक मंच से विरोध के सुर बुलंद नहीं किए थे। यही नहीं, न्यायमूर्ति मिश्रा देश के पहले ऐसे प्रधान न्यायाधीश हैं, जिनके खिलाफ संसद में महाभियोग लाया गया। हालांकि, उस प्रस्ताव को बाद में राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने खारिज कर दिया, पर तब तक गंगा और यमुना में बहुत पानी बह चुका था। 

ध्यान रखें, न्यायमूर्ति मिश्रा ने जब इस जिम्मेदारी भरे ओहदे को संभाला था, तब न्यायपालिका के हालात बहुत सुकूनदेह नहीं थे। उनके एक पूर्ववर्ती न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर प्रधानमंत्री के सामने इस मुद्दे पर सरेआम भावुक हो चुके थे कि न्यायपालिका में बड़ी संख्या में पद रिक्त हैं। इससे मुकदमों के निपटारे में देरी हो रही है। यह महामुद्दा मिश्रा को विरासत में मिला था। जब वह गए, तब तक हालात में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आया था। देश भर की निचली अदालतों में अभी भी ढाई करोड़ से ज्यादा वाद लंबित हैं। सिर्फ सुप्रीम कोर्ट में पचास हजार से अधिक मामले अनसुलझे पडे़ हैं।

मतलब साफ है कि कहीं कुछ ऐसा हुआ, जिसकी वजह से वह सरकार से न्यायपालिका के हित में फैसले न करा सके और साथी ‘जजों’ से समूचा सामंजस्य न बैठा सके। अपनी विदाई के मौके पर उन्होंने कहा कि अब मैं खुलकर अपनी बात कह सकूंगा। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उनका कोई नया बयान सामने नहीं आया है। उम्मीद है, वह शीघ्र अपनी चुप्पी तोड़ेंगे और कुछ नए तथ्य सामने आएंगे।

गौरतलब है कि जिन न्यायमूर्तियों ने पत्रकार वार्ता की थी, उनमें एक रंजन गोगोई भी हैं। अब कमान उनके हाथ में है। उन्होंने अपनी नई पारी की शुरुआत अनूठे, पर मनभावन अंदाज में की। देश भर से उत्सुक निगाहें उन पर जमी हैं कि क्या वह न्यायपालिका की गरिमा को जन-आकांक्षा के अनुरूप बुलंद कर सकेंगे? कहने की जरूरत नहीं कि इस देश का आम आदमी आज भी न्यायपालिका को अंतिम आश्रय मानता है। वजह? कार्यपालिका और विधायिका अपनी साख खो चुके हैं। इसीलिए समूची विनम्रता के साथ देश के सभी न्यायाधीशों से कहना चाहूंगा कि मी लॉर्ड! इंसाफ की देवी ने अपनी आंखों पर पट्टी इसलिए बांध रखी है, क्योंकि उसे भरोसा है कि आपकी आंखें खुली हैं। 

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें
shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 7 october