DA Image
4 अप्रैल, 2020|10:20|IST

अगली स्टोरी

गणतंत्र दिवस पर जो सोचना है

शशि शेखर

अभूतपूर्व वैचारिक द्वंद्व के बीच हम आज 71वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। यह पहला मौका है, जब इस पुनीत राष्ट्रीय पर्व पर भारतीय समाज अनचीन्हे सवालों से जूझ रहा है। क्या हम दो धाराओं में बंटने जा रहे हैं? अगर ऐसा होता है, तो यह देश के लिए कैसा होगा? नागरिकता संशोधन कानून क्या वाकई किसी खास वर्ग के खिलाफ है? क्या इससे भारत की संघीय अवधारणा खतरे में पड़ने जा रही है? 

कमाल यह है कि इस बहस में शामिल सभी लोग संविधान की दुहाई दे रहे हैं। कुलजमा एक लाख, छियालिस हजार, तीन सौ पचासी शब्दों की यह पवित्र पोथी क्या कहती है, यह जानने के लिए उसकी प्रस्तावना को समझना जरूरी है। प्रस्तावना है- हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

आजकल इन शब्दों के मर्म को ढाल बनाने की कोशिश की जा रही है। चाहे दिल्ली का शाहीन बाग हो या लखनऊ अथवा मुंबई का कोई अन्य धरना स्थल, हर जगह कुछ शब्द कॉमन हैं- संविधान, शांति, अहिंसा, भाईचारा आदि। उत्तर प्रदेश और मंगलोर की हिंसा के बाद आंदोलनकारियों ने दूसरी तरकीब अपनाई है। वे महिलाओं और नौजवानों को आगे कर रहे हैं। वे जानते हैं कि इन्हें बलपूर्वक हटाना आसान नहीं। सोशल मीडिया के उबाल के इस वक्त में, जब तिल भी आसानी से ताड़ की शक्ल ले लेता है, तब कोई भी जोर-जबरदस्ती अपयश का कारण बन सकती है। ये लोग ‘शांतिपूर्ण’ तरीके से अपने आंदोलन को लंबे से लंबा खींचना चाहते हैं। वे जानते हैं कि जितना लंबा आंदोलन, उतनी बड़ी सुर्खियां। 

तिरंगा, क्रांतिकारी कविताएं, गांधी और आंबेडकर की तस्वीरों के साथ माहौल को सुर्खरू करने की कोशिशें अभी तक कामयाब रही हैं, पर लोहरदगा और वाराणसी की घटनाएं चिंतित करती हैं। लोहरदगा में नागरिकता कानून के समर्थन में निकल रहे जुलूस पर पथराव के बाद हिंसा पसर गई। ये पंक्तियां लिखे जाने तक वहां कफ्र्यू जारी है। इसी तरह, वाराणसी के बेनियाबाग में प्रदर्शनरत लोगों को जब पुलिस ने हटाने की कोशिश की, तो पथराव हो गया। महाराष्ट्र से भी हिंसा की खबरें आ रही हैं। बताने की जरूरत नहीं, अगर अन्य स्थानों पर यह कहानी दोहराई गई, तो सामाजिक सद्भाव को खतरा पैदा हो सकता है।

सवाल उठता है कि हमारे देश से क्या सर्वानुमति की राजनीति के दिन सदा-सर्वदा के लिए विदा हो गए? 

आज के हालात पर बात करने से पहले मैं आपको संविधान सभा के सदस्यों की ओर ले चलना चाहूंगा। उनमें से ज्यादातर आज हमारे बीच नहीं हैं, पर वे जो रच गए, वह भारत के विविधतामूलक समाज को रास्ता दिखाने के लिए पर्याप्त है। ऐसा इसलिए हो सका, क्योंकि इस सभा में विभिन्न धर्मों, वर्गों और आंदोलनों से जुडे़ लोग शामिल थे। एक तरफ राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल और मौलाना आजाद जैसे गांधीवादी थे, तो दूसरी तरफ जेबी कृपलानी और सोमनाथ लाहिड़ी जैसे समाजवादी या वामपंथी शामिल थे। आगे चलकर भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे, तो मुस्लिम लीग की बेगम एजाज रसूल भी। किसानों की रहनुमाई एमजी रंगा कर रहे थे, तो सिखों का प्रतिनिधित्व करने के लिए बलदेव सिंह थे। दलित अधिकारों की रहनुमाई खुद बाबा साहब आंबेडकर कर रहे थे। यह संविधान सभा सच्चे अर्थों में भारत के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करती थी और इसीलिए वह एक ऐसा संविधान बना सकी, जो धर्म अथवा पंथ से परे सिर्फ भारतीय जन गण मन को रूपायित करता है।

आज भी तो हर वर्ग के जन-प्रतिनिधि मौजूद हैं, पर उनके बीच अविश्वास की दरार चौड़ी होती जा रही है। वे जानते हैं कि सारी समस्या का समाधान सिर्फ आपसी बातचीत है, पर कुछ हुकूमत की जिद, तो कुछ विपक्षी दलों के दांव-पेच बीच की राह नहीं निकलने दे रहे। सरकार का कहना है कि नागरिकता संशोधन कानून पर विपक्षी पार्टियों के जरिए भ्रम फैलाया जा रहा है। सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेता जनसभाओं में विपक्ष को सार्वजनिक बहस की चुनौती दे रहे हैं। इसके प्रति-उत्तर में एनडीए के विरोधी दल ताल ठोक रहे हैं कि सरकार आर्थिक बदहाली से ध्यान हटाने के लिए ऐसा कर रही है। वे कहते हैं- भारत में लोकतंत्र खतरे में है और इसीलिए मशहूर पत्रिका द इकोनॉमिस्ट  ने भारत की रेटिंग दस स्थान तक गिरा दी है। दोनों ओर से शाब्दिक तीरों की बौछार चरम पर है। 

इन दो पाटों के बीच वे आंदोलनकारी हैं, जो सरकार से समाधान की उम्मीद कर रहे हैं। नतीजतन, कड़वाहट बढ़ती जा रही है। 

इस दौरान एक और खतरनाक प्रवृत्ति सिर उठाती दिख रही है। तमाम राज्यों ने नए कानून को लागू करने से इनकार कर दिया है। इन प्रदेशों की कमान संभाल रहे लोग जानते हैं कि वे ऐसा नहीं कर सकते। संसद से एक बार कानून बना दिया गया, तो वह पूरे देश में लागू होना ही है। अगर वे अपनी जिद पर अडे़ रहे, तो इसका अंजाम क्या होगा? क्या इससे देश के संघीय ढांचे पर चोट पहुंचने का खतरा नहीं पैदा हो रहा? कुछ राज्यों में पहले से ही राज्यपाल और मुख्यमंत्री गरिमापूर्ण परंपराओं को मटियामेट करने में लगे हैं, उससे यह आशंका और प्रबल हो जाती है कि यह सब एक लंबे सियासी खेल का हिस्सा है। 

ऐसा नहीं है कि यह सब पहली बार हो रहा है। इससे पहले कश्मीर और उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में ‘दिल्ली’ के खिलाफ आवाजें उठी हैं। वे छितराई हुई थीं, उनसे निपटना आसान था, पर इस बार संविधान की शपथ लेने वाले तमाम मुख्यमंत्री ऐसा कर रहे हैं। चंडीगढ़ से त्रिवेंद्रम  तक यह आग चौतरफा पसरती दिख रही है। यही वह मुकाम है, जो गणतंत्र में तंत्र के आगे ‘गण’ की असहायता को दर्शाता है। क्या संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र को यह शोभा देता है?

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें

shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 26 january