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पदयात्रा के राजनीतिक निहितार्थ

शशि शेखर

बहुत छोटा था, जब पिता के साथ विनोबा भावे से मिलने का मौका मिला था। पिता उन्हें अंतिम गांधीवादी मानते थे। उस शाम जमीन पर आसन जमाए विनोबा से पिता ने पूछा था कि क्या आपको नहीं लगता कि बापू का ‘राम राज्य’ का सपना बिखर रहा है? जवाब मिला- ‘एक तरह से यह अच्छा है कि बापू ये दिन देखने को हमारे बीच नहीं हैं। ‘गोरे साहब’ तो चले गए, पर हमारे एमपी, एमएलए को देखिए, उनका जनता से कोई जुड़ाव ही नहीं है।’ मैं इस कथन को भूल गया होता, अगर पिता इस आख्यान को निरंतर दोहराते न रहते। 

आज जब पलटकर संत विनोबा भावे से हुई उस मुलाकात के बारे में सोचता हूं, तो मन में हूक उठती है। तब से अब तक हमारे चुने हुए जन-प्रतिनिधियों के आचार-व्यवहार में निरंतर गिरावट आई है। इनमें से कइयों ने तमाम बार अलग-अलग शब्दों में मुझसे कहा है कि चुनाव तो लहर में जीते जाते हैं, ज्यादा मेहनत करने से कुछ नहीं होता। दूर क्यों जाएं?

2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव ‘मोदी लहर’ पर जीते गए थे। लोगों ने वोट दिया, तो मोदी को और अगर नहीं भी दिया, तब भी कारण मोदी-विरोध ही था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस तथ्य को समझते हैं कि राजनीतिक लहरों की अपनी मियाद होती है, और इसके बाद वे उल्टी चल पड़ती हैं। इसीलिए अगला चुनाव जीतने के लिए जरूरी है कि सांसदों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। यही वजह है कि उन्होंने गांधी जयंती से पटेल जयंती के बीच हर भाजपा सांसद से अपने संसदीय क्षेत्र में 150 किलोमीटर की पदयात्रा करने को कहा है। 

इस दौरान भगवा दल के सांसद गांधी के विचार लोगों तक पहुंचाएंगे और साथ ही वृक्षारोपण भी करेंगे। दरअसल, गांधी के विचार और वृक्षारोपण अपनी जगह हैं, परंतु इस पदयात्रा के राजनीतिक फलितार्थ गहरे हैं। जब सांसद मतदाताओं से सीधे मिलेंगे, तो उन्हें उनके दुख-दर्द का इलहाम होगा और उन्हें दूर करने का आश्वासन भी देना होगा। सोशल मीडिया के विस्फोट के इस समय में, जब बिना चाहे सब कुछ रिकॉर्ड होता जाता है, वायदों से मुकरना आसान नहीं होता। अगर सांसद अपने वायदों को पूरा करेंगे, तो ये पदयात्राएं भाजपा और मतदाता के बीच रिश्तों का बेहतरीन जरिया साबित हो सकती हैं। 

बताने की जरूरत नहीं कि भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा में 303 और राज्यसभा में 78 सदस्य हैं। जहां भाजपा का सांसद नहीं है, वहां पर राज्यसभा के सदस्यों की ड्यूटी लगाई जाएगी। इसका मतलब यह है कि 481 लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा के प्रतिनिधि कुल 72,150 किलोमीटर यात्रा करेंगे। प्रधानमंत्री, कुछ वरिष्ठ मंत्रियों और वृद्ध सांसदों को इस सूची से हटा दें, तब भी लगभग 50,000 किलोमीटर की पदयात्राएं तय हैं, जो अगले विधानसभा चुनावों में पार्टी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।

यहां प्रसंगवश बताने में हर्ज नहीं है कि खुद गांधीजी की दो यात्राओं ने देश की तकदीर को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद बापू अप्रैल, 1917 में चंपारण गए थे। वहां नील उगाने वाले किसानों पर हो रहे अत्याचारों को देखकर उन्हें गहरा आघात लगा था। यहीं से गांधीजी की उस संघर्ष यात्रा की शुरुआत हुई थी, जिसने देश को ऐसा नेता दे दिया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जोड़ने का सामर्थ्य था। अगले 13 साल तक देश के कोने-कोने में घूमने के बाद बापू ने अप्रैल 1930 में दांडी यात्रा के जरिए देश के अवाम को सार्थक संदेश दिया था कि अंग्रेज कानून का उपयोग अपने हक-हुकूक के लिए करते हैं। वे सत्ता के अधिकारों का तो उपभोग करते हैं, पर अपना कर्तव्य नहीं निभाते। इस पैगाम ने जंग-ए-आजादी को नई धार देने में बड़ी भूमिका अदा की थी।

यहां विनोबा के दर्द पर लौटते हैं, जो गुजरे चार दशकों में बद से बदतर होता चला गया। मोदी इसे समझते हैं और यह भी जानते हैं कि अगर हमारे सांसद 150 किलोमीटर तक धरती नापेंगे, तो उन्हें भी यकीनन अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होगा, लेकिन इसके लिए इन सांसदों को थोथी राजनीति से आगे बढ़कर सोचना होगा। अगर यह कार्यक्रम वाकई क्रियान्वित हो सका, तो इससे भाजपा को लाभ के साथ मूर्छित पडे़ विपक्ष को भी जागने की जरूरत महसूस होगी। पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से उसे जैसे लकवा मार गया है। सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस नेतृत्व-विहीन चल रही है। क्षेत्रीय पार्टियों के अंतरविरोध फिर से उग आए हैं और उनके नेता अवसाद से घिर गए हैं।

ऐसे में वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ बैठे हैं। एक उदाहरण देता हूं। पिछले दिनों मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाकों में इंसेफलाइटिस ने दर्जनों बच्चों की जान ले ली, पर राजद के नेता सन्निपात के शिकार बने रहे। जम्हूरियत की बात करने वाले इन लोगों को इस आफत से निपटने में मदद करनी चाहिए थी। राजद और सहयोगी दलों ने पिछले लोकसभा चुनाव में जो प्रत्याशी उतारे थे, उनमें तमाम तो करोड़पति थे। क्या वे बुखार से तपते बच्चों तक राहत सामग्री नहीं पहुंचा सकते थे? उनकी यह नेककदमी बिहार में डूबते विपक्ष के लिए वरदान साबित हो सकती थी, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मौजूदा विपक्ष सिर्फ मीडिया में बयान देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेना चाहता है, क्योंकि सत्ता पक्ष की तरह उनके कार्यकर्ता भी चुनावी लहरों में जीवन ढूंढ़ने के अभ्यस्त हो चुके हैं।

हमारे वक्त की एक भयानक सच्चाई राजनीतिक कार्यकर्ताओं के दिलो-दिमाग में पसर रही अराजकता भी है। यही वजह है कि हम किसी नेता पुत्र के हाथ में लाठी का काम कर रहा क्रिकेट का बल्ला देखते हैं या उत्तराखंड का कोई विधायक बंदूकों से लद-फंद कर ऐंठता दिखाई पड़ता है। महाराष्ट्र में विपक्षी पार्टी के लोग विधायक के घर पर केकड़ों की वर्षा करते रिकॉर्ड कर लिए जाते हैं। दलीय राजनीति का दलदल अब अपनी ही गंदगी से बजबजा उठा है।

यकीनन, इन बिगडै़ल लोगों की नकेल कसने का वक्त आ गया है। क्या इसकी शुरुआत भाजपा से होने जा रही है?

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