DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

युद्ध समाधान नहीं लाते

शशि शेखर

नमस्ते। आपका लेख पढ़ा, थोड़ा निराश हुआ। युद्धोन्माद में बदला तात्कालिक संतोष तो देगा, पर स्थाई समाधान नहीं। मनमोहन सिंह ने बदला नहीं लिया, पर कश्मीर को काफी शांत कर दिया था। अगर इसके बाद भी आतंकी हमला नहीं रुका, तो क्या इस्लामाबाद पर हमला करेंगे?
 
यह संदेश एक स्नेही मित्र ने मेरी त्वरित टिप्पणी पढ़ने के तत्काल बाद लिख भेजा था। अंतत: हम बेटों की मौत का बदला लेना सीख गए  शीर्षक वाली इस टिप्पणी में मैंने पाकिस्तान में भारतीय लड़ाकू विमानों द्वारा की गई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ का समर्थन किया था। मैं अकेला न था। अमेरिका के अक्खड़ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत पचास से अधिक देशों ने लगभग ऐसे ही विचार व्यक्त किए थे। आत्मरक्षा हमारा अधिकार है और कर्तव्य भी।

इधर के कुछ सालों में दुनिया तेजी से बदली है। मर्यादाओं और कूटनीतिक शिष्टाचार की पुरानी बंदिशों को नए उभरते समीकरणों ने बदल डाला है। आज से 25 साल पहले क्या कोई सोच सकता था कि चीन अमेरिका की आंखों में आंखें डाल रहा होगा, उत्तर कोरिया का अधिनायक किम जोंग-उन अमेरिका के राष्ट्रपति की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा होगा, दोनों कोरिया पुरानी अदावत पर खाक डालने में जुटे होंगे और रूस की सेनाएं पाकिस्तानी दस्तों के साथ युद्धाभ्यास कर रही होंगी? ऐसे में, भारत भला क्यों पुरानी सकुचाहटों और शर्म की शव-साधना करता रहे? हम अपने पुराने मुखौटे क्यों न उतार फेंकें? 

आज पाकिस्तान दावा कुछ भी करे, पर यह सच है कि आतंकियों के खिलाफ 26 फरवरी की हवाई कार्रवाई के बाद अगले दिन जिस तरह से उसके विमानों को खदेड़ा गया, उससे स्पष्ट हो गया कि न हम झुकेंगे, न दबेंगे। अगर पाक आतंक समर्थक रुख से पीछे नहीं हटा, तो अब भारत रुकने वाला नहीं है। यही नहीं, विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान के लहूलुहान फोटो वायरल कराकर पाकिस्तानी हुक्मरां और उनके समर्थक दूसरी गलती कर बैठे थे। इससे समूचे भारत में क्रोध-लहर दौड़ गई और सत्ता पक्ष भी इससे अछूता न था। गुरुवार की सुबह विदेश सचिव की यह घोषणा कि अगर अभिनंदन सकुशल वापस न लौटे, तो भारत किसी भी हद तक जाने को तैयार है, साफ संकेत था कि हिन्दुस्तान ने आस्तीनें चढ़ा ली हैं।

जाहिर है, अंदरखाने शांति के प्रयास चल रहे थे। पाकिस्तान का सरपरस्त चीन हो या समूची दुनिया का स्वघोषित दारोगा अमेरिका अथवा कोई और महाशक्ति, सबको लग रहा था कि परमाणु शक्ति संपन्न दो उभरते बाजारों का आपसी संघर्ष अर्थप्रधान दुनिया के हित में नहीं। यही वजह है कि तनाव कम करने के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया कि भारत-पाक से अच्छी खबर आने वाली है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के दशकों पुराने विवाद के सुलझने की उम्मीद है। नतीजतन, पहले से बातचीत की पेशकश कर रहे इमरान खान ने अभिनंदन को छोड़ने की घोषणा कर डाली। पाकिस्तान के सत्तानायकों में प्रचलित परंपरा के विपरीत इमरान खान ने तुरंत फैसला किया। 1999 में वायु सेना अफसर नचिकेता को लौटाने में आठ दिन लगे थे। यहां इस बात को भी नजरंदाज नहीं करना चाहिए कि अभिनंदन को छोड़ने के लिए पाकिस्तान के बहुत से नागरिक भी सड़कों पर उतर प्रदर्शन कर रहे थे।

शुक्रवार को हमारे जांबाज अभिनंदन ने जब वाघा के रास्ते भारतीय सीमा मेंकदम रखा, तो पूरे देश में ख़ुशियां हिलोरें मारने लगीं। यह शख्स पिछले दो दिनों से 125 करोड़ से अधिक लोगों की दुआओं में शामिल था। इन पुलकित लम्हों में आप जितना चाहें, उतना विभोर हो लें, पर ध्यान रखना होगा कि हम कहीं अपने मूल लक्ष्य से न भटक जाएं। यह समूचा विवाद पुलवामा में हुए हत्यारे हमले से शुरू हुआ था। उस घिनौने हत्याकांड का वास्तुकार मसूद अजहर अब भी पाकिस्तानी सेना के साये में महफूज है। हो सकता है, कई बार उसे बचा चुका चीन इस बार पीछे हट जाए और संयुक्त राष्ट्र उस पर प्रतिबंध लगा दे, पर उससे होगा क्या? हाफिज सईद पर अमेरिका ने भारी-भरकम इनाम घोषित कर रखा है, पर वह पाकिस्तान में छुट्टे सांड़ की तरह घूम रहा है। हाफिज सईद, मसूद अजहर, दाऊद इब्राहीम और इन जैसे तमाम भारत द्रोहियों को सौंपने के लिए नई दिल्ली को दबाव बढ़ाना होगा।

इतिहास गवाह है कि अधूरी लड़ाइयां विजेताओं के लिए घातक साबित हुई हैं। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने यकीनन इस तथ्य पर विचार कर रखा है। यही वजह है कि इमरान खान की घोषणा के बाद अपने पहले सार्वजनिक भाषण में उन्होंने कहा कि आज एक पायलट प्रोजेक्ट पूरा हुआ। मतलब साफ है कि नई दिल्ली इस जद्दोजहद को उसके अंजाम तक ले जाने के लिए तैयार है। अतीत गवाह है कि जंग का मैदान हो या कूटनीति की बिसात, पाकिस्तान हारने के बाद भी नहीं सुधरता। उदाहरण देता हूं। 1971 में अपने देश के दो टुकडे़ हो जाने के बावजूद उसने पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद फैलाया। वहां के जनरल साहिबान जानते थे कि भारत से आमने-सामने की लड़ाई कभी जीती नहीं जा सकती, इसीलिए उन्होंने हमें हजार घाव देने की रणनीति बनाई। 1980 के दशक की शुरुआत से यह छद्म लड़ाई जारी है। हाफिज सईद और मसूद अजहर तो बस इस खूनी जंग के मोहरे हैं।

गुरुवार को एक तरफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अभिनंदन को छोड़ने की घोषणा कर रहे थे, तो दूसरी तरफ नियंत्रण रेखा पर पाक आर्मी गोलीबारी कर रही थी, जिसका भारतीय सेना ने माकूल जवाब दिया। उम्मीद है, आप इसका आशय समझ गए होंगे। गए सत्तर साल का इतिहास उठा देखिए। हमारा सहोदर पाकिस्तान एक कदम पीछे खींच हमेशा दो कदम आगे बढ़ाने की चाल चलता रहा है। चार युद्ध और अनगिनत आतंकी हमले इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। 1999 में जब नवाज शरीफ, अटल बिहारी वाजपेयी से दोस्ती की कसमें खा रहे थे, तो उसी दौरान उनके सेनानायक परवेज मुशर्रफ कारगिल की बर्फीली चोटियों को हमारे नौजवानों के रक्त से लाल करने का सरंजाम जुटा रहे थे। तब से पुलवामा तक यह ख़ूनी खेल जारी है।

इसे सदा-सर्वदा के लिए रोकने का वक्त आ गया है। भारत ने इस बार धमाके का जवाब धमाकों से दिया है। अब सतर्क और स्पष्ट कूटनीति का वक्त है। याद रहे, दोनों महायुद्धों का अंतिम फैसला भी मैदान-ए-जंग में नहीं, कूटनीति की बिसात पर हुआ था। स्पष्ट है, हम पांचवीं जंग जीत लें, तो भी समाधान नहीं निकलेगा। युद्ध सिर्फ बर्बादी और बदले की भावना लाते हैं। सोशल मीडिया के आभासी योद्धा कृपया इस तथ्य पर ध्यान दें।

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें
shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 3 march