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संपादकीयसहमति की राजनीति का समय

शशि शेखरPublished By: Gunateet
Sat, 04 Jan 2020 09:37 PM
सहमति की राजनीति का समय

वर्ष 2019 की आखिरी रात जैसे ही घड़ी की सुइयां 12 बजे एक-दूसरे में पैवस्त हुईं, नई दिल्ली के जामिया नगर से जोरदार गीत ध्वनि उठी। उस वक्त राजधानी के उत्सवप्रिय लोग पटाखे फोड़ रहे थे या जाम टकराकर परस्पर शुभकामनाएं दे रहे थे, पर ये लोग राष्ट्रगान गा रहे थे। कौन हैं ये लोग? ये वे लोग हैं, जो हाड़ चीरती शीतलहर में पिछले तीन हफ्तों से नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में धरनारत हैं।

ये आंदोलनकारी राष्ट्रगान के जरिए यह साबित करना चाहते थे कि हमें भारत के संविधान और संप्रभुता में गहरी आस्था है। वे शायद यह भी जताना चाहते थे कि हमारा आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है। उनमें से कइयों ने हमारे संवाददाता को कहा कि कोई अराजक तत्व हमारे बीच घुसकर बलवा न शुरू करा दे, इसके लिए हम लोगों ने बाकायदा सतर्कता दस्ते बनाए हैं। उनकी शंका जायज है।

पिछले महीने 20-21 दिसंबर को हुई हिंसा में 19 लोगों ने जान गंवाई और करोड़ों का आर्थिक नुकसान हुआ। कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की पुलिस का दावा है कि इस हिंसा को भड़काने में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के कार्यकर्ताओं का योगदान था। उन्होंने लोगों को भड़काया और हिंसा की शुरुआत हुई। इस संबंध में गिरफ्तारियां भी हुईं। उत्तर प्रदेश की हुकूमत ने तो ‘दंगाइयों’ से निपटने का एक और तरीका इस्तेमाल किया। उनके विरुद्ध न केवल विधिक कार्रवाई हुई, बल्कि संपत्ति के नुकसान के लिए जुर्माना भी लगाया गया। देश की कानूनी प्रक्रिया में इसका प्रावधान अंग्रेजों के समय से था। गोरों के वक्त में जिन जगहों पर फसाद होता था, वहां आर्थिक दंड भी लगाया जाता था, मगर आजाद भारत के इतिहास में इस कानून के उपयोग का यह पहला मामला है। इसके प्रत्युत्तर में कई जगहों पर पुलिस के अनावश्यक प्रकोप से बचने के लिए लोगों ने चंदा इकट्ठा किया और खुद ही डिमांड ड्राफ्ट प्रशासन को सौंप दिया। 

क्या आपको शाहीन बाग के आंदोलनकारियों और इन लोगों में समानता के सूत्र नहीं दिखाई पड़ रहे? दिल्ली के प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रगान और अतिरिक्त एहतियात के जरिए जहां कानूनी प्रक्रिया को मान देने का प्रयास किया है, वहीं उत्तर प्रदेश में हर जुम्मे के दिन विरोध के बावजूद हिंसा और उससे जनित सरकारी प्रकोप को रोकने के लिए समाज के स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। आप चाहें, तो इसे गांधीवादी तरीका कह सकते हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं, जो इसे पुलिस के डंडे का कमाल मानते हैं। 

हिंसा की अपनी मियाद होती है। लगता है, फिलहाल वह पूरी हो चुकी है, पर प्रतिरोध शांतिपूर्ण तरीके से लंबा खींचा जा सकता है। देश की राजधानी सहित तमाम हिस्सों में इस समय ऐसा ही हो रहा है। बात यहां तक रहती, तो मैं बहुत चिंतित नहीं होता। हमने इससे पहले भी तमाम बार सामाजिक उबाल देखे हैं, पर राजनीति की अत्यधिक दखल इस मामले को जोखिम भरा बना रही है। 

पहले अतीत की घटनाओं को आईने में उतारते हैं। मंडल आयोग के शुरुआती विप्लव को याद करें। दिल्ली में पुलिस की मौजूदगी में एक नौजवान- राजीव गोस्वामी -ने खुद को आग के हवाले कर दिया था। इससे कई जगह आक्रोश का लावा उबलने लगा था। तब निराशावादियों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब तो विभाजन से भी बुरा वक्त आने वाला है। अंगे्रजों ने तो लड़ाने के लिए धर्म का सहारा लिया था, अब जातियों को आपस में भिड़ाने की जुगत की जा रही है। इससे तो गांव-गांव सुलग उठेंगे।

ऐसा नहीं हुआ। कुछ सरकारी प्रयासों, तो कुछ हमारी एकता के ऐतिहासिक तंतुओं का कमाल था कि लोगों ने सच को स्वीकार कर लिया। बाद में जब अयोध्या में ध्वंस-लीला हुई, उस वक्त भी देश में दंगे भड़क उठे। ऐसा लगा कि हम आजादी से ठीक पहले के कुछ महीनों में पहुंच गए हैं, पर आज उन दंगों को कोई याद भी नहीं करना चाहता। भरोसा न हो, तो हाल के उन दिनों पर दृष्टि डाल देखें, जब राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था। उस समय पूरे देश में कहीं चूं-चपड़ नहीं हुई। 
तो क्या मान लें कि नागरिकता कानून और रजिस्टर पर जो गरमा-गरमी है, वह भी ठंडी पड़ जाएगी? यह तभी होगा, जब राजनेता इस मामले में संजीदगी बरतेंगे। सरकार ने इसकी मंशा भी जाहिर की है। विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आश्वासन दिया है कि इसे लागू करने से पहले सभी राजनीतिक दलों से राय-बात की जाएगी। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि इस ‘ऐक्ट’ से किसी भी भारतीय नागरिक पर असर नहीं पडे़गा, मगर अविश्वास और उससे जनित आंदोलन जारी हैं। 

नतीजतन, केरल की विधानसभा ने 31 दिसंबर को नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित करते हुए इसे रद्द करने की मांग की है। सदन के एकमात्र भाजपा विधायक ने विरोध किया, पर संसद के दोनों सदनों में अगर संख्या बल जीता था, तो त्रिवेंद्रम की विधानसभा में भी ऐसा होना ही था। भाजपा के प्रवक्ताओं ने बिना समय गंवाए इसे सांविधानिक मुद्दा करार दे दिया। इस सारे हंगामे में एक तथ्य भुला दिया गया कि नगालैंड की विधानसभा ने पिछले साल फरवरी में ही प्रस्तावित नागरिकता कानून के विरोध में प्रस्ताव पारित कर दिया था। बताने की जरूरत नहीं है कि नगालैंड सरकार में भाजपा भी हिस्सेदार है। हालांकि, विपक्ष के विधायकों ने कोहिमा स्थित सदन से बहिर्गमन कर दिया था। 

राजनीति का यह अनूठा खेल है। हमारे नेता कब कौन-सा रंग बदल लें, कोई नहीं जानता। बीजू जनता दल ने और जद-यू ने तो नागरिकता संशोधन विधेयक के समर्थन में वोट तक किया था। आज नीतीश कुमार और नवीन पटनायक उन एक दर्जन मुख्यमंत्रियों में शामिल हैं, जो एनआरसी का मुखर विरोध कर रहे हैं। 

जाहिर है, सरकार को इस मुद्दे पर छाए अविश्वास को दूर करने के लिए अभी कड़ी मेहनत करनी है। हुकूमत में होने के कारण यह उसका दायित्व भी है कि वह देश में पनप रहे असंतोष को रोके और विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ सार्थक सहमति बनाने की कोशिश करे। 

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