DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मजबूत बनाम मजबूर सरकार

शशि शेखर

भारतीय राजनीति के  नक्कारखाने में इस वक्त दो शब्द समूचे जोर-शोर से घनघना रहे हैं- ‘मजबूत’ और ‘मजबूर’। सियासी महारथियों का एक धड़ा है, जो केंद्र में ‘मजबूत’ सरकार की वकालत करते हुए मतदाताओं का मन मोहने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ वे लोग हैं, जिन्हें नई दिल्ली में ‘मजबूर’ सरकार सुहाती है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि मजबूत सरकार के अपने लाभ हैं, पर ऐसा भी देखने में आया है, जब कुछ  सत्तानायकों ने मजबूरी के आगे घुटने टेकने की जगह मजबूत रुख अपनाया। इस मुद्दे पर चर्चा से पहले एक बार खिचड़ी सरकारों के उतार-चढ़ाव पर नजर डाल लेते हैं।

1967 के आम चुनाव के बाद आठ राज्यों में कांग्रेस का शीराजा पहली बार बिखरा था। इसी के साथ देश में खिचड़ी सरकारों की संस्कृति का जन्म हुआ। इस दौरान उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तमिलनाडु, केरल, राजस्थान और पंजाब में कांग्रेस विरोधी दलों ने साझा सरकारों का गठन किया। ये सियासी समझौते अल्पजीवी साबित हुए। अगले चार वर्षों में 32 बार सरकारें बनीं और बिखरीं। बिहार ने तो इस दौरान रिकॉर्ड ही रच दिया। वहां नौ सरकारें सत्ता में आईं और धराशाई हो गईं। पड़ोसी उत्तर प्रदेश ने इस अवधि में छह सरकारों का उत्थान और पतन देखा। 

अब आते हैं केंद्र के सत्ता-चक्र पर। नई दिल्ली के तख्त पर अब तक छह प्रधानमंत्री- मोरारजी देसाई, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, हरदनहल्ली डोडेगौड़ा देवेगौड़ा, और इंद्रकुमार गुजराल ऐसे गठबंधनों की उपज थे, जिनका जन्म जैसे क्षरण की गोद में हुआ था। और तो और, खुद अटल बिहारी वाजपेयी पहले कार्यकाल में महज 13 दिन के बादशाह साबित हुए थे। क्या इन प्रधानमंत्रियों ने देश के लिए कोई महत्वपूर्ण फैसला नहीं किया? इस सवाल को परखने पर तमाम हैरतअंगेज तथ्य उभरते हैं।

मुझे याद है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जाते-जाते मंडल आयोग लागू कर गए थे। इस पर जबरदस्त हंगामा बरपा हुआ था, परंतु पिछड़ों के लिए आरक्षण की यह व्यवस्था बरसों से दबे-कुचले लोगों के आगे आने का जरिया बनी। यही नहीं, देश की राजनीति ने उस वक्त ऐसा पलटा खाया कि आज तक लोग उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों गरीब अगड़ों के लिए जो 10 फीसदी आरक्षण लागू किया है, उसकी जरूरत भी इसी मंडल आयोग के कारण महसूस हुई। 

मैंने जो नाम ऊपर गिनाए, उनमें सिर्फ देवेगौड़ा सशरीर हमारे बीच हैं। उन्हें इस बात का मलाल है कि उनको मजबूत प्रधानमंत्री नहीं माना जाता। पिछले दिनों ममता बनर्जी के आह्वान पर कोलकाता में सियासी दिग्गजों का जो जमावड़ा हुआ, उसमें उन्होंने आक्रोशपूर्वक दावा किया था कि दिल्ली मेट्रो और देश का सबसे लंबा बोगीबील पुल उन्हीं की सरकार के वक्त में पास किया गया था। 

नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने भी कठोर फैसले लेते वक्त अपनी खिचड़ी सरकारें दांव पर लगा दी थीं। नरसिम्हा राव राजीव गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की कुरसी पर विराजे थे। उन्हीं के निर्देशन में मनमोहन सिंह ने देश में आर्थिक उदारीकरण की नींव रखी थी। आज अगर भारत विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देखता है, तो उसके मूल में राव और सिंह की दूरदृष्टि भी है। 

इसी तरह, मायावती, ममता और जयललिता की बैसाखियों पर खड़ी अटल सरकार अक्सर ‘तीन देवियों’ में किसी एक या दो की नाराजगी से कंपकंपाती रहती थी। इसके बावजूद वाजपेयी ने पोखरण में परमाणु परीक्षण करके जता दिया था कि भारत का परमाणु कार्यक्रम छलावा नहीं, हकीकत है। 11 से 13 मई, 1998 के बीच पोखरण में हुए इन परीक्षणों के बाद से दुनिया हमें आधिकारिक तौर पर परमाणु शक्ति मानने को मजबूर हुई। मनमोहन सिंह ने भी परमाणु ऊर्जा समझौते के वक्त वामपंथियों का पुराना साथ गंवाना गवारा किया था। अगर उस वक्त समाजवादी पार्टी आगे न आई होती, तो संप्रग सरकार धराशाई हो गई होती।

इन तथ्यों के आलोक में क्या यह तय नहीं होता कि सत्तानायक की मंशा मजबूत या कमजोर होती है, गठबंधन नहीं? गठबंधनों की बात पर याद आया। आज भाजपा हो या कांग्रेस, दोनों ही अपने सहयोगियों को साथ रखने में खासी दिक्कत का सामना कर रही हैं। शिव सेना के तेवर सबके सामने हैं। उद्धव ठाकरे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर दिल्ली सरकार की आलोचना का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते। शिव सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि अगले चुनावों के दौरान हम महाराष्ट्र में ‘बड़े भाई’ की भूमिका अदा करेंगे। तय है, भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी लोकसभा और विधानसभा में कम सीटें होने के बावजूद बराबरी की सीट चाहती है। मौजूदा हालात में भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के बाद सर्वाधिक सीटें रखने वाले महाराष्ट्र में ‘शिव सेना’ की अनदेखी नहीं कर सकती। ‘मातोश्री’ में बैठे ठाकरे इसका फायदा उठाना चाहते हैं।

बिहार में नीतीश कुमार इससे पहले ‘बड़े भाई’ की भूमिका इसी तरह हासिल कर चुके हैं। लोकसभा में जद-यू का प्रतिनिधित्व तो शिव सेना के मुकाबले बेहद कम था, इसके बावजूद वह भाजपा से उसके बराबर सीटें हासिल करने में   कामयाब रहा। पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा भी इसी तर्ज पर अपनी शर्तें मनवाने में सफल रही थी। 

यही हाल कांग्रेस का है। मोदी और शाह की आंधी रोकने के लिए राहुल गांधी ने कर्नाटक में नायाब सियासी कौशल दिखाया था। उन्होंने महज 37 सीटों वाली जेडी (एस) को सरकार बनाने के लिए समर्थन दिया और कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बन बैठे। विचित्र संयोग है। जिस दिन शिव सेना भाजपा को आंखें दिखा रही थी, उसी दिन कुमारस्वामी कर्नाटक में कांग्रेस को धमका रहे थे। वह जब चाहें, तब पद छोड़ने की धमकी देकर अपने विशाल सहयोगी को सांसत में डाल देते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि उन्हें भी आने वाले लोकसभा चुनावों में ज्यादा से ज्यादा सीटों की दरकार है और मोल-भाव का इससे बेहतर अवसर भला और क्या हो सकता है? इससे  पहले उत्तर प्रदेश में पुरानी सहयोगी सपा ने बसपा से समझौता करते वक्त कांग्रेस से सलाह तक नहीं की।

तय है, दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को आने वाले दिनों में इसी तरह के सियासी दांव-पेच से रूबरू होना पडे़गा। आप चाहें, तो ‘मजबूत’ बनाम ‘मजबूर’ सरकार की बहस आगे बढ़ा सकते हैं, पर यह तय है कि क्षेत्रीय दल मजबूत से मजबूत केंद्रीय नेतृत्व को उनकी मजबूरियों की याद दिलाते रहेंगे। यह सिलसिला भारत जैसे विशाल और बहुलतावादी देश में आसानी से थमने वाला नहीं है। 

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें
shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 3 february