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बालाकोट के बाद की जरूरतें

शशि शेखर

बात 2002 की गरमियों की है। भारतीय संसद पर हुआ हमला बीते कल की बात लगने लगा था, परंतु उसके जख्मों से मवाद अब भी रिस रहा था। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की सेनाएं मोर्चे पर आमने-सामने थीं। उत्तरी सरहद की ओर बढ़ते सैनिकों के काफिले सवालों और आशंकाओं के गुबार छोड़ते जाते- कहीं युद्ध तो नहीं होने जा रहा? अगर जंग हुई, तो क्या वह परमाणु जद्दोजहद में तब्दील हो जाएगी? 

जितने मुंह उतनी बातें, पर एक बात तय थी। सत्ताधीशों और सेनानायकों की जुगलबंदी से परे सरहद के दोनों ओर आम आदमी समान अनिश्चितता जी रहा था। उन्माद से लड़ाई की कल्पना उपजती है, पर समय के साथ भय और आशंका के बादल उन्हें घेरने लगते हैं। बड़बोलेपन और असुरक्षा के उस द्वंद्व के बीच मैंने सोचा कि क्यों न सीमा पर चलकर सूरत-ए-हाल जाना जाए? 

अपना एक अनुभव शेयर करता हूं। जम्मू के समीप एक छावनी में उस दिन अनिश्चितता पसरी हुई थी। प्राय: हर रात दोनों ओर से गोले बरसते। सैनिकों के ऊपर से शूं-शूं की ध्वनि के साथ उड़ते बम, हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी धरती पर एक-सा कहर ढाते। उस रात की गोलाबारी में हमारा एक किसान और उसकी बेटी मारे गए थे। सरहद के उस पार भी इसी तरह निरीह लोग मारे जा रहे थे, लेकिन सत्ता का दंभ गरीब-गुरबा की मौत पर ध्यान नहीं देता। 

छह महीने तक दोनों देशों की सेनाएं इसी तरह एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले बैठी रहीं। यह वह समय था, जब नई दिल्ली की हुकूमत चला रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘फुल स्केल वार’ पर गंभीरता से विचार किया था, मगर युद्ध नहीं हुआ। उस समय सत्ता के शीर्ष से जुडे़ लोगों ने इसकी दो वजहें बताई थीं। पहली थी, ‘अंकल सैम’ यानी अमेरिका का दबाव।

उस वक्त वाशिंगटन को इस्लामाबाद-रावलपिंडी गठजोड़ की खासी जरूरत थी। कुछ ही महीने पहले 9/11 बीता था। इसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया था। पेंटागन चाहता था कि पाकिस्तान उसके दस्तों को न केवल रास्ता मुहैया कराए, बल्कि हरसंभव सहायता भी प्रदान करे। पाकिस्तान का तर्क था कि हमारी फौजें भारतीय मोर्चों पर तैनात हैं। ऐसे में, आप हमसे बहुत मदद की उम्मीद न करें। यही वजह है कि अमेरिका दबाव बना रहा था कि भारत सीमाओं पर से थल सेना को हटाए। कारगिल के समय में अमेरिका ने मध्यस्थता की थी। अटल बिहारी वाजपेयी इसको भूले नहीं थे, लिहाजा वह राजी हो गए थे। 

इसके विपरीत उस समय आंतरिक सुरक्षा और गुप्तचर एजेंसियों से जुडे़ लोग बताते हैं कि हमारी सेना का मनोबल तो ऊंचा था, पर साजो-सामान जरूरत के मुताबिक न था। वाजपेयी ने इसीलिए अमेरिका पर एहसान करना उचित समझा। यह बात अलग है कि सेना के सूत्रों ने इस तर्क की हमेशा बखिया उधेड़ी है। हकीकत कुछ भी हो, जंग टल गई और साथ ही तय हो गया कि आने वाले सालों में भारत आतंकवाद से लड़ने की पुरानी रीति-नीति पर चलता रहेगा। अगले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी एक दशक तक कमोबेश इसी रास्ते पर चलने में भलाई समझी, मगर नरेंद्र मोदी ने इस मत को सिरे से बदलकर रख दिया है। 

पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के करीब 40 जवानों की शहादत के दो सप्ताह के अंदर जिस तरह बालाकोट में हवाई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की गई, उसे गौर से देखना-समझना होगा। मोदी ने उरी के समय से तय कर रखा था कि अब आतंकवादी हमले के जवाब में हिन्दुस्तान सिर्फ कूटनीतिक स्तर पर विरोध दर्ज नहीं करवाएगा। हमले का जवाब हमला होगा। बालाकोट इसका जीता-जागता उदाहरण है। 

हवाई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से दोनों मुल्कों में जो सियासी बहस छिड़ी हुई है, उसे दरकिनार कर दें, तो एक बात तय है कि मोदी के इस कदम ने अगली आने वाली सरकार, चाहे वह खुद उनकी क्यों न हो, के लिए प्रतिरोध की लकीर काफी लंबी कर दी है। भविष्य में यदि भारतीय भूमि पर दहशतगर्दों का हमला हुआ, तो दिल्ली के सत्तानायकों से समान कार्रवाई की उम्मीद की जाएगी। 

भारत में इस वक्त बहस पुरगर्म है कि इस हमले से मिला क्या? इमरान खान ने हवा में हुई जद्दोजहद के बाद जिस तरह विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा किया, जमात-उद-दावा और जैश पर प्रतिबंध लगाए, मसूद के भाई-बेटे को हिरासत में लिया, उससे उम्मीद बंधती है। यही नहीं, पंजाब प्रांत के संस्कृति मंत्री फयाजुल हसन चौहान को बर्खास्त कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने दुनिया को संदेश देने की कोशिश की है कि हम बदल रहे हैं। चौहान ने हिंदुओं के विरुद्ध टिप्पणी की थी। इमरान ने न केवल उन्हें बर्खास्त किया, बल्कि सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने को मजबूर किया। 
इन नन्हे कदमों से यह मान बैठना कि पाकिस्तान बदल रहा है, जल्दबाजी होगी। गुजरे बरसों के अनुभव गवाह हैं कि अपनी गोद में पल रहे आतंकियों को बचाने के लिए पाक ने समय के साथ रणनीति में परिवर्तन किए हैं। 

याद करें, इस सदी की शुरुआत तक पाकिस्तान में पल रहे मौजूदा दहशतगर्द तंजीमों के प्रशिक्षण कैंप अफगानिस्तान में हुआ करते थे। पश्चिमी फौजों की आमद के बाद पाकिस्तान ने उन्हें अपने कब्जे वाले कश्मीर अथवा भारत के अन्य सरहदी इलाकों में स्थानांतरित कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जलालत न उठानी पडे़। सीमावर्ती होने के कारण भटके भारतीय नौजवानों के लिए ये कैंप सुगम थे। बालाकोट ने सिद्ध कर दिया है कि यह सुगमता अब असुरक्षित हो गई है। 

इससे आशंका उपजने लगी है कि कहीं रावलपिंडी के षड्यंत्रकारी जनरल साहिबान इन कैंपों को अपनी सैन्य छावनियों से न जोड़ दें। वे ऐसा करते रहे हैं। उन्होंने लादेन को तोरा-बोरा की पहाड़ियों से निकालकर एबटाबाद की छावनी के समीप शरण दी थी। इस समय मसूद अजहर का इलाज भी सैनिक अस्पताल में ही हो रहा है। उसके भाई और बेटे को भी सेना की निगरानी में नजरबंद किया गया है। क्या यह उन्हें ‘कोवर्ट ऑपरेशन’ से बचाने की साजिश है? पाकिस्तानी नीति-नियंता जानते हैं कि भारत या कोई अन्य देश सैनिक छावनी पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने से पहले सौ बार सोचेगा। 

मतलब साफ है, हमें पाकिस्तान की अगली गतिविधियों पर सतर्क दृष्टि रखनी होगी। सलमान रुश्दी के मिडनाइट चिल्ड्रन  एक साथ उपजे जरूर हैं, पर उनके रिश्तों में निश्छल भरोसे की उम्मीद को अभी तक जगह नहीं मिली है। आप चाहें, तो इसे सरहद के दोनों ओर रहने वाले डेढ़ अरब से अधिक इंसानों की जन्मजात त्रासदी कह सकते हैं।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 10 march