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कश्मीर के संदर्भ में पंजाब का प्रसंग

शशि शेखर

कश्मीर घाटी के लिए कल, यानी सोमवार का सवेरा क्या संदेश लेकर आएगा? जम्मू-कश्मीर की हुकूमत की घोषणा के अनुसार, सोमवार को कई इलाकों के स्कूल खुलेंगे और सरकारी दफ्तर फिर से काम करने लगेंगे। इस बीच कई इलाकों में लैंडलाइन फोन फिर से घनघनाने लगे हैं और सड़कों पर आमदरफ्त बढ़ गई है।
इन जानकारियों के साथ प्रदेश के मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रमण्यम ने दावा किया कि इस दौरान 22 में से 12 जनपदों में जिंदगी कुछ पाबंदियों के साथ ढर्रे पर लौट आई है। उन्हें सुकून है कि छिटपुट प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था के लिए जो जरूरी कार्रवाई हुई, उससे किसी को जानी नुकसान तो दूर, कोई गंभीर रूप से घायल भी नहीं हुआ है। जिन लोगों ने घाटी में 2008, 2010 और 2016 की हिंसा देखी है, उनके लिए यह सुखद है। आने वाले हफ्ते में अगर कोई बड़ी हिंसक वारदात नहीं होती, तो साबित हो जाएगा कि कश्मीर चोला बदलने को तैयार है। दिल्ली से घाटी के कस्बों तक फैला सरकारी तंत्र दिन-रात इसके लिए जमीन तैयार करने में जुटा है। सरकार अंदरखाने लोगों से संवाद बनाने की कोशिश कर रही है। खुद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के दौरे इसका उदाहरण हैं।

अगर ये कोशिशें कामयाब रहीं, तो तय हो जाएगा कि हुर्रियत और तथाकथित मुख्यधारा के राजनीतिज्ञों की ‘पल में तोला पल में माशा’ की नीति से लोगों का मन भर चुका है। जानने वाले जानते हैं कि वहां की राजनीति दो स्थापित खानदानों के बीच की फुटबॉल बन गई थी, जिनके बीच सूबे के तरक्कीपसंद लोग पिस रहे थे। आप कश्मीर की खूंरेजी का इतिहास उठा देखें। यह जग-जाहिर है कि जो लोग बिना बंदूक के समाधान चाहते थे, उन्हें मार गिराया गया। इसके उलट स्थापित आतंकवाद से लड़ने के लिए जब कूका पारे जैसे पूर्व दहशतगर्दों ने अपने इलाके में नई बयार बहाने की जुगत करनी शुरू की, तो वे भी मारे गए। 
घाटी में हिंसा और अहिंसा एक सिक्के के दो पहलू बन गए थे।

यही हाल धर्म और राजनीति के मिश्रण के जरिए मौज उड़ाने वाले हुर्रियत नेताओं का है। मीठा गप्प और कड़वा थू करने वाले ये लोग सुरक्षित रहे, इनकी औलादें महफूज बनी रहीं और तरक्की इनके कदम चूमती रही। यह वैषम्य वक्त के साथ आम आदमी को भी समझ आने लगा और उसके मन में इनसे निजात पाने की आकांक्षा पैदा होने लगी। हालांकि, इसका यह मतलब कतई नहीं है  कि ऐसे लोगों को अनुच्छेद  370 का विरोधी मान लिया जाना चाहिए। अभी इसका इम्तिहान होना बाकी है।

कश्मीर की इस समस्या के संदर्भ में पंजाब के कुछ प्रसंगों को याद करना मौजूं होगा। जून 1984 में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बाद हालात बुरी तरह बिगड़ गए थे। कहते हैं कि उस दौरान सैकड़ों गांवों से हजारों लोग हरमंदिर साहिब जाने के लिए निकल पडे़ थे। सुरक्षा बलों को उन्हें रोकने में खासी मशक्कत करनी पड़ी थी। लगता था, जैसे पंजाब एक ऐसा अलाव बन गया है, जिसकी आत्मघाती आग कभी बुझेगी नहीं। स्वर्ण मंदिर के प्रांगण में कार्रवाई के दौरान हुआ नुकसान इस अलाव को हवा दे रहा था। अलगाववादी चाहते थे कि स्वर्ण मंदिर भी जलियांवाला बाग की तरह एक ऐसा स्मारक बन जाए, जिसे देखकर सिखों की आने वाली पीढ़ियां उबलती रहें और नई दिल्ली के तख्त से लड़ने के लिए प्रेरित होती रहें। इसी कठिन समय पर बाबा संता सिंह की अगुवाई में ‘बुड्ढा दल’ सामने आया था। ‘बुड्ढा दल’ ने परिसर को फिर से चुस्त-दुरुस्त किया।

यह वह मुकाम था, जब समाज ने विभाजनकारी सियासत के मुंह पर ऐसा करारा तमाचा मारा था, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई पड़ी थी। बाद में संत हरचंद सिंह लोंगोवाल ने लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रक्रिया को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह कहते थे कि पंजाब को तब तक तरक्की हासिल नहीं हो सकेगी, जब तक हम अपनी मर्जी की सरकार नहीं बनाएंगे। संगरूर के शेरपुर गांव में गुरुद्वारे के एक समागम के दौरान गोली मारकर उनकी हत्या कर दी गई थी। देश के सभी प्रमुख अखबारों ने उन्हें दूसरे गांधी के विशेषण से नवाजा था। तमाम भावुक अग्रलेख लिखे गए थे। समूचे देश का मन सावन-भादों की तरह तरल हो चला था। आजाद भारत के इतिहास में किसी अन्य सूबाई शख्सियत को ऐसा आदर इससे पहले हासिल नहीं हुआ और न बाद में।

पंजाब में शांति की घर वापसी की एक और वजह थी। वहां का सामाजिक ताना-बाना ऐसा था, जो धार्मिक उन्माद से उपजे आतंक को लंबे वक्त तक बर्दाश्त नहीं कर सकता था। खालिस्तान आंदोलन की अगुवाई  आमतौर पर जट सिख कर रहे थे। मजहबी सिखों और मोना यानी केश व कृपाण न रखने वाले सिखों में इसके प्रति कोई सम्मोहन न था। वे खुद इसका शिकार बन रहे थे। इसीलिए संता सिंह और हरचंद सिंह लोंगोवाल जैसी शख्सियतों को गहरा जन-समर्थन मिला। 
कश्मीर में हालात इससे जुदा हैं। अविभाज्य जम्मू-कश्मीर तीन ‘खित्तों’ में बंटा था। जम्मू में हिंदू, घाटी में मुस्लिम और लद्दाख में बौद्धों की बहुतायत है।

यही वजह है कि शेख अब्दुल्ला के बाद पूरी रियासत का कोई एकछत्र नेता न हुआ। घाटी को इस बात का गुरूर था कि हम बाकी दो खित्तों पर हुकूमत करते हैं। इसके उलट दोनों भूभागों में यह अफसोस व्याप्त था कि सूबे में कभी हमारा मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता? घाटी के लोगों में कट्टरता इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने कभी गुलाम नबी आजाद तक को ‘अपना आदमी’ नहीं माना। वजह? आजाद साहब घाटी नहीं, बल्कि डोडा से आते हैं, जो जम्मू खित्ते का हिस्सा है।

इसी कट्टरता, अलगाव और कुछ गिरोहों के प्रभुत्व ने वहां लोंगोवाल अथवा संता सिंह जैसी शख्सियतों को पनपने से पहले ही समाप्त कर दिया। ऐसा इसलिए भी किया जाता था, ताकि राज्य के संसाधनों और केंद्र से आने वाली इमदाद की बंदरबांट की जा सके। जम्मू-कश्मीर को अमन-अमान कायम करने के लिए अपने बीच से ऐसी शख्सियतों को चुनना होगा। घाटी में इम्तिहान महज सरकारी तंत्र का नहीं, वहां के अमनपसंद अवाम का भी है।

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  • Web Title:Shashi Shekhar Aajkal Hindustan Column 18th August