shashi shekhar aajkal hindustan column on 6th october - विपक्ष के लिए एक और अवसर DA Image

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विपक्ष के लिए एक और अवसर

शशि शेखर

इस समय देश के दो महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव की हलचल जोरों पर है। कुछ महीनों में बिहार, झारखंड और दिल्ली भी इसी ज्वर की चपेट में आने वाले हैं। 2019 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार की जोरदार वापसी के बाद यह पहला मौका है, जब यह तय होगा कि क्या प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बरकरार है अथवा कांग्रेस और क्षेत्रीय दल अब उन्हें चुनौती देने का माद्दा रखते हैं। ये चुनाव यह भी तय करेंगे कि आने वाले दिनों में राजनीति की दशा-दिशा क्या होगी? 
लोकतंत्र के लिए जरूरी है जबरदस्त विपक्ष। दुर्भाग्य से इस समय वह सिरे से नदारद है। ये चुनाव इन राज्यों में मौजूद विपक्षी पार्टियों के लिए उपस्थिति दर्ज कराने का शानदार अवसर हो सकते हैं। अब चूके, तो मौका 2024 के लोकसभा चुनाव में ही मिलेगा। यहां मुद्दा महज महाराष्ट्र और हरियाणा तक सीमित नहीं है। कुछ हफ्ते बाद झारखंड चुनाव की चपेट में होगा। नए साल की शुरुआत में दिल्ली और फिर बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन दो राज्यों से चालू होने वाला सियासी सिलसिला महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है।

आप सोच रहे होंगे कि विधानसभा चुनावों को लेकर इतनी बड़ी भूमिका क्यों? बताने में हर्ज नहीं कि ये पांचों राज्य लोकसभा में 119 और राज्यसभा में 49 सांसद भेजते हैं। यहां के जनादेश सिर्फ इन सूबों नहीं, बल्कि केंद्र की राजनीति को भी यकीनन प्रभावित करेंगे। कोई बिल पास करवाना हो या महत्वपूर्ण निर्णय लेना हो, संसद के दोनों सदनों में सरकार को न सिर्फ बहुमत, बल्कि कई बार दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। अगर ओडिशा, आंध्र और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों ने सहयोग न किया होता, तो क्या केंद्र सरकार अनुच्छेद 370 अथवा तीन तलाक जैसे मामलों पर इतने महत्वपूर्ण निर्णय कर पाती?

महाराष्ट्र से बात शुरू करते हैं। यह प्रदेश कभी कांग्रेस और एनसीपी की मुट्ठी में हुआ करता था। लगभग चार दशकों से मराठा क्षत्रप जैसा दबदबा रखने वाले शरद पवार की जिंदगी के लिए यह विधानसभा चुनाव अग्नि-परीक्षा साबित होने जा रहा है। उनकी पार्टी के महत्वपूर्ण नेता छिटक रहे हैं। खुद वह जराग्रस्त हो चले हैं, उनकी साथी कांग्रेस की हालत भी पतली ही है। हालांकि, सत्तारूढ़ भाजपा और शिव सेना गठबंधन में भी बर्तन खटकते रहते हैं। लोकसभा चुनाव से पहले कई बार ऐसा लगा कि शिव सेना चुनावी समर में अकेले कूद पड़ने की तैयारी कर रही है। ऐन समय पर उद्धव ठाकरे माने, मगर 2019 के नतीजों ने उन्हें समझा दिया कि भागवा पार्टी जूनियर से सीनियर पार्टनर बन चुकी है। शायद यही कारण है कि उन्होंने अपने पुत्र आदित्य ठाकरे को चुनावी समर में उतारा है। इस कदम को ‘सेना’ की सियासत में निर्णायक मोड़ माना जाना चाहिए।

शिव सेना के संस्थापक बाल ठाकरे चुनाव लड़ने के मुकाबले लड़वाने में यकीन रखते थे। यही वजह है कि लगभग साढे़ चार वर्षों तक शिव सेना सत्ता में रही, पर ‘मातोश्री’ का रुतबा मुंबई के मुख्यमंत्री सचिवालय से कहीं अधिक रहा। आदित्य के चुनावी जंग में उतरने का मतलब है कि वह शिव सैनिकों को संदेश देना चाहते हैं कि ‘मातोश्री’ के कर्णधार नेपथ्य से नहीं, बल्कि सीधे मैदान में जंग की अगुवाई करेंगे। आने वाले दिनों में आपको सत्तारूढ़ गठबंधन की दरारें चौड़ी 
होती दिखाई पड़ें, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। महाराष्ट्र का चुनाव एक और वजह से दिलचस्पी जगाता है। मुस्लिम हितों की मुखर आवाज असदुद्दीन ओवैसी यहां बरसों से पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी से हाथ मिलाया है। गुजरे लोकसभा चुनाव में इस जोड़ी ने कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को खासा नुकसान पहुंचाया था। अगर वे विधानसभा की कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते हैं, तो तय है, इसके दो फलितार्थ होंगे। तात्कालिक तौर पर वे भाजपा गठबंधन को फायदा पहुंचाएंगे। इसका दूरगामी नतीजा यह होगा कि दलित-मुस्लिम एकता के मृतप्राय सपने को नई जमीन मिलेगी।

हरियाणा में हालात इसके उलट हैं। यहां विधानसभा की 90 सीटें हैं। पिछले चुनाव में आधे से अधिक, यानी 47 पर भगवा दल ने कब्जा कर लिया था। सत्ताधारी कांग्रेस 15 सीटें पाकर तीसरे नंबर पर थी, जबकि ओमप्रकाश चौटाला का इंडियन नेशनल लोकदल 19 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर काबिज हो गया था। यह ठीक है कि भाजपा को बहुमत मिल गया था, पर विपक्ष पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ था। लोकसभा चुनाव ने उसे पूरी तरह जमींदोज कर दिया। सत्तारूढ़ दल ने 58 फीसदी वोट हासिल करते हुए सभी 10 सीटें जीत लीं। कांग्रेस को करीब 28.5 प्रतिशत मत मिले। महाराष्ट्र की तरह विपक्ष यहां भी कलह-ग्रस्त और विघटन का शिकार है। उसे जिंदा रहने के लिए सियासी संजीवनी की जरूरत है, पर संजीवनी हासिल करने के लिए ‘हनुमान’ की जरूरत होती है, जिसका फिलहाल अभाव दिखाई पड़ता है। 

ऐसा कहने की सबसे बड़ी वजह यह है कि हरियाणा में कभी सर्वाधिक कद्दावर माने जाने वाले ओम प्रकाश चौटाला जेल में हैं। उनके परिवार में फूट है। फिलहाल पार्टी की कमान अभय चौटाला के हाथों में है, जो पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को 2019 में दोहराने में नाकामयाब साबित हुए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी अजीत सिंह और हरियाणा में चौटाला परिवार की इस दुर्गति का क्या एक फलितार्थ यह भी है कि जाट राजनीति पर भारतीय जनता पार्टी ने कब्जा कर लिया है? कांग्रेस यहां भी गुटबंदी का शिकार है। ऐसे में, आलाकमान बेहतरीन नतीजों की उम्मीद कैसे कर सकता है?  
तय है, अगर महाराष्ट्र और हरियाणा में कोई चमत्कार नहीं हुआ, तो समूचे देश में विपक्ष को एक बार फिर झटका लगेगा। सबसे पहला असर झारखंड पर पडे़गा, क्योंकि सोशल मीडिया के इस चटपट और चटपटे वक्त में सियासी-सामाजिक घटनाएं दूर तक असर करती हैं। इसीलिए झारखंड के बाद नजर दिल्ली और बिहार पर जाती है।

बिहार में नीतीश कुमार पिछली बार लालू यादव के साथ मिलकर चुनाव लडे़ थे, नतीजे उनके पक्ष में गए थे। इस बार वह भाजपा के साथ हैं। अगर भाजपा लोकसभा की तरह इन तीनों राज्यों के चुनाव सहजता से जीत जाती है, तब क्या वह नीतीश कुमार को अपने गठबंधन का नेता मानेगी? अभी तक तो यही कहा जा रहा है कि नीतीश हमारे ‘कप्तान’ हैं, पर शिव सेना का उदाहरण सामने है। इस सवाल के जवाब के लिए हमें कुछ इंतजार करना होगा। 

एक प्रश्न यह भी है कि क्या दिल्ली में अरविंद केजरीवाल एक बार फिर भाजपा के अश्वमेध घोडे़ की लगाम पकड़ने की कुव्वत जुटा पाएंगे? इस प्रश्न के उत्तर के लिए भी हमारे पास प्रतीक्षा के अलावा कोई चारा नहीं है। 

चलते-चलते विजय दशमी की हार्दिक बधाई स्वीकार करें। उम्मीद है, चुनावी विष त्योहारों के इस मौसम की मिठास को कसैला नहीं करेगा।

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