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मोदी की दूरदर्शी कवायद

शशि शेखर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मटके पर जतन से ओढ़ाई हुई चादर जब गुरुवार की शाम उठाई, तो सटोरियों से लेकर सियासी तमाशबीनों में से कुछ अचरज में डूब गए, तो कुछ पूर्वानुमानों की गोटी को सटीक बैठता देख चहचहाने लगे। भारतीयों का यह पुराना शगल है कि चाहे चुनाव हो, या मंत्रिपरिषद का गठन, हम तर्क, वितर्क और कुतर्क के बहाने ढूंढ़ ही लेते हैं। 

मोदी-1 और मोदी-2 में सबसे बड़ा अंतर तो यह है कि इससे दो गंभीर चेहरे बाहर हो गए हैं। बरसों तक नई दिल्ली में नरेंद्र मोदी के संकटमोचक की भूमिका निभा चुके अरुण जेटली ने तबियत खराब होने का हवाला देकर पहले ही प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख दी कि वह बिगड़ते स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहते हैं। सुषमा स्वराज ने भी बीमारी के चलते विदिशा से चुनाव नहीं लड़ा था, पर पता नहीं क्यों, सस्पेंस कायम था। पूर्व विदेश सचिव सुब्रमण्यम जयशंकर का आगमन भी कहीं न कहीं सुषमा स्वराज की विदाई की बात कह रहा था। उनके आगमन के साथ ही केंद्रीय मंत्रिमंडल को एक और नौकरशाह मिल गया है। उन्हें देश की मौजूदा विदेश नीति और विदेश मंत्रालय को बेहतर दिशा देने के लिए जाना जाता है। वह अपने से वरिष्ठ हरदीप पुरी और जनरल वी के सिंह को पीछे छोड़ यहां तक पहुंचे हैं।

अरुण जेटली और सुषमा स्वराज की विदाई बीमारी के चलते हुई, पर कुछ महत्वपूर्ण नामों की गैर-मौजूदगी ने चौंकाया जरूर। जेपी नड्डा, सुरेश प्रभु, राधामोहन सिंह, राज्यवद्र्धन सिंह राठौर, जयंत सिन्हा, महेश शर्मा और अनुप्रिया पटेल के नाम खासतौर पर लेना चाहूंगा। नड्डा और राठौर तो पार्टी आलाकमान की पसंद भी थे। क्या संगठन में उन्हें कोई जिम्मेदारी दी जाने वाली है? 

अमित शाह के काबीना में आने के बाद यह तय है कि भाजपा को अब नया अध्यक्ष तलाशना होगा। अब तक भगवा दल का उसूल रहा है- एक व्यक्ति एक पद। जब अगले कुछ महीनों में चार राज्यों में चुनाव होने वाले हों, तब क्या अमित शाह पर दोहरी जिम्मेदारी डाली जाएगी या जल्दी ही किसी और अध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी? जेपी नड्डा हिमाचल के हैं, परंतु उन्होंने शिक्षा-दीक्षा बिहार में पाई है। बिहार भारतीय राजनीति का सबसे संवेदनशील सूबा है और 23 मई के परिणामों में भाजपा-जेडीयू गठबंधन को वहां से अकल्पनीय बढ़त मिली है। नड्डा इस नाते अध्यक्ष पद के दावेदार हो सकते हैं, पर पार्टी में भूपेंद्र यादव सहित कुछ और चेहरे भी हैं, जिन्होंने अपनी काबिलियत कई मोर्चों पर साबित की है। जाहिर है कि राजनीतिक अंदाजों के अग्निबाण छोड़ने वालों को कुछ दिनों के लिए काम मिल गया है। 

बिहार की बात चली है, तो यह बताने में कोई हर्ज नहीं कि ऐन समय पर नीतीश कुमार के जेडीयू ने कैबिनेट में शामिल होने का न्योता ठुकरा दिया। वजह? वही कि हम ज्यादा सीटों के हकदार हैं और एक कैबिनेट मंत्री की सीट से हमारा काम नहीं चलने वाला। नीतीश कुमार के भाजपा से रिश्तों में उतार-चढ़ाव आता रहता है और परिणामों के एक सप्ताह के भीतर ही रिश्तों की नाव एक बार फिर डोलती दिखाई पड़ी। शपथ लेने वालों में रामविलास पासवान भी थे। वह इस बार चुनाव नहीं लड़े थे। जाहिर है कि वह राज्यसभा के जरिए आएंगे। वह अपने पुत्र चिराग पासवान को भी मंत्रिपरिषद में दाखिल कराना चाहते थे, उनकी इस आशा पर फिलहाल पानी फिर गया है। 

अगर आप जेडीयू, लोजपा और अपना दल को एक खाने में रखकर देखें, तो पाएंगे कि नरेंद्र मोदी सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं, पर पुरानी आदत के अनुसार दबाव के आगे झुकना नहीं चाहते। अगर शिवसेना को एक सीट मिली है, तो फिर जेडीयू को ज्यादा क्यों दी जाएं? इसी तरह, लोजपा ने चुनाव से पहले सौदेबाजी में रामविलास पासवान के लिए राज्यसभा और मंत्रिपद का आश्वासन भी ले लिया था। इन सबको स्पष्ट संदेश मिल गया है।

अब आते हैं इस मंत्रिमंडल की सबसे महत्वपूर्ण एंट्री पर। वह हैं अमित शाह। राजधानी के सियासी अंत:पुरों में महीनों से खबर पुरगर्म थी कि शाह बतौर गृह मंत्री या वित्त मंत्री कैबिनेट में आएंगे। कुछ लोग यह दावा करते हैं कि वह 2024 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे और इसके वास्ते आवश्यक प्रशासकीय अनुभव जुटाने के लिए उनका काबीना में आना बहुत जरूरी था। जो नहीं जानते, वे जान लें कि गुजरात में शाह गृह समेत कई मंत्रालयों की कमान संभाल चुके हैं। उन्होंने उस समय गृह मंत्रालय की कमान संभाली है, जब घाटी उफन रही है। भाजपा के सामने मंदिर, अनुच्छेद 370, 35-ए आदि वायदों को पूरा करने की चुनौती भी है।  

असाध्य को साधने की सामथ्र्य वाले शाह पर आम आदमी की निगाहें जमी रहेंगी। इस मंत्रिमंडल में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा को भी खासी तवज्जो दी गई है। उन्होंने गडकरी के बाद और निर्मला सीतारमण से पहले शपथ ली। उन्हें महत्व देने के पीछे दो कारण हैं। पहला यह कि कर्नाटक में भाजपा ने आम चुनावों में बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हुए 25 सीटें झटक लीं। मोदी गौड़ा के जरिए वहां के लोगों को बताना चाहते हैं कि मैं आपके साथ खड़ा हूं। इसके साथ ही उनकी निगाहें अब दक्षिण की विजय पर हैं। निर्मला सीतारमण को इस बार वित्त मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।

यहां मैं राजनाथ अथवा गडकरी की चर्चा जान-बूझकर नहीं कर रहा, क्योंकि उनकी हैसियत सहज तौर पर बरकरार रही है। राजनाथ सिंह का विभाग जरूर बदला है। उन्हें अब रक्षा मंत्रालय दिया गया है, जो अपने आप में खासा महत्वपूर्ण है।
यहां तीन नामों की चर्चा जरूरी है। सबसे पहले स्मृति ईरानी। राहुल गांधी को अमेठी में हरा देना आसान नहीं था। इसका पुरस्कार उनको मिलना ही था। वैसे भी वह ऊर्जा और ओज की धनी हैं। इसी तरह, रमेश पोखरियाल निशंक और अर्जुन मुंडा को जगह देकर प्रधानमंत्री ने नेक काम किया है। ये दोनों न केवल अपने सूबों के मुख्यमंत्री रहे हैं, बल्कि धरती पकड़ नेता भी रहे हैं। 

यह मंत्रिमंडल एक और संदेश देता है। मोदी ने एक बड़े कॉरपोरेट की तरह उत्तराधिकार की योजना पर भी काम किया है। शाह, निर्मला और ईरानी की नई भूमिका इसका प्रमाण है। मोदी ने एक बार फिर साबित किया है कि वह जो योजना बनाते हैं, वह उस बीज की तरह होती है, जिसकी उपज बरसों-बरस तक सरसब्ज रहती है।

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