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माफिया को मसीहा मत मानिए

शशि शेखर

‘शार्प शूटर’ मुन्ना बजरंगी की उत्तर प्रदेश की बागपत जिला जेल में हत्या ने एक बार फिर कानून के जानकारों, सत्ता के सौदागरों, विधि-व्यवस्था के रखवालों और माफिया गिरोहों के घृणित घालमेल को सरेआम बेनकाब कर दिया है। मुझे कहने में संकोच नहीं कि यह एक पुराने खेल का नया अध्याय भर है। 

अपनी बात को समझाने के लिए आपको आधी सदी पीछे ले चलता हूं। वाराणसी में उन दिनों एक सेठजी हुआ करते थे। सेठजी ने कलकत्ता के प्रसिद्ध व्यापारी का पैसा हड़प रखा था। कानूनी लड़ाई से थक-हार उक्त व्यापारी ने कलकत्ता के एक बडे़ माफिया की शरण ली। उस माफिया ने अपने गुर्गों को काशी के सेठ को धमकाने के लिए भेजा। सेठजी पहले से तैयार थे। उन्होंने बनारस के एक बाहुबली को अपनी सुरक्षा का ठेका दे रखा था। कलकत्ता माफिया के उन गुर्गों की काशी के बलशालियों ने जमकर पिटाई की। पिटने वाले बचने की फरियाद की जगह बस एक बात कहते रहे- ‘अगर हमको मारेगा, तो ‘दादा’ छोडे़गा नहीं।’ 

बहरहाल, जमकर कूटने के बाद कलकत्ता के शोहदों को बनारस के दबंगों ने अपर इंडिया एक्सप्रेस में वापसी के लिए ठूंस दिया। काशी के सेठ ने सोचा कि मामला रफा-दफा हो गया। कुछ महीने बाद अचानक पश्चिम बंगाल पुलिस के दो दस्तों ने आधी रात बीतने के बाद सेठजी और उनके सहयोगी शोहदे के घर पर छापा मारा। उन्हें अपनी गिरफ्त में लिया और कलकत्ता के लिए रवानगी ढील दी। वहां वाराणसी के अतिथियों का स्वागत हवालात की बजाय माफिया की हवेली में हुआ। बाद में वे मुंहमांगे पैसे देकर ही जान छुड़ा सके। 

तब से गंगा बहुत प्रदूषित हो चुकी है। कलकत्ता कोलकाता हो गया, अपर इंडिया एक्सप्रेस की जगह सुपरफास्ट रेलगाड़ी ने ले ली। माफिया ने भी चाल, चरित्र और चेहरा बदल लिया। उस वक्त तक माफिया महज महानगरों में होते थे। छोटे शहरों को गुंडे चाकू और तमंचों के बल पर हांका करते थे। अब हिंदी पट्टी के शहर-दर-शहर माफिया की चपेट में हैं। इन गिरोहों के सरदार राजनीति, कानून और सामाजिक सेंध को ढाल बनाना जानते हैं। इसीलिए वे सीधे तौर पर सत्ता में न भी हों, तब भी उसके बल और वैभव का जमकर लाभ उठाते हैं।

एक उदाहरण। बरसों पहले श्रीप्रकाश शुक्ला अपराध की दुनिया में धूमकेतु की तरह उभरा था। उसने अपहरण की औरों से अलग शैली ईजाद की। कहते हैं, एक बार एक बिल्डर का अपहरण कर उसने शर्त रखी कि फिरौती की रकम लेकर कोई आईपीएस अधिकारी उसके पास आए। ऐसा हुआ भी। अगर यह सच है, तो सवाल उठता है कि आला अधिकारियों और हुकूमत की मर्जी के बिना क्या यह संभव था? आश्चर्य नहीं कि ‘काऊबेल्ट’ में बेहद जिम्मेदार पदों पर संविधान की शपथ लेकर बैठने वाले मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों तक पर फिरौती में हिस्सेदारी करने के आरोप लगते रहे हैं। 
हुकूमत की गंगोत्री में अगर जरा-सा भी प्रदूषण आता है, तो उसका असर नीचे तक पड़ता है और तंत्र में मौजूद भ्रष्ट अफसर सियासी आकाओं की आड़ में निरंकुश हो जाते हैं। यही वजह है कि गाजियाबाद में तैनात रहे एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की तो चरित्र-पंजिका में ही मंडलायुक्त ने लिख दिया था कि वह बदमाशों से फिरौती की रकम में हिस्सा लेते हैं। ऐसे सैकड़ों किस्से हैं। किस-किस का रोना रोया जाए?

हालांकि, सिर्फ राजनेता, अधिकारी और माफिया पर दोष मढ़कर छुट्टी पा लेना अनुचित होगा। चाहे भद्रवर्ग हो या समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर बैठे लोग, सबको अपराध और अपराधियों के किस्से लुभावने लगते हैं। पहले उच्च वर्ग का एक उदाहरण। अगस्त 2015 में कोलंबियन ड्रग माफिया पाब्लो एस्कोबार पर ‘नेटफ्लिक्स’ ने एक सीरीज बनाई थी। तब से अब तक इसकी तीन शृंखलाएं प्रसारित हो चुकी हैं। ये तीनों ‘सीजन’ नेटफ्लिक्स के लिए दुधारू गाय बने हुए हैं। संसार की हर भाषा में लोग इसे चाव से देखते हैं। मारियो पूजो की गॉडफादर  भी कभी यही मुकाम रखती थी। एक पंचतारा पार्टी में मैंने मशहूर होटल समूह के संचालक से सुना था कि मैं पाब्लो एस्कोबार से प्रेरणा लेता हूं। बरसों पहले एक सिने स्टार ने भी नामी अखबार से ‘खुली’ बातचीत में कहा था- गॉडफादर  के डॉन कॉरलियोन मेरे आदर्श हैं। हमारे देश में भी ऐसी फिल्मों और किताबों की भरमार है।

ये माफिया डॉन आम आदमी के बीच रॉबिन हुड से कम दर्जा नहीं रखते। फूलन देवी को ही लें। उसने बेहमई में जो हत्याकांड रचा था, उसकी सजा मिलने की बजाय उसे संसद की सदस्यता मिली। मल्लाहों का बड़ा तबका उस पर फिदा हुआ करता था। जब जातियां अपराधकर्मियों में आदर्श खोजेंगी, तो राजनेता उन्हें सिर-आंखों पर बिठाएंगे ही। ऐसे माफिया सरदारों की लंबी फेहरिस्त है, जिन्होंने इस ‘व्यवस्था’ का लाभ उठाया। मैं यहां उल्लेख कर उनका महिमामंडन नहीं करना चाहता। एक माफिया सरदार ने खुद मुझसे कहा था, आप चाहे जो छापें, हम नाराज नहीं होंगे। इससे हमारा फायदा होता है।

आधुनिक माफिया सरगनाओं ने तो सियासत के साथ समाजसेवा का भी चोला ओढ़ रखा है। आम आदमी की सहानुभूति जीतने के लिए वे डॉक्टरों की फीस तय करते हैं। आपदा प्रभावित लोगों की मदद के लिए अपने गुर्गे उतार देते हैं और सताए हुए मजलूमों की रक्षा का स्वांग भरते हैं। इससे अर्जित जन-विश्वास के बूते वे जहां चाहें, अदालत लगा सकते हैं और आपसी झगड़ों का निपटारा कर सकते हैं। 

इसीलिए मैं मुन्ना बजरंगी की जेल में हत्या को सिर्फ उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था से जोड़ने की बजाय एक सामाजिक यक्ष प्रश्न से वाबस्ता मानता हूं। जब हमारे बीच के लोग ही अपराधियों का गुणगान करते हैं, तो फिर हुकूमत से शिकायत कैसी? इन भस्मासुरों को हमने पैदा भले ही न किया हो, पर उन्हें पोसते हमारे बीच के लोग ही हैं। 

अनुरोध है कि हर हादसे पर सरकार को कोसने से पहले एक बार अपनी अंतरात्मा और पास-पड़ोस पर नजर डालिए। कर्तव्यनिष्ठ अफसर अगर खुद को बेबस पाते हैं, तो उसकी कुछ जिम्मेदारी हमारे ऊपर भी आयद होती है।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 15 july