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29 जनवरी, 2020|10:39|IST

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आंदोलनों की आहटें और अर्थ

शशि शेखर

सबसे पहले तो देश के उन हजारों नवयुवकों और नवयुवतियों को बधाई, जिन्होंने सड़कों पर उतरकर साबित कर दिया है कि भारत जिंदा मुल्क है। यहां सहमति और असहमति के बीच वह द्वंद्व कायम है, जो लोकतंत्र के स्वस्थ होने की पहली निशानी है। ये सहमतियां और असहमतियां साथ चलें, तो कोई बुराई नहीं, पर अगर वे विग्रह के अनंत मकड़जाल में फंस जाएं, तो अनर्थ हो सकता है। 

मौजूदा छात्र आंदोलन, असहमति और आक्रोश का सम्मान करते हुए भी मैं आग्रह करना चाहूंगा कि वे किसी भी तरह से अपने भविष्य को चौपट न होने दें। जरा सोचें, अगर हमारे गुस्साए नौजवान कक्षाओं में नहीं शामिल होंगे, इम्तिहान नहीं होने देंगे, तो यकीनन वे अपने साथ-साथ देश के भविष्य से भी इंसाफ नहीं कर रहे होंगे। यहां आती हुई इस जोशीली पीढ़ी को अतीत की कुछ अनहोनियों से रू-ब-रू कराना जरूरी है। 

बात 1967 की है। राम मनोहर लोहिया का ‘अंग्रेजी हटाओ’ का नारा अपने पूरे उबाल पर था। वे भारतीय गणराज्य के भावुक दिन थे। आजादी मिले कुल जमा बीस बरस हुए थे और हमारे देश के नौजवान कभी सोवियत संघ, कभी जर्मनी, कभी फ्रांस, तो कभी अमेरिका से प्रभावित होते थे। उन दिनों यह जुमला आम था कि हमें अंग्रेजों के बाद उनकी भाषा की गुलामी करने की कोई जरूरत नहीं। अंग्रेजी के बिना यूरोप के तमाम देश तरक्की की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? उनके इस आह्वान पर हिंदी पट्टी के हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए थे। मुझे याद है, इलाहाबाद में सिविल लाइन्स की दुकानों पर अंग्रेजी के जो बोर्ड लगे थे, उन्हें रातोंरात पोत दिया गया। घरों के बाहर लगी नाम पट्टिकाएं काली कर दी गईं। जिन गृहस्वामियोंके नाम पत्थर पर खुदे हुए थे, उन पत्थरों को तोड़ने के प्रयास में घरों के दरवाजे अथवा मुख्य द्वार क्षतिग्रस्त कर दिए गए। 

हमारी पीढ़ी के लोग उस समय प्राइमरी कक्षाओं में थे। खरामा-खरामा बोध ग्रहण करने की उस नाजुक अवस्था में हमने पाया कि हमारे अभिभावक भी उसी रंग में सराबोर हैं। नतीजतन, हमारी पीढ़ी के लोगों को आगे चलकर अपने ही देश में अंग्रेजी के अल्पज्ञान का नुकसान उठाना पड़ा। कमाल यह कि ‘गैर कांग्रेसवाद’ के नारे के जरिए पहली बार सात प्रदेशों से कांग्रेस की हुकूमत उखाड़ फेंकने वाले लोहिया और उनके सहयोगी तमिलनाडु का छात्र आंदोलन भूल गए थे। क्यों? 

महज दो साल पहले 1965 में तमिलनाडु में ‘ऑफिशियल लैंग्वेज ऐक्ट-1963’ लागू किया गया था, जिसके तहत हिंदी पढ़ना अनिवार्य था। इसके विरोध में छात्र सड़कों पर उतर आए थे। देखते-देखते आंदोलन इतना उग्र हो गया कि कई छात्रों ने अपनी जान दे दी। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के इस आश्वासन के बाद कि पंडित नेहरू ने हिंदी भाषा न थोपने का जो वादा किया था, उस पर सरकार पूरी तरह कायम है, वह आंदोलन खत्म हुआ था। इसके परिणामस्वरूप 1967 के चुनाव में कांग्रेस का राज्य से सफाया हो गया और द्रमुक सत्ता में आ गई।

ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी का अभाव महज हिंदीभाषियों को सता रहा था। तब के सर्वाधिक हिंदीद्रोही प्रांत तमिलनाडु के के कामराज इसके सबसे बडे़ उदाहरण हैं। कांग्रेस में उनका दर्जा ‘किंग मेकर’ का था। लालबहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी उनकी मदद के बिना शीर्ष तक नहीं पहुंच सकते थे। ‘कामराज प्लान’ ने तमाम मंत्रियों की कुरसी छीन ली थी। उन्हें जब खुद सत्ता सम्हालने की सलाह दी गई, तो उनका जवाब था- ‘मुझे न अंग्रेजी आती है, न हिंदी, मैं कैसे प्रधानमंत्री बन सकता हूं?’ यह बात अलग है कि जिस ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ का दक्षिण में विरोध हुआ, उत्तर के तमाम राज्यों ने इसे बिना ना-नुकुर स्वीकार कर लिया। खुद मैंने इसी फॉर्मूले की मदद से तीन वर्ष बांग्ला पढ़ी। इसे मैं अपने जीवन की उपलब्धि मानता हूं।

फिर छात्र आंदोलन पर लौटता हूं। ‘अंग्रेजी हटाओ’ के हो-हंगामे को दस साल भी नहीं बीते थे कि जयप्रकाश नारायण सामने आ गए। उनके नेतृत्व की वजह से गुजरात और बिहार में फीस वृद्धि को लेकर हुए आंदोलनों ने नई शक्ल अख्तियार कर ली। उस समय यह नारा घर-घर में गूंज रहा था- ‘संपूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है’। आज के तमाम नेता उसी दौर में राजनीति में उतरे। क्या इनमें से एक ने भी जेपी के सपनों के साथ न्याय किया? 

असम में भी इसी दशक में नया छात्र आंदोलन छिड़ा। असमी भाषा और अस्मिता को लेकर छिड़े इस आंदोलन ने वहां के सत्ता-सदन की चूलें हिला दी थीं। इसी का कमाल था कि अगले विधानसभा चुनाव में विद्यार्थियों की अगुवाई में बनी असम गण परिषद ने बहुमत अर्जित किया और सत्ता में आ गई। प्रफुल्ल कुमार महंत पहले ऐसे शख्स थे, जो छात्रावास से सीधे मुख्यमंत्री आवास पहुंचे थे। सत्ता में पहुंचकर उन्हें एहसास हुआ कि उनकी लड़ाई के मुद्दे महज भावना का उछाल थे। विधान और व्यवस्था की नजर में उनका कोई मोल नहीं। एक समीक्षक ने उनकी विवशता देख लिखा था, सरकारें हर मुद्दे पर अगर हमेशा सही नहीं होतीं, तो हमेशा गलत भी नहीं होतीं। यह सियासी जुमला हकीकत के कितना करीब था!

चाहूं तो ऐसे अनेक उदाहरण दे सकता हूं, पर आज की उबलती नौजवान पीढ़ी से सिर्फ इतनी गुजारिश है कि वे इस सत्य और तथ्य को कभी न बिसराएं कि राजनीति अंतत: सत्ता के लिए की जाती है और सत्ता मनुष्य के विचारों पर ग्रहण लगा देती है। यूरोपीय कहावत है- ‘पावर करप्ट्स’। यह जरूरी नहीं है कि सिर्फ अवैध तरीके से धन कमाने वालों को ही भ्रष्टाचारी कहा जाए। ऐसे लोग, जो अपने सिद्धांतों-विचारों से समझौता करते हैं, ज्यादा खतरनाक होते हैं। 21वीं शती के इस प्रतिस्पद्र्धी विश्व में हमारे नौजवानों को अपने संघर्ष और मकसद के बीच तारतम्य बैठाना होगा। 

यहां सरकार से भी एक अपील। सिर्फ बल प्रयोग करके नौजवानों की भावनाओं को नहीं दबाया जा सकता। उनके साथ सहमति का रास्ता निकालना न केवल हुकूमत का दायित्व है, बल्कि समय की सबसे बड़ी मांग यही है। अच्छा होगा, इस आग को और फैलने से पहले रोक लिया जाए।

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