अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

भाजपा और कांग्रेस के चक्रव्यूह

शशि शेखर

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का बावेला, मराठवाड़ा के शोले, दुश्मनों की तरह दहाड़ते सियासी दोस्त और कल तक शत्रुता की कड़वाहट उगल रही राजनीतिक हस्तियों के बदलते सुर! इन उलटबांसियों का इकलौता अर्थ है- चुनाव। आयोग की घोषणा का इंतजार किए बिना हमारे राजनेताओं ने मोर्चे खोल दिए हैं। यह लड़ाई मायावी है।

इस वक्त आप आकाश पर जो उभरता देख रहे हैं, उससे कई गुना सियासी हरम में रचा जा रहा है। एक उदाहरण। देश के वरिष्ठतम राजनीतिज्ञों में शुमार किए जाने वाले रामविलास पासवान ने एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर अपनी ही सरकार को अल्टीमेटम दे रखा था। रामदास अठावले सहित एनडीए के तमाम दलित सांसद उनके सुर में सुर मिला रहे थे। अब जब सरकार ने संशोधित बिल लाने की घोषणा कर दी है, तब सवाल उठता है- सरकार आपकी, संसद में बहुमत आपका, तो अंत:पुर में की जाने वाली बात को आप चौराहे पर क्यों लाए? मंशा यकीनन ‘हाइप क्रिएट’ कर ‘के्रडिट’ लेने की थी। 

यह तो था लड़ाई का एक तरीका। इसके उलट शिवसेना मुंबई और नई दिल्ली के सत्ता सदन पर काबिज होने के बावजूद भाजपा और उसके कर्णधारों पर हमले का कोई मौका नहीं चूकती। भला क्यों? विरोध करना है, तो सत्ता की मलाई छोड़िए, संघर्ष का कड़वा स्वाद चखना शुरू कीजिए। दरअसल, हमारे राजनेता ‘मीठा-मीठा गप, कड़वा-कड़वा थू’ की नीति पर चल रहे हैं। शिवसेना बड़ा दल है, पर नितांत स्थानीय धड़े तक ऐसा कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मंत्री ओमप्रकाश राजभर के बयानों पर गौर कर देखिए। वह सहमति और असहमति, दोनों के सुर एक साथ छेड़ते हैं। अभी तक साफ नहीं है कि 2019 में वह किस राह पर चलेंगे, मगर हरसंभव लाभ अर्जित करने की उनकी मंशा संदेह से परे है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक मोल-तोल का ऐसा ही तरल और कीचड़ भरा माहौल है। दोनों बडे़ राष्ट्रीय दल इस दलदल से उबरने के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं।
आप चाहें, तो इसे सौदेबाजी कह सकते हैं। 

बिहार का उदाहरण लें। 2014 के चुनाव में नीतीश कुमार एनडीए के हमराह नहीं थे। उनके साथ आने से अगर गठबंधन को ताकत मिली है, तो नई पेचीदगियां भी पैदा हो गई हैं। जनता दल (यू) का कहना है कि इस गठबंधन में हमारा दर्जा ‘बडे़ भाई’ का होना चाहिए। इसका अपरोक्ष अर्थ है कि बिहार की बंदरबांट में सर्वाधिक हिस्सेदारी हमें चाहिए। उधर, रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा  की भी अपनी मौजूदा सीटों पर दावेदारी बनती है। पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के पास छह और कुशवाहा की पार्टी के पास तीन सांसद हैं। भाजपा का धर्मसंकट भी यही है। यदि वह इन पुराने साथियों और दोबारा गठबंधन का हिस्सा बने जद-यू को उनकी इच्छा के अनुरूप सीटें प्रदान कर दे, तो राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद उसके पास कम सीटें रह जाएंगी। 

कांग्रेस भी इस सौदेबाजी की शिकार हो रही है। पार्टी ने अध्यक्ष राहुल गांधी को चुनावी समझौतों के लिए अधिकृत किया है। राहुल जानते हैं कि उन्हें तमाम अंदरूनी और बाहरी मुद्दों पर एक साथ जूझना है। इसके लिए वह भगीरथ प्रयास भी कर रहे हैं, पर दोस्त और दुश्मन एक ही पाले में खड़े हो जाएं, तो रास्ता दुरूह हो जाता है। उत्तर प्रदेश इसका जीता-जागता उदाहरण है। अब जब खबरें उड़ रही हैं कि कांग्रेस, सपा, बसपा और लोकदल में गुपचुप सहमति बन गई है, तो अटकलें लग रही हैं कि किसके हिस्से में कितना आया? इस सवाल के जवाब में शीर्ष नेताओं ने चुप्पी साध रखी है। वे जानते हैं, मुंह खोलते ही भगदड़ मच जाएगी।

इस अबोले समझौते ने एक और प्रश्न को जन्म दे दिया है। क्या कांग्रेस-बसपा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की विधानसभा चुनावों के लिए जुगलबंदी कर रही हैं? बहुजन समाज पार्टी इन राज्यों में थोड़ा-बहुत आधार रखती है। अजित सिंह हरियाणा में आंशिक मदद करने में सक्षम हैं। क्या उन्हें वहां साथ ले लिया जाए? ऊपर से देखने पर ऐसी दोस्तियां मनभावन लगती हैं, पर कांग्रेस के लिए कुछ आशंकाएं भी उपजती हैं। अतीत में उत्तर प्रदेश में उसने सपा, बसपा, दोनों को समर्थन दिया और बदले में अपना जनाधार गंवाया। इसके बावजूद कांग्रेस जोखिम ले रही है। कर्नाटक का प्रयोग इसका नमूना है। 

राजनीति हिम्मत और हौसले से चलती है। राहुल गांधी फिलवक्त इस पुराने मुहावरे को पूरी तरह अमल में ला रहे हैं। वह 2019 में किसी भी कीमत पर भाजपा का विजय रथ रोकना चाहते हैं। इसके लिए वह नि:संकोच कांग्रेस के पुराने दोस्तों की मदद ले रहे हैं। पवार और मायावती की मुलाकात। उमर अब्दुल्ला का कोलकाता जाना और फिर ममता बनर्जी का दिल्ली आना। यहां सोनिया-राहुल सहित तमाम विपक्षियों से भेंट-मुलाकात के दौरान लालकृष्ण आडवाणी का चरण स्पर्श! यहां जिस तरह शिवसेना सहित तमाम पार्टियों के नेता उनसे मिलने को उमड़ पड़े, इससे गदगद ‘दीदी’ ने दो महत्वपूर्ण घोषणाओं के जरिए स्थिति साफ कर दी। पहली, मैं प्रधानमंत्री पद की दावेदार नहीं। दूसरी, 2019 में भाजपा के सामने संयुक्त विपक्ष होगा। आपको क्या यह सब अनायास लगता है? गलतफहमी मत पाल लीजिएगा। राजनीति में कुछ भी अचानक नहीं होता।

यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी रणनीति में जरूरी तब्दीली कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 27 जून से 29 जुलाई के बीच पांच बार उत्तर प्रदेश के दौरे पर गए। हर बार उन्होंने विपक्ष की तगड़ी लानत-मलामत की। अमित शाह ने एनआरसी मुद्दे पर जिस कड़ी भाषा            का उपयोग किया, वह साफ जताता है कि वह पूर्वोत्तर और पश्चिम बंगाल के साथ देश भर के मतदाताओं को संदेश दे रहे थे। भाजपा जानती है कि संयुक्त विपक्ष से लड़ने का एक ही उपाय है- किसी तरह 50 फीसदी मतों का ध्रुवीकरण किया जाए। हालांकि, यह ऐसा ख्वाब है, जिसे भाजपा के तमाम नेताओं ने बरसों-बरस देखा, पर पूरा कोई नहीं कर सका। इस मकसद को पूरा करने के लिए अमित शाह साल के हर दिन चुनाव लड़ने जितनी मेहनत करते हैं। 

साफ है, कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे की नितांत विपरीत नीति अपना रहे हैं। दोनों के अपने-अपने चक्रव्यूह हैं। देखना है, देश किसका साथ देता है?

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें
shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 5 august