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29 मार्च, 2020|6:37|IST

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जो दरियां बिछाते रहे, उनका क्या

शशि शेखर

‘आज मुझे उन लोगों ने बेड-टी बहुत देर से दी, इसलिए मैं बहुत देर से उठ सकी। मुझे सच में नहीं मालूम कि वहां क्या हुआ है।’ पत्रकारों को बांग्ला फिल्मों की प्रख्यात अभिनेत्री मुनमुन सेन से यह उत्तर उस समय हासिल हुआ, जब उनसे प्रश्न किया गया कि आपके संसदीय क्षेत्र आसनसोल में चुनावी हिंसा की वजह क्या है? उसी दिन टेलीविजन पर एक और चकित करने वाला दृश्य दिखाई दिया। इस बार बारी सनी देओल की थी। उन्होंने मुंबई के मतदान केंद्र से वोट देकर जैसे ही बाहर कदम रखा, पत्रकारों ने उनसे उनके नए राजनीतिक अवतार के बारे में पूछना चाहा, तो उन्होंने पहले विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े और फिर अचानक अपनी कार की ओर दौड़ लगाई। ऐसा ही एक दृश्य तब दिखा, जब उत्तर पश्चिमी दिल्ली से चुनाव लड़ रहे मशहूर पंजाबी गायक हंसराज हंस इंटरव्यू देने के लिए एक टीवी चैनल पर प्रकट हुए। उन्हें पता नहीं था कि 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई में क्या हुआ था और उस समय प्रधानमंत्री कौन था। उनके पास सिर्फ एक जवाब था- ‘मुझे याद नहीं, उस समय मैं छोटा बच्चा था।’ यकीन मानें, अपने चालीस वर्षों के पत्रकारिता करियर में मैं तमाम अच्छी-बुरी घटनाओं का साक्षी बना, पर ऐसे दृश्य पहले कभी नहीं देखे।

पहले मुनमुन सेन की बात। आसनसोल से बाबुल सुप्रियो 2014 में चुनकर आए थे। वह केंद्र में मंत्री हैं और जाने-माने गायक भी। ममता बनर्जी को शायद लगा हो कि उनसे कहीं अधिक लोकप्रिय मुनमुन सेन हैं और वह यकीनन बाबुल सुप्रियो को हरा देंगी। इसी आधार पर गुरदासपुर से सनी देओल को भी टिकट दिया गया है। सनी अपने शर्मीले स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। उन्हें कभी किसी ने सार्वजनिक तौर पर बतियाते-बोलते नहीं देखा, फिर वह टिकट पा गए। भाजपा आलाकमान ने सोचा होगा कि 2009 में धर्मेंद्र और फिर 2014 में हेमा मालिनी अगर उन क्षेत्रों से सिर्फ ग्लैमर के जरिए जीत सकते हैं, जिनसे उनका कोई सीधा तादात्म्य नहीं है, तो सनी क्यों नहीं? फिर वह विनोद खन्ना को ‘रिप्लेस’ करेंगे। है न स्वाभाविक?

शायद इसी आधार पर गुजरे जमाने की ग्लैमरस अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर को टिकट दिया गया। उर्मिला को इससे पहले कोई सियासी अनुभव नहीं है, पर अब वह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की मुंबई उत्तर से प्रत्याशी हैं। 

अभिनेता-अभिनेत्रियों के राजनीति में आने का सिलसिला दक्षिण भारत में तो 1960 से ही शुरू हो गया था। उत्तर भारत में इस प्रचलन ने दो दशक बाद जोर पकड़ा। मुझे याद है, अभिनेताओं को शुरुआती दौर में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। 1984 में अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से हेमवती नंदन बहुगुणा के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। उस समय इलाहाबाद को देश की बौद्धिक राजधानी मानने वाले तमाम बुद्धिजीवी इस बात से खफा थे कि प्रख्यात नेता के सामने अभिनेता को खड़ा करना अवैधानिक भले ही न हो, पर अनुचित है। 

ऐसे लोगों को समझाने-बुझाने के लिए ही हरिवंश राय बच्चन ने खुद इलाहाबाद में डेरा जमाया था। कहते हैं कि इलाहाबाद छोड़ते समय मधुशाला   के अमर लेखक ने खुद से वायदा किया था कि वह अब इस शहर की ओर रुख नहीं करेंगे। खैर, यह अब पुरानी बात हो गई। स्व. हरिवंश राय बच्चन और अमिताभ बच्चन की तुलना मौजूदा ग्लैमरस राजनीतिज्ञों से करना अनुचित होगा। 

देश की लगभग सभी पार्टियों ने सिने कलाकारों और खिलाड़ियों को तरजीह दी है। क्यों? ये पार्टियां कार्यकर्ताओं से चलती हैं। इनमें से कइयों के वरिष्ठ नेताओं ने सार्वजनिक सभाओं में दरियां बिछाई हैं और राजनीतिक फक्कड़ी का आलम जिया है। फिर ये अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं? 

जो लोग दलगत सिद्धांतों को जाने-बूझे बिना टिकट पा जाते हैं, वे पार्टी के कितने हितचिंतक हो सकते हैं? सपना चौधरी को ही लें। पहले खबर उड़ी कि उन्होंने कांगे्रस ज्वॉइन कर ली है और अगले दिन वह भाजपा से सुर-ताल मिला रही थीं। इससे अच्छी-खासी फजीहत हुई। 

यह भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य है कि इसे कुछ खानदान हांकते हैं या फिर इस तरह के संवेदनहीन लोग। क्या इसकी वजह से चुनाव-दर-चुनाव हम पतन की सीढ़ियां नहीं उतर रहे? 

राजनीति इसीलिए छल-बल-कपट का जरिया बनती जा रही है। मुझे अनाड़ी फिल्म का एक दृश्य याद आ रहा है। होता कुछ यूं है कि मोतीलाल का बटुआ राज कपूर को गिरा मिल जाता है। वह उसे मोतीलाल को लौटाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ते हैं, गुंडे बटुआ छीनने के लिए उन पर हमला कर देते हैं। बाद में किसी तरह फटेहाल वह उस क्लब में पहुंचते हैं, जहां मोतीलाल बैठे थे। किसी तरह दरबानों से जूझते हुए वह अंदर दाखिल होते हैं और मोतीलाल को बटुआ दे देते हैं। मोतीलाल उनकी ओर आश्चर्य से देखते हैं। वह जो संवाद बोलते हैं, आज तक मेरे जेहन में जस का तस कायम है- ‘ये जितने लोग यहां देख रहे हो, ये वे लोग हैं जिनको कभी न कभी, कहीं न कहीं बटुए पड़े मिले, पर उन्होंने वे बटुए लौटाए नहीं।’ 

भारतीय राजनीति भी अब भद्रलोक के ऐसे क्लब में तब्दील होती जा रही है, जहां बटुआ लौटाने के लिए आए लोग भी पहले से इकट्ठा लोगों की जमात में अपना नाम दर्ज कराने को अभिशप्त हैं। यही वजह है कि लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर जो लोग संघर्ष के जरिए सत्ता की चौहद्दियों पर कब्जा जमाते हैं, वे या तो आंदोलनकारी की खाल ओढ़े अति महत्वाकांक्षी लोग होते हैं, अथवा बाद में उन लोगों जैसे बनने के लिए अभिशप्त होते हैं, जिनकी मुखालफत ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया। यही वजह है कि लोकतंत्र कुछ खानदानों, कुछ कॉरपोरेट और कुछ ग्लैमरस लोगों का रथ होकर रह गया है। इस रथ को हांकने का दंभ, मतदाता चाहें तो पाले रह सकते हैं, पर यह सच है कि जिसे वे चुनने की शक्ति समझते हैं, दरअसल वह दूसरों द्वारा जना गया ‘जादू लोक’ है। यह लोकतंत्र है या मृग-मरीचिका?

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 5 may