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सियासत को साहूकारी से बचाएं

शशि शेखर

लोकसभा चुनाव की कवरेज के दौरान देश के मुख्तलिफ हिस्सों में घूमते हुए अचानक एक पुराना किस्सा याद आ गया। आप भी सुनिए। 
बात 1974 की है। एक सरकारी अधिकारी की पत्नी संयोगवश श्रीमती इंदिरा गांधी के संपर्क में आईं और देश के लिए कुछ करने की इच्छा जाहिर की। छोटी-सी मुलाकात में वह नौजवान महिला अपना असर छोड़ने में कामयाब रही और विधानसभा के आने वाले चुनाव में कांग्रेस ने उनको उत्तर प्रदेश में एक विधानसभा क्षेत्र से टिकट भी दे दिया। महिला ने इंदिरा गांधी से पेशकश तो कर दी थी, पर वे और उनका परिवार चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं था। दो दिन तो उनके घर में बहस चलती रही कि चुनाव लड़ा जाए या माफी मांगते हुए टिकट लौटा दिया जाए? काफी दिमागी जद्दोजहद के बाद तय पाया गया- न दैन्यम्, न पलायनम्।  श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धक्षेत्र में जो लंबा उपदेश दिया था, उसकी एक शिक्षा यह भी थी- न दीनता और न पलायन, यानी चुनाव लड़ा जाए। अगले दिन वह दंपति बाल-बच्चों सहित उस निर्वाचन क्षेत्र में पहुंच गया, जहां से टिकट मिला था। बरसों पहले वह नेक महिला उसी क्षेत्र के एक गांव में ब्याहकर आई थीं। बच्चे छोटे थे और उन्हें अथवा पति को सियासत का कोई अनुभव नहीं था। यहां से समूचे परिवार की नई अनुभव यात्रा शुरू हुई। 

परिवार इतना आदर्शवादी था कि उसे बच्चों के नाम के आगे जातिसूचक शब्द लगाने तक से परहेज था। वहां जाकर मालूम पड़ा कि टिकट ही इसलिए मिला है कि वह एक जाति विशेष से ताल्लुक रखती हैं। यह अपशकुनों की शुरुआत मात्र थी। उन्हें सबसे बड़ा आश्चर्य तब हुआ, जब वह प्रचार के दौरान एक ऐसे गांव में पहुंचीं, जहां उनके पति के मौसेरे भाई रहते थे। ‘भाई साहब’ सक्रिय राजनीति से जुडे़ थे और पिछड़ी समझी जाने वाली एक जाति के 8-10 हजार मतों पर उनका आधिपत्य माना जाता था। 

शुरुआती स्वागत-सत्कार के बाद मुद्दे पर बात शुरू हुई और ‘भाई साहब’ ने ‘छोटे लोगों’ को शराब पिलाने के लिए दस हजार रुपये की मांग कर दी। यह मांग किसी सदमे से कम न थी, क्योंकि जो सज्जन इसे उठा रहे थे, वह बरसों से कहते आए थे कि यदि भाभी या भैया में कोई भी चुनाव लडे़गा, तो हम पूरा जी-जान लगा देंगे। उस चुनाव में जन-बल और धन-बल का ऐसा नंगा नाच दिखाई पड़ा, जो चौंकाता और डराता था। महिला ने ऐसी राजनीति में और धंसने की बजाय खुद को अलग करने की सोची और अपने पैर वापस खींच लिए। 

उन दिनों वह अपने बच्चों से कहती थीं कि देखना, एक दिन ऐसा आएगा, जब राजनीति साफ-सुथरी होगी। अभी यह कर्म-कुकर्म इसलिए हो रहा है, क्योंकि हमारे देश में अशिक्षा और जहालत भरी पड़ी है। जैसे-जैसे हमारी आजादी का सफर आगे बढे़गा, वैसे-वैसे लोग परिपक्व होते जाएंगे। ऐसा नहीं है कि वह चुनावी हार से हकबकाए बच्चों को दिलासा दे रही होतीं। उनको यकीन था कि ऐसा ही होगा। कितनी गलत थीं वह! आप याद करें। 1970 के दशक में भारत की करीब 55 करोड़ आबादी में महज 37 प्रतिशत लोग साक्षर थे। अब भारत में 125 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं और आबादी के साथ ही हमारी साक्षरता दर ने भी 74.04 प्रतिशत तक की लंबी छलांग लगाई है। समय बदला, शिक्षा बढ़ी और डिजिटल उपकरणों ने समझ पर असर डाला, पर क्या चुनाव से पैसे का खेल खत्म हुआ? 

इस सवाल के उत्तर के लिए आपको धारवाड़, कर्नाटक में लिए चलता हूं। वहां पिछले हफ्ते गांव वालों से बात करने पर जो जानकारियां मिलीं, उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह थी कि बहुत से परिवार प्रति वोट निश्चित रकम पाते हैं। शराब और कबाब तो दस्तूर की तरह पहले से ही कायम हैं। पत्रकारिता छोड़कर कुछ दिनों के लिए राजनीति में आए मेरे एक मित्र को 2014 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी के पास रोहनिया में समान अनुभव हुआ था। वह अरविंद केजरीवाल का प्रचार करने एक गांव में पहुंचे, तो एक महिला ने उनसे भोजपुरी में कहा- ‘वोट चाही, तो पैसवा द।’ साफ है, उत्तर से लेकर दक्षिण तक भारतीय लोकतंत्र को धन-तंत्र सर्वाधिक प्रभावित करता रहा है। इसी का नतीजा है कि 14वीं लोकसभा में जहां करोड़पति सदस्यों की संख्या 156 थी, वह अगली लोकसभा में दोगुनी छलांग लगाकर 315 के आंकड़े पर पहुंच गई, और मौजूदा लोकसभा में तो 543 में से 449 सदस्य करोड़पति या अरबपति हैं। नवनिर्वाचित विधानसभाओं में तेलंगाना और मिजोरम के 90 फीसदी विधायक करोड़पति हैं, तो राजस्थान के करीब 80 प्रतिशत सदस्य इस श्रेणी में आते हैं। 230 सदस्यों वाली मध्य प्रदेश विधानसभा के भी 187 विधायक करोड़ों में खेलते हैं।  

कोई आश्चर्य नहीं कि चुनाव घोषणा के बाद विभिन्न छापों में अब तक 3,000 करोड़ रुपये की नकदी, शराब और ड्रग्स पकडे़ जा चुके हैं। सारे पुराने रिकॉर्ड टूट चुके हैं, पर नकदी की जब्ती का सिलसिला जारी है। बताने की जरूरत नहीं कि यह कीर्तिमान भी टूटने के लिए बना है। चुनाव-दर-चुनाव जब्त की गई धनराशि के आंकडे़ इसके गवाह हैं। साल 2009 के चुनाव में जहां चुनाव आयोग ने 100 करोड़ रुपये जब्त किए थे, तो 2014 में यह राशि 300 करोड़ पर पहुंच गई थी, इस चुनाव में 20 अप्रैल तक 715 करोड़ रुपये बरामद किए जा चुके थे। अभी जब 40 फीसदी से अधिक सीटों के लिए वोट पड़ने बाकी हैं, हमें कुछ और हैरतअंगेज सत्यों-तथ्यों के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए।

इन हाहाकारी आंकड़ों के जरिए अगर चुनावी राजनीति को परखने का प्रयास करें, तो कई सवाल सिर उठाते हैं। चुनाव-दर-चुनाव जब्त होने वाली राशि और मतदान के प्रतिशत में समानता के कुछ सूत्र तो नहीं छिपे? हम जिसे जागरूकता मानकर मन बहला रहे हैं, वह कहीं अंधियारे के प्रगाढ़ होने का संकेत तो नहीं? गरीब के मत खरीदकर श्रीमंत बने लोग उनकी बेहतरी की कितनी चिंता करेंगे? हमारे मतदाता अगर विक्रेता बन जाएं और नेता साहूकार, तो लोकतंत्र का क्या होगा?

एक बात और। पहले चुनाव में अपराधियों से दबदबा बनाया जाता था, अब यह काम नोटों की गड्डियों ने सम्हाल लिया है। गुजरे सात दशकों में गुंडे कब नेता हो गए और नेता कब लक्ष्मी के गुलाम, मालूम ही नहीं पड़ा।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 28 april