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25 फरवरी, 2020|1:09|IST

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दविंदर और कुछ अनसुनी दास्तान

शशि शेखर

जम्मू-कश्मीर पुलिस के उपाधीक्षक दविंदर सिंह की गिरफ्तारी के बाद बरपा हंगामा क्या आपको जाना-पहचाना नहीं लगता? याद करें, मुंबई बम धमाकों के सिलसिले में जब कस्टम के एक वरिष्ठ अधिकारी को गिरफ्तार किया गया था, तब भी समान शोर-गुल उपजा था। क्या सरकार सो रही है? खुफिया तंत्र क्या कर रहा था? क्या इस तरह के और लोग हमारी व्यवस्था के विशाल ताने-बाने को घुन की तरह खा रहे हैं? सवालों की यह कानफोड़ अनुगूंज अगली घटना तक जारी रहती है, पर सनसनी की इस सौदागरी में अक्सर वे मुद्दे गुम हो जाते हैं, जिन पर गंभीर विमर्श जरूरी होता है। 
हमारे ‘सिस्टम’ को चूंकि यह प्रवृत्ति ‘सूट’ करती है, इसलिए अनर्थ का यह कारोबार चलता रहता है।    
दविंदर इसलिए हमें अधिक लज्जित करता है, क्योंकि वह बेहद संवेदनशील श्रीनगर हवाई अड्डे की एंटी हाइजैकिंग यूनिट में तैनात था। हालांकि, उसका दामन बेदाग नहीं था। संसद-हमले के आरोप में सूली पर लटकाए गए अफजल गुरु ने उस पर संगीन आरोप लगाए थे। अफजल ने लिखित शिकायत की थी कि दविंदर सिंह ने उसे अवैध रूप से गिरफ्तार कर तरह-तरह की यातनाएं दीं। उसी ने दबाव बनाया कि वह संसद पर हमले में शामिल एक आतंकी को अपने साथ दिल्ली ले जाकर पनाह मुहैया करवाए। मजबूरीवश उसने ऐसा ही किया। अफजल गुरु के दावे को उस वक्त यह मानकर हवा में उड़ा दिया गया कि जो व्यक्ति संसद पर हमले की साजिश रच सकता हो, वह भला अपने बचाव के लिए किसी को ढाल क्यों नहीं बना सकता? इससे पहले दविंदर पर पद के दुरुपयोग और अवैध वसूली के आरोप लगे थे। यदि उसी समय उसकी निगरानी शुरू कर दी गई होती, तो शायद कई अनहोनी रुक सकती थीं।

कृपया ध्यान दें। आतंक और अलगावग्रस्त इलाकों की अपनी विभीषिकाएं हैं। वहां लोकतंत्र को ‘गनतंत्र’ चलाता है और बंदूक की लिबलिबी दबाते-दबाते कुछ लोग रास्ता भटक जाते हैं। दविंदर सिंह इस लंबे सिलसिले की एक कड़ी भर है। एक उदाहरण देता हूं। 1990 के दशक की शुरुआत में मैं एक पत्रकार साथी के साथ असम, नगालैंड और मणिपुर के अशांत इलाकों में लगभग दो हफ्ते तक भटकता रहा। मैं जानना चाहता था कि बंदूकों के बल पर भारतीय राष्ट्र-राज्य को विखंडित करने का स्वप्न देखने वालों से सुरक्षा बल कैसे निपटते हैं? सीआरपीएफ के तत्कालीन महानिदेशक मेरे परिचित थे। उन्होंने सौजन्यता दिखाते हुए मणिपुर-नगालैंड के तत्कालीन आईजी को फोन भी कर दिया था। 

नियत समय पर हम इंफाल में उतरे। हवाई पट्टी पर ही डिप्टी कमांडेंट स्तर के एक अधिकारी ने हमारा खैरमकदम किया। सीआरपीएफ के काफिले का हिस्सा बनकर हम उसके ‘गु्रप सेंटर’ में पहुंचे। आईजी साहब कुछ ‘रफ-टफ’ होने के बावजूद गर्मजोश थे। उन्होंने अतिथिगृह की बजाय हमें पड़ोस के खाली फ्लैट में ठहराया। शाम को उनके वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में ऐसे-ऐसे किस्से सुनने को मिले, जिसकी हमने कभी कल्पना भी न की थी। उनमें से प्राय: सभी के पास तरह-तरह के ‘एनकाउंटर्स’ के चलते-फिरते खजाने थे। उसी शाम मालूम पड़ा कि हमारे मेजबान को ‘बिहार का शेर’ कहा जाता है। उत्तर-पूर्व के अलगाववाद विरोधी आंदोलनों को कुचलने में उन्होंने बहुत बड़ी भूमिका अदा की थी। 

इंफाल में उन्होंने अपने एक कमांडेंट को भी बुला रखा था। संयोगवश वह मणिपुर की मैतेई जनजाति से ताल्लुक रखते थे। उनके साथ घूमते हुए हमें कई बार अचंभे का सामना करना पड़ा। पहला आश्चर्य तो तब हुआ, जब हम उनकी एक चौकी पर पहुंचे। बैठते ही तीन गिलास में गरम पानी के साथ रम आ गई। उस समय दिन के ढाई बज रहे थे। मैंने आश्चर्य से उनके चेहरे की ओर देखा, पर वह अपना गिलास उठाकर ‘चीयर्स’ कह रहे थे। मैंने सोचा कि यह शख्स यहां पर फील्ड कमांडर की हैसियत रखता है, इसके अधीनस्थ सारी फोर्स ‘हाई अलर्ट’ पर है, इसके बावजूद यह दिन में शराब पीने के लिए आजाद है? मैंने पूछा नहीं, पर उन्होंने मेरे सवाल को पढ़ लिया। बोले, यहां ऐसे ही होता है। हम लोगों ने गौर किया कि अच्छी-खासी रम पीने के बावजूद वह सहज रहते थे, पर क्या यह अनुशासनहीनता नहीं थी?

लौटकर आईजी के सामने हमने यह बात रखी। उन्होंने कहा कि मैदान-ए-जंग में अपने अफसरों और सिपाहियों को कुछ ढील तो देनी ही पड़ती है। सामने वाला जब आपके खून का प्यासा हो रहा हो, तो उसे उसी की भाषा में जवाब देना होता है। नियम-कायदों के घेरे में यह संभव नहीं। आप लोग नौजवान हैं, पर जब साठ के दशक में मैं सीआरपीएफ में दाखिल हुआ था, तब की बात ही कुछ और थी। पैदल गश्त करते हुए हम जब किसी गांव में पहुंचते, तो वहां का मुखिया सम्मान स्वरूप हमारे पास आकर एक मुरगा भेंट करता। वे लोग हमारी हर तरह की खातिर के लिए तत्पर रहते। अब वे दिन नहीं रहे। हमने पाया, उनके चेहरे पर विषाद है। वह उन रोबीले पुराने दिनों के बीत जाने से व्यथित थे। 

हम जब इस जुझारू फोर्स के साथ कुछ दिन-रात गुजारने के बाद आगरा लौटे, तो लगा कि एक ऐसी दुनिया से वापसी हुई है, जो अब तक हमारे लिए अनजानी थी। मैं वहां तैनात अफसरों और जवानों की कठिन जिंदगी व हौसले का कायल हो चला था, पर एक आश्चर्य से दो-चार होना बाकी था। कुछ दिनों बाद मैंने खबर पढ़ी कि गांजे की तस्करी के आरोप में नारकोटिक्स विभाग ने आईजी समेत कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। पकडे़ गए उन लोगों में रम के शौकीन कमांडेंट भी शामिल थे। ‘गनतंत्र’ आतंकियों और अलगाववादियों के साथ सुरक्षा बलों को भी मदांधता का सुरूर देता है। 

दविंदर के मामले को लें। जिस शख्स पर इतने बड़े आरोप लग रहे हों, उसे लेकर गंभीर चर्चा की बजाय हमारे सियासतदां हिंदू-मुसलमान अथवा हिन्दुस्तान-पाकिस्तान पर बहस कर रहे हैं। इन्हीं लोगों को इस जानलेवा सिलसिले पर रोक लगाने के उपाय करने हैं और ये ध्यान भटकाने वाली बहस में मुब्तला हैं। वे भूलें नहीं, किसी जांबाज का बहकना व्यक्तिगत घटना नहीं है, यह समूचे तंत्र के खोखलेपन को जाहिर करता है।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 19 january