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शिक्षा मंदिरों में सियासी कालिख

शशि शेखर

उस टेलीविजन समाचार ने मेरी नींद हराम कर दी थी। हुआ कुछ यूं कि कच्छ विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर को छात्रों ने उनकी कक्षा में जा घेरा और उनके चेहरे पर कालिख पोतनी शुरू कर दी। हड़बड़ाहट में प्रोफेसर महोदय गिर पडे़, तो दो छात्रों ने बांह पकड़कर उठाया, पर तीसरा बेफिक्री से उनका चेहरा काला करता रहा। यह घृणित लीला यहीं नहीं रुकी। इसके बाद किसी विवश और बेजुबान जीव की भांति सहमे हुए प्राध्यापक को एक कुरसी पर बैठाकर उनके चेहरे की दुर्गति को ‘फाइनल टच’ दिया गया।

दुस्साहसियों के दल का मन बढ़ा हुआ था। उन्होंने फैसला किया कि क्यों न इनका जुलूस निकालें, ताकि हमेशा के लिए एक नजीर बन जाए। फिर क्या था? प्रोफेसर साहब को धकियाते हुए ये लोग आसपास के इलाके में घूमने लगे। जिल्लत के शिकार ‘गुरु’ की चाल अगर धीमी पड़ जाती, तो कोई उन्हें पीछे से धकिया देता या आगे चलता अन्य युवक उन्हें बांह पकड़कर घसीट लेता। कुछ साल पहले उज्जैन का भी ऐसा ही वीडियो सामने आया था, जब वहां के एक प्रोफेसर की इतनी पिटाई की गई थी कि वह दम तोड़ बैठे। इत्तिफाक से दोनों ही कांड अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के जरिए अंजाम दिए गए। 

यहां यह मत मान बैठिएगा कि सिर्फ एबीवीपी के कार्यकर्ता उत्पाती हैं। दो बरस पुराने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के तमाशे को याद कीजिए। वहां कुछ नौजवानों ने कश्मीर की आजादी और भारत के टुकड़े-टुकडे़ होने के नारे लगाए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भी पिछली 5 जून को शर्मनाक वाकया सामने आया। उच्च न्यायालय के आदेश पर जब छात्रावासों में अवैध रूप से रह रहे लोगों को हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई, तो हंगामा बरपा हो गया। आगजनी, बमबारी और हिंसक अनाचार ने लोगों को डरने पर मजबूर कर दिया। पिछले साल भी यह विश्वविद्यालय शर्मनाक हिंसा के चलते बदनाम हुआ था। यहां की छात्र यूनियन पर समाजवादी छात्र सभा का कब्जा है।

मतलब साफ है। दलों की दलदल ने पहले सियासी विमर्श को प्रदूषित किया। अब शिक्षा मंदिरों की बारी है। कच्छ पर लौटते हैं। वहां प्रोफेसर की दुर्गति देख बरसों से मेरी यादों में सोई पड़ी एक घटना अचानक सामने आ खड़ी हुई। मैं उन दिनों कक्षा दो या तीन का छात्र था। हम देवी के एक प्रसिद्ध मंदिर में दर्शन के लिए गए थे। तब तक वहां बकरे की बलि दी जाती थी। मैंने देखा कि एक शख्स छोटे से बकरे को घसीटता हुआ ला रहा है। नहला-धुलाकर सजाए गए बकरे की पीठ पर लाल और सुनहरी चादर बंधी थी और माथे पर चमकता हुआ तिलक लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। मैंने अपने पिता से पूछा कि बकरे को तो खुश होना चाहिए कि उसे इतना सजाया-संवारा गया है, फिर यह आगे बढ़ने से क्यों इनकार कर रहा है? पिता ने बताया कि  वह समझ रहा है कि मुझे बलि के लिए ले जाया जा रहा है, इसीलिए वह कदम पीछे खींचने की कोशिश कर रहा है। 
कच्छ के प्रोफेसर साहब का भी तो यही हाल था। सवाल उठता है, हमारे यहां शिक्षक कब से बलि के बकरे हो गए! उन्हें तो वैदिक ऋषियों से लेकर गुरु नानक तक, सभी ने सर्वोपरि माना है।  मुझे यहां ‘शांतिप्रिय’ छात्रों से शिकायत है। जब कुछ हुड़दंगी उनके प्रोफेसर का हाल बेहाल कर रहे थे, तब वे चुप क्यों बैठे रहे? वह जवानी बेकार है, जो अन्याय होता देख सिर नीचा कर ले। अगर कुछ छात्र सिर्फ प्रतिरोध की आवाज ही उठा देते, तो उन शोहदों की हिम्मत टूट जाती। बरसों पहले का एक वाकया बताता हूं। बात 1970 के दशक की है। उन दिनों में आगरा कॉलेज मैं बीए का छात्र था। कहीं से लौटते हुए हम लोगों ने देखा, कॉलेज प्रांगण के मंदिर के बाहर भीड़ जुटी है। वहां पहुंचने पर पाया कि राजनीति शास्त्र के एक व्याख्याता रो-रोकर छात्रों को बता रहे थे कि कैसे उनके साथ मारपीट की गई है?

व्याख्याता के बाल बिखरे हुए थे। शरीर पर खरोंच के निशान थे और कमीज फट गई थी। उनकी इस दशा पर वहां मौजूद विद्यार्थियों का खून खौल उठा। वे हमलावर की तलाश में जुट पड़े। हंटर फटकारता जो दबंग छात्र थोड़ी देर पहले अपनी हिंसक गतिविधि पर इतरा रहा था, वह किसी तरह से जान बचाकर भागा। पुलिस ने उसे अगले दिन गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जमानत पर छूटने के बाद कॉलेज लौटना दूर, वह उसके आसपास भी नहीं फटका। ध्यान दें। अपने छात्र की बदसुलूकी के शिकार व्याख्याता ने पुलिस अथवा कॉलेज प्रशासन के पास जाने से पहले अपने अन्य छात्रों से गुहार लगानी उचित समझी। हमारे शिक्षकों का  नैतिक बल पिछले कई दशकों में दरका है। इससे गुरु-शिष्य परंपरा को गहरी                चोट पहुंची है।

दरअसल, आजादी के बाद सुस्पष्ट शिक्षा नीति के अभाव में हमारे शिक्षण संस्थान लगतार उपेक्षित होते रहे हैं। एक जमाना था, जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय को ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कहा जाता था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय और शांति निकेतन की तुलना गुरुकुलों से होती थी। दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी शास्त्रीयता के लिए विख्यात था, तो नया बना जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ‘प्रगतिशीलता’ के लिए। पुणे के ‘फग्र्युसन’ और आगरा के आगरा कॉलेज को भी बड़ा दर्जा हासिल था। अल्तेकर अथवा मनोहर रे जैसे विद्वान यहां पढ़ाकर खुद को कमतर नहीं मानते थे। शिक्षा के व्यवसायीकरण और स्व-वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों ने हमें योग्य पेशेवरों की जगह अधकचरे प्राध्यापकों और दिशा-विहीन युवाओं की जमात सौंप दी है। उज्जैन से लेकर कच्छ तक की घटनाएं इसका उदाहरण हैं। 

भारत में अपना व्यवसाय फैलाने के लिए इच्छुक बहुराष्ट्रीय कंपनियों को शिकायत है कि हमें अच्छे अधिशासी नहीं मिलते। नौजवानों को शिकवा है कि हमें नौकरियां ही नहीं मिलतीं। मांग और चाहत के इन दो सैलाबों को सिर्फ अच्छी शिक्षा ही समेट सकती है, जिसका हमारे यहां सिरे से अभाव है। शिक्षण संस्थानों में अध्यापकों के पद खाली पड़े हैं। अगर कुछ ‘कोर्सेज’ में पढ़ाई हो रही है, तो उसे भी तदर्थवाद के सहारे खींचा जा रहा है। साल-दर-साल अनुबंध और कम वेतन की नौकरियों वाले प्राध्यापक अपने छात्रों में संस्कारों की जगह कुंठा के बीज नहीं, तो और क्या रोपेंगे? 
बात-बेबात सत्र-दर-सत्र बाधित होती संसद और माननीय सांसदों से दरख्वास्त है कि कम से कम एक बार इस मुद्दे पर बात तो करें। मामला आने वाली पीढ़ियों का है, हम उनके प्रति इतने लंबे समय तक गैर-जिम्मेदार नहीं बने रह सकते।

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  • Web Title:shashi shekhar aajkal hindustan column on 1 july