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क्या न्यायपालिका ही अंतिम आसरा है

शशि शेखर

गुजरे हफ्ते जब सुप्रीम कोर्ट हुक्मरानों को लताड़ रहा था- आप भीड़ को इंसाफ करने का हक नहीं दे सकते, भीड़ की हिंसा रोकने के लिए कानून बनाइए और ऐसे मामलों से सख्ती से निपटिए, तो माननीय न्यायमूर्तिगण को मालूम न  था कि सैकड़ों किलोमीटर दूर एक गुमनाम से शहर पाकुड़ में दूसरी पटकथा रची जा रही है। 

कुछ घंटे बाद हमने टीवी के परदे पर 78 साल के बुजुर्ग स्वामी अग्निवेश को सरे बाजार बुरी तरह पिटते देखा। उन पर हमला करने वाले उत्तेजक नारे लगा रहे थे। बाद में पुलिस ने संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया, पर ये पंक्तियां लिखे जाने तक किसी की गिरफ्तारी नहीं की जा सकी थी। इस घटना पर झारखंड विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ। देश के तमाम चैनल घंटों बहस करते रहे, पर जयंत सिन्हा के अलावा पार्टी का कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया। एक दिन पहले केरल के  तिरुवनंतपुरम में शशि थरूर के दफ्तर में भी इसी अंदाज में तोड़-फोड़ की गई थी। 

यही नहीं, जिस दोपहर स्वामी अग्निवेश पीटे गए, उसी शाम खबरिया चैनल की मसालेदार लाइव डिबेट में दाढ़ी वाले एक मौलाना ने सुप्रीम कोर्ट की महिला वकील को तमाचे जड़ दिए। इन तीनों घटनाओं पर गौर फरमाइए। ये किसी राजनेता के दफ्तर पर हमला, किसी बुजुर्ग या महिला की पिटाई भर नहीं है। हम हिन्दुस्तानी धर्म और सभ्यता के नाम पर नितांत अधार्मिक और असभ्य होते जा रहे हैं। तीन तलाक और हलाला पर जूझ रही बरेली की निदा के बयान पर गौर फरमाइए। उसने अल्पसंख्यक आयोग से कहा, मुझे जान का खतरा है। सबसे ज्यादा डर जुमे की नमाज पर जमा भीड़ से लगता है। जो भीड़ कभी आश्वस्ति की प्रतीक होती थी, वह डराने क्यों लगी है? इससे पहले भी संरक्षण, आरक्षण, तुष्टीकरण आदि के जरिए हमारे हुक्मरां अपने-अपने ‘वोट बैंक’ साधते रहे हैं। तब और अब में अंतर महज इतना है कि सोशल मीडिया ने इन दिनों सियासी हरम से उपजने वाली गरम हवाओं को बारहमासी कर दिया है। इस आग में आहुति डालने में हर मत-मतांतर के लोग शामिल हैं। हम हिन्दुस्तानियों के अंदर भीड़ का उन्माद उछाल मारने लगा है। यह खतरनाक है।

उन्मत्त लोगों की जमात अगर आरोप तय करने में सक्षम होती, तो फ्रांस की महारानी मैरी एंत्वेनेत के वध के लिए नितांत अनैतिक आरोप सामने न आते। मैरी पर दोष मढ़ा गया था कि उनके अपने बेटे से जिस्मानी संबंध हैं। ढाई सौ साल होने को आए। समूची दुनिया के संवेदनशील लोग इस घिनौनी दास्तां को याद कर घिन से उफनने लगते हैं। फ्रांस की महान क्रांति के ऊपर यह कभी न मिटने वाला धब्बा है। इसी तरह, येकातेरिनबर्ग के जार के परिवार वालों का कत्ल करते वक्त किसी ने यह ख्याल नहीं रखा कि जिन्हें मारा जा रहा है, उनमें जार निकोलस-द्वितीय का लाचार और बीमार बेटा भी है। उसका राज दरबार की किसी अच्छी-बुरी गतिविधि से कोई लेना-देना न था। उसे क्यों मारा? इन उदाहरणों का एक ही फलितार्थ है, भीड़ उन्माद से ग्रस्त होती है, इंसाफ से प्रेरित नहीं। यदि हम उसे हर शहर, कस्बे में ऐसा करने के लिए खुला छोड़ देंगे, तो फिर हमारे मुल्क में पाकुड़-हापुड़ जैसी शर्मनाक मिसालें हर रोज जन्म लेती नजर आएंगी। 

कृपया ध्यान दें। फ्रांस और रूस की घटनाएं क्रांतियों से निकली अस्थाई अव्यवस्था की उपज थीं। उन्होंने वक्त के साथ उस पर काबू पा लिया। हमारा देश विप्लव के ऐसे दौर से कभी नहीं गुजरा। इसलिए हिन्दुस्तान के हालात अपेक्षाकृत अधिक चिंताजनक हैं। सवाल उठता है कि इस प्रवृत्ति पर कैसे लगाम लगे?

मेरा मानना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट पाकुड़ की घटना का स्वत: संज्ञान ले ले, तो ऐसी घटनाओं पर हुकूमत द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही पर लगाम लग सकती है। वे पाकुड़ के ही हमलावर हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मूल भाव की सबसे पहले अवहेलना की है। यहां पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं। सबको मालूम था कि स्वामी अग्निवेश शहर में हैं। जिला पुलिस के पास अपनी खुफिया यूनिट होती है। वह क्या कर रही थी? घटना का ‘फुटेज’ भी पुलिस के पास है, फिर माकूल कार्रवाई में इतना विलंब? क्या यह सुप्रीम कोर्ट की ‘सख्ती’ से निपटने के निर्देश की अवहेलना नहीं है?

हालांकि, मैं खुद को सुप्रीम कोर्ट को सलाह देने के काबिल नहीं पाता और न मुझे माननीय न्यायमूर्तियों के विवेक पर कोई संशय है। 
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इन बेचैनी भरे दिनों का अकेला कटु यथार्थ यह है कि चारों तरफ फैली वैचारिक हिंसा अब सड़कों पर उफन पड़ने के लिए बेताब है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आप हर रोज ऐसे हादसे आकार लेते पाएंगे, जिन्हें रोका जा सकता था। यही वह वक्त है, जब राजनीतिज्ञ और समाज के सुलझे हुए लोगों को भी सामने आकर समूचे विमर्श को सार्थक दिशा देने की कोशिश करनी चाहिए। 

यहां एक और तथ्य गौरतलब है। हमारे देश में स्थापित धारणा है कि भीड़ को सजा नहीं दी जा सकती। इसीलिए आजाद भारत में समूह के दुरुपयोग के हजारों उदाहरण मौजूद हैं। ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाओं को ही ले लीजिए। न तो सरकार के पास उनका कोई डाटा है और न ही स्थानीय पुलिस आतताइयों की ऐसी टुकड़ियों से निपटने में सक्षम है। तो क्या मान लें कि यह समस्या लाइलाज है और हमें इसके साथ जीना सीखना होगा? यकीनन नहीं। संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते हमें इससे पार पाना होगा और इसकी शुरुआती जिम्मेदारी राज्य सरकारों की बनती है। यहां गृह मंत्री राजनाथ सिंह का कथन गौरतलब है। स्वामी अग्निवेश के मामले को जब संसद में उठाया गया, तो उन्होंने लोकसभा में बयान दिया कि हमने प्राय: हर घटना के बाद संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से बात कर जरूरी कार्रवाई के लिए ‘अनुरोध’ किया। ऐसे मामलों में केंद्र के हक-हुकूक सिर्फ सुझाव और अनुरोध तक ही सीमित हैं। क्या बेबसी है? 

आप घटनाओं की सूची उठा देखिए, तो साफ हो जाएगा कि भाजपा शासित राज्यों से लेकर वामपंथियों के कब्जे वाले केरल तक यही हाल है। दीदी का बंगाल भी उबला पड़ रहा है। ऐसे में, आम आदमी के पास अदालत से आस जोड़ने के अलावा और कोई रास्ता बचता है क्या?

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