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पिता की अस्थियां और आस्थाएं

शशि शेखर

उत्तर भारत के शहरों पर प्रदूषण ने चादर तान दी है। धूप बेदम हो गई है और हवा जहरीली। पानी पहले से इतना बेहाल है कि बिना शोधे पिया नहीं जा सकता। शोर ऐसा कि नवजात शिशुओं की सुनने की क्षमता हमेशा के लिए प्रभावित होने की आशंका गहराने लगी है। 
नतीजतन, लोगों की आंखें जल रही हैं। डॉक्टर के पास जाने पर बहुतों को स्टेरॉयड देने की जरूरत महसूस होती है। दमा और श्वास संबंधी दिक्कतों के लिए बहुत से लोग पहले से इनका सेवन कर रहे हैं। आपके सुनने और यहां तक कि देखने तक पर खतरा पैदा हो गया है। आप जिन दवाओं का सहारा लेते हैं, वे भी दीर्घ अवधि में खतरनाक साबित हो सकती हैं। बताने की जरूरत नहीं कि सिर्फ हम नहीं, बल्कि समूची इंसानियत खतरे में है। 
सवाल उठता है कि इसे बचाने की जिम्मेदारी किस पर है? सिर्फ सरकारों की? तो आपकी-हमारी भूमिका क्या है? हमेशा शिकायत करने वालों को जान लेना चाहिए कि जो सिर्फ समस्या का रोना रोते हैं, वे खुद उसी का स्थाई हिस्सा होते हैं। एक निजी अनुभव से अपनी बात स्पष्ट करना चाहूंगा। 

पिछले सोमवार को मेरे पिता गुजर गए। उन्होंने 89 वर्ष की भरी-पूरी जिंदगी जी। निधन से तीन सप्ताह पूर्व उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई थी। उसका ऑपरेशन हुआ, जो पता नहीं कितना सफल या असफल रहा, पर इसी बीच उनके फेफडे़ संक्रमण के शिकार हो गए। फौरी तौर पर यही उनके देहावसान का कारण बना। इसके साथ शुरू हुआ एक ऐसा सिलसिला, जिसके मेरे पिता खुद विरोधी थे। दाह संस्कार से पहले तमाम लोग तरह-तरह की परंपराएं, विचार और असंगत उदाहरणों के साथ हाजिर थे। हर शख्स मानता था कि सिर्फ वही सही है और अन्य सभी गलत। 
इतने सारे मत-मतांतर के साथ किसी निष्कर्ष पर पहुंचना असंभव था। 

बहरहाल, दाह संस्कार के अगले दिन ‘फूल’ चुनने थे। अपने पिता की अस्थियां चुनते हुए पुत्र कितने भावुक हो सकते हैं, यह बताने की जरूरत नहीं, मगर सिर पर सवार पंडित और श्मशान के कर्ता-धर्ता उन्हें शोक जीने का अवसर दें, तब न! अजीब जद्दोजहद थी, जिससे जूझना था, हम जूझने में कामयाब रहे। कुछ ही देर में हमारे हाथ में अस्थियां थीं और एक अनजान व्यक्ति बोरी में समूची राख लेकर सामने खड़ा था। 

मुझे सलाह दी गई कि आप अस्थियों को हरिद्वार के ब्रह्मकुंड में प्रवाहित करें और राख को उससे पहले कहीं गंगा में ‘डाल’ दें। उसके हाथ में जज्ब बोरे में जो राख थी, वह सिर्फ लकड़ियां जलने से नहीं उपजी थी। उसमें ऐसे व्यक्ति के अंतिम अवशेष समाए थे, जिसके जरिए अगली तीन पीढ़ियां अस्तित्व में आईं। 20वीं और 21वीं शताब्दी में उस शख्स ने सिर्फ सांसें ही नहीं लीं, बल्कि अपना भरपूर योगदान अदा किया था। मैं उनकी आखिरी भौतिक निशानी को यूं ही कहीं ‘डाल’ दूं! वह भी उस गंगा में, जिसे उन्होंने ताजिंदगी बेहद प्यार और सम्मान दिया। वह मेरे पिता थे, जिन्होंने 1970 के दशक में काशी के अस्सी घाट पर किसी को साबुन से स्नान करता देख अपने बच्चों को सिखाया था कि यह जो जलधारा सामने बह रही है, वह सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि हम हिन्दुस्तानियों और हिन्दुस्तान की जननी है। इसे गंदा करना, अपनी मां के साथ गलीज व्यवहार करने जैसा है। 

पर बांस झुलाते उस व्यक्ति को क्या दोष देना? वैदिक और लौकिक संस्कृत के जो दर्जनों ऋचाएं, सूक्त अथवा श्लोक पिता ने सिखाए थे, उनमें से किसी एक का खुद को ‘पंडित’ कहलाने वाला वह शख्स न तो उच्चारण कर सकता था और न ही उसका अर्थ जानता था। अजीब धर्म-संकट था, गंगा के लिए मना करूं, तो वहां खडे़ तमाम ‘अपने’ उलाहना देने लगते। बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि गंगा में तो राख प्रवाहित करने पर रोक है। जवाब हाजिर था। कोई बात नहीं, हरिद्वार के रास्ते में तमाम नदियां पड़ती हैं, कहीं भी ‘डाल’ देना। उफ्फ, यह ‘डालना’! 
खैर, राख के साथ अस्थियां मेरे हवाले थीं और स्वर्गीय पिता की नसीहतें भी। अब मैं आजाद था।

हरिद्वार के ब्रह्मकुंड का हाल तो और भी गजब था। गंगा से निकलने वाली बैराज हर वर्ष दशहरे पर सफाई के लिए बंद कर दी जाती है। थोड़ा सा जल बांध की दरारों से रिस-रिसकर आता रहता है और पहले से जमा पानी में मिलता रहता है। साथ के लोगों ने कहा कि आप इसी में अस्थियां प्रवाहित कर दें। सुबह से तमाम लोग ऐसा कर चुके हैं। देखा कि बेहद मंथर और उथले जल के अंदर छिपे ब्रह्मकुंड के आसपास दर्जनों लोग नहा रहे हैं। कुछ किलकारियां मार रहे हैं। कुछ बतकही में मशगूल हैं। कुछ सर्दी के मारे कंपकंपा रहे हैं। इसी पानी में लोग प्रविष्ट होते और अस्थियां ‘डाल’ देते। अस्थियों की वजह से परिवर्तित रंग वाला जल उन लोगों के शरीर को ‘धोता’ हुआ आगे निकल जाता। जल के साथ जो हो रहा है, वह तो अपनी जगह है, पर हम गंगा और अपने स्वास्थ्य के साथ क्या कर रहे हैं? मन में उभरा यह सवाल बिच्छू के दंश से कम पीड़ादायक नहीं था। 

यह तो सिर्फ दो उदाहरण थे, बात बहुत लंबी है। खींचूं, तो खिंचती चली जाएगी, पर मैं यहां अपनी निजी त्रासदी का नहीं, बल्कि उसके जरिए उन हालात का वर्णन करना चाहता हूं, जिसे मैंने उन 48 घंटों में देखा और समझा। ये स्थितियां हम सबकी जिंदगी में आती हैं और इस पर खुले दिमाग से सामूहिक चिंतन की आवश्यकता है। क्यों न सभी धर्मों के विद्वान इस गंभीर मुद्दे पर चिंतन कर हमें नए रास्ते सुझाएं? लगभग सभी धर्मों में ऐसी तमाम परंपराएं हैं, जिनका पुनर्निर्धारण जरूरी है। हमारे देश के लंबे इतिहास में ऐसे कई अवसर आए हैं, जब धर्माचार्यों ने प्रकृति और मानवता के तालमेल की नई इबारत लिखी है। 

अब तक वे अलग-अलग ऐसी व्याख्याएं करते हैं, पर अब उन्हें एक साथ आना ही होगा, क्योंकि मामला किसी धर्म विशेष अथवा उसकी परंपराओं का नहीं, बल्कि प्रकृति का है। उस प्रकृति का, जिसकी हम सब संतानें हैं। वह नहीं, तो हम नहीं।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 4 november