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25 जनवरी, 2020|8:51|IST

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भरोसे की घर वापसी का वक्त

शशि शेखर

गुजरे शुक्रवार की सुबह नींद पुराने मित्र के फोन से खुली। वे घबराए हुए थे। उनकी परेशानी की वजह यह थी कि तीन दशक पहले वे विदेश में रहते थे, उसी दौरान उन्हें ऐसी युवती से प्रेम हो गया, जो पड़ोसी देश की मुसलमान थी। दोनों साथ रहने लगे और इसी बीच पता चला कि वे मां-बाप बनने वाले हैं, लिहाजा उन्होंने आनन-फानन में विवाह रचा लिया। बाद में जब वे घर लौटे, तो उन्होंने अपनी पत्नी का नाम बदलकर बताया। 

मित्र की पत्नी हर रीति-रिवाज को मानतीं और बाकायदा धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होतीं। कुटुम्बियों के अलावा किसी को पता नहीं था कि उन्होंने जिस परिवार में जन्म लिया था, उसने उन्हें क्या नाम दिया था? आज भी वह दंपति मित्र-मंडली में आदर्श युगल के तौर पर जाना जाता है। उनके घर होली-दिवाली मनाना एक आनंददायी अनुभव होता है। इस दौरान उनके बच्चों की भी शादियां हो गईं। वे अब नाना-नानी और दादा-दादी बन चुके हैं। शहर के नए लोगों को याद तक नहीं कि वह किस कुल अथवा मुल्क की हैं? 

फिर वे इतने परेशान क्यों हैं? उन्होंने बताया कि हमने सारी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं, पर कुछ साल पहले तक खुफिया पुलिस के लोग जब चाहें, तब आ धमकते और हमें उन्हें कागजात दिखाने पड़ते। अगर कोई दोस्त या रिश्तेदार उस वक्त घर में होता, तो हमें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता। आखिर मेरी पत्नी का कुसूर क्या है? वह पारिवारिक परंपराएं और भारतीय कानूनों का पालन करती हैं। उनके बच्चे और बच्चों के बच्चे इसी सरजमीं की पैदाइश हैं। अपनी पेशेवर कुशलता के जरिए वे जो धन अर्जित करती हैं, उससे बाकायदा सारे कर भी चुकाती हैं, फिर परेशानियां पीछा क्यों नहीं छोड़तीं? 

उन्हें आशंका है कि नए नागरिकता कानून के बाद कहीं उन्हें अपनी पत्नी से हाथ न धोना पड़ जाए! उधर परदेस में रह रहे महिला के रिश्तेदार उनकी मानसिक यंत्रणा में इजाफा कर रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि निश्चिंत रहिए। आपने एक कर्तव्य परायण भारतीय की तरह समस्त कानूनों का पालन किया है, आपको कुछ नहीं होगा। मेरी बात पर उन्हें पूरा यकीन नहीं हुआ, क्योंकि फोन रखते समय तक उनकी वाणी की थरथराहट कम तो हो गई, पर पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। उनका तर्क था कि जब पुलिस वाले बिना वजह इतना परेशान कर सकते हैं, तो कोई बहाना हाथ लगने के बाद क्या करेंगे? इस सवाल ने उन तमाम लोगों को परेशान कर रखा है, जिनकी बहुएं या दामाद ‘परदेसी’ हैं और वो भारत में रहते हैं। 

मोदी सरकार की साढ़े पांच साला हुकूमत में ऐसा पहली बार हुआ है, जब आशंकाओं का बाजार कश्मीर से कन्याकुमारी तक हरारत में डूब उतरा रहा है। जुमे की नमाज के बाद जिस तरह देश के दर्जनों शहरों में जुलूस निकले या गरमागरम तकरीरें हुईं, वे इसका प्रमाण हैं। यह बात अलग है कि तमाम मुस्लिम आज भी कह रहे हैं कि इस तरह के प्रदर्शनों की अभी आवश्यकता नहीं है, इससे गलत संदेश जाएगा। उनका यह मानना है कि पूर्वोत्तर के लोगों का आंदोलन हिंदू बनाम मुसलमान नहीं है। वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को लेकर आशंकित हैं। शेष भारत में होने वाला विरोध उन लोगों को मौका देगा, जो इसे हिंदू बनाम मुसलमान बनाना चाहते हैं। 

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि आप अपने ‘सेवक’ पर भरोसा करें। हम किसी के साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगे। गृह मंत्री अमित शाह ने भी संसद में लगभग यही भाव व्यक्त किए, पर आशंकाओं का दौर खत्म नहीं हो रहा। यकीनन, सरकार को इस दिशा में ऐसे कदम उठाने होंगे, जो लोगों की आशंकाओं को दूर कर सकें। सरकार अयोध्या के फैसले से पहले इस तरह के सार्थक कदम उठा चुकी है, पर इस बार वैसी तैयारी नहीं दिखाई पड़ी। 

देश में भरोसे की बहाली इसलिए भी जरूरी है कि सरकार को आर्थिक मोर्चे पर संतुलन बनाने के लिए समय और सुकून की जरूरत है। मंदी की आहटों ने जब बाजारों को बेहाल कर रखा हो, तब सांप्रदायिक तनाव और ज्यादा हानिकारक साबित हो सकता है। यही नहीं, पूर्वोत्तर और कश्मीर में इस वक्त हालात सामान्य नहीं हैं। ऐसे में, अगर देश के मुख्य भाग में अशांति फैलने की स्थितियां पैदा हों, तो वह किसी के हित में नहीं। इसके और भी निहितार्थ हैं। जापान के प्रधानमंत्री ने हालात के मद्देनजर अपनी भारत यात्रा टाल दी है, जिसमें गुवाहाटी मुख्य पड़ाव था। बांग्लादेश के दो मंत्री पहले ऐसा कर चुके हैं। हमें अपने अंदरूनी मामलों के अंतरराष्ट्रीयकरण से बचना होगा।

यह बात सच है कि नागरिकता संशोधन कानून में 31 दिसंबर, 2014 से पहले पड़ोसी देशों से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है। इसमें मुस्लिम शामिल नहीं किए गए हैं, और यहीं से आशंकाओं की बारिश होनी शुरू हुई। यहां एक आंकड़े पर गौर करना जरूरी है। असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन ‘एनआरसी’ के लिए कुल 3,30,27,661 लोगों ने अपनी पात्रता जाहिर की थी। उसमें से 3,11,21,004 लोगों को इसके लिए उपयुक्त पाया गया। 3,30,27,661 लोगों में से कुल 19,06,657 लोग अयोग्य पाए गए। ऐसा नहीं है कि उन्हें जेलों में ठूस दिया गया है। उनके पास अभी भी अदालतों में अपनी बात रखने और न्यायपालिका से न्याय पाने का रास्ता बचा है। इन 19,06,657 लोगों में अकेले मुसलमान ही नहीं हैं। बहुत से हिंदू भी इसकी जद में आ गए हैं। 

अब पूर्वोत्तर के लोगों को आशंका है कि इस कानून की आड़ में तमाम लोग भारतीय बन जाएंगे। वे उनकी रोटी-रोजगार और अन्य संसाधनों में हिस्सेदार होंगे, जिसकी फिलवक्त बेहद कमी है। असम 1980 के दशक में गैर-असमी लोगों को लेकर उबल चुका है। तब भारी खून-खराबा हुआ था। उन दिनों की याद कर अभी भी पुराने लोगों को सिहरन हो जाती है। उम्मीद है कि इस विवाद का समाधान समय रहते निकाल लिया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी को उस यंत्रणा से न गुजरना पड़े।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 15 december