Shashi Shekhar aajkal column on New year resolution in Hindustan - नए साल का निश्चय प्रस्ताव DA Image
13 दिसंबर, 2019|3:11|IST

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नए साल का निश्चय प्रस्ताव

shashi shekhar

मेट्रो में बैठा नई उम्र की नई फसल मार्का वह जोड़ा देर से चुहल कर रहा था। उनकी बातचीत का विषय क्रिसमस और नववर्ष पर अधिक से अधिक ‘मस्ती’ करना था। रह-रहकर उनके फोन घनघनाते, वाट्सएप संदेश आते और वे रनिंग कमेंट्री की स्टाइल में सूचित करते चलते कि हम अमुक स्टेशन पार कर गए हैं, तुम भी पहुंचो।

दूसरों की बातें सुनना सभ्यता के विरुद्ध है, पर करूं क्या? वे ‘लाउड’ थे और अगर मैं कानों पर हाथ रख लेता, तो अति सभ्य बनने की फिराक में विदूषक साबित हो गया होता। ध्यान हटाने के लिए मैंने समूची चेतना आईफोन की स्क्रीन पर केंद्रित कर दी। दफ्तर के मेल, एसएमएस, वाट्सएप संदेशों के उत्तर तत्क्षण दे देता हूं। फेसबुकिया बहादुर अपनी चकल्लस में जुटे थे। वहां करने को कुछ न था। सोचा, ट्विटर खंगाल लूं, शायद कुछ नया और अच्छा हासिल हो जाए। अपने हैंडिल की ‘सर्फिंग’ के दौरान ही उनका ट्वीट उभरा।

अमेरिकावासी महिला इतिहासकार ऑड्री ट्रश्के को मैं ध्यान से पढ़ता हूं। वह इतिहास के तर्क और तथ्यों का वैज्ञानिक विवेचन करती हैं। उन्होंने अपने देश के एक विश्व प्रसिद्ध अखबार की खबर ट्वीट की थी, जो विस्तार से बताती थी कि इस बार भारत में क्रिसमस की मौज-मस्ती पर तथाकथित दक्षिणपंथियों की वजह से खतरा मंडरा रहा है। दूरदराज के गांवों में घटी दो-एक घटनाओं और अति वाचाल संगठनों के कागजी वक्तव्यों के आधार पर इस समाचार का शीराजा खड़ा किया गया था। पढ़कर ऐसा लगा, जैसे कोई बड़ा खतरा हिन्दुस्तान नाम के मुल्क पर मंडरा रहा है। तभी बगल में बैठे जोडे़ की ओर ध्यान गया, वे उस दिन ‘क्रिसमस ईव’ और अगले दिन क्रिसमस मनाने जा रहे थे। क्षमा पूर्वक उनसे उनके नाम पूछता हूं।

कुछ सकुचाते हुए उन्होंने बताया- रोहित और रेहाना। यह सकुचाहट धर्म नहीं, बल्कि मेरी अजनबीयत की वजह से उपजी थी। उनसे मेरा अगला प्रश्न था, ‘आपको यह त्योहार मनाने में डर तो नहीं लग रहा?’ उन्होंने कहा, ‘डर कैसा? हम तो हर साल इन्हें मनाते हैं।’ मन में सवाल उठा कि जिस अखबार ने यह खबर छापी है, वह काफी ठोक-बजाकर खबरें छापता है। उसने जबर्दस्त विश्वसनीयता हासिल कर रखी है, फिर वहां ऐसा समाचार कैसे? उनके अपने देश में भी तो तमाम बड़बोले हैं, जो रंग, धर्म, भाषा आदि के आधार पर प्याली में तूफान खड़ा करने की कोशिश करते रहते हैं। स्थापित मीडिया प्रतिष्ठानों के लोग जानते हैं कि इस खोखली बयानबाजी का मकसद महज सस्ती लोकप्रियता हासिल करना होता है। न्यूयॉर्क से नई दिल्ली तक और वाशिंगटन से वियना तक उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता, फिर ऐसी खबर क्यों? 

यहां, रोहित और रेहाना से याद आया। अमेरिकी अखबार की खबर नई दिल्ली वासी एक ऐसी महिला की आशंका से शुरू की गई थी, जो जन्म से मुस्लिम हैं, पर उन्होंने एक हिंदू से विवाह किया। ये दोनों भी तो अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखते हैं। उनका आपसी रिश्ता पूछना अशिष्टता होती, पर उस मुख्तसर वार्तालाप से मालूम पड़ गया था कि वे गुड़गांव स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हैं। दोनों में से किसी का धार्मिक वास्ता ईसाइयों के इस त्योहार से नहीं है। इसके बावजूद वे बेरोक-टोक उत्सव की उमंग से सराबोर थे। यही है आज का हिन्दुस्तान। इसकी तारीफ की जानी चाहिए।

दरअसल न्यूयॉर्क के उस समाचार पत्र के संवाददाताओं को ऐसा लिखने का मौका इसलिए मिल गया, क्योंकि एक तथाकथित प्रतिक्रियावादी हिंदू संगठन ने क्रिसमस के खिलाफ कोई बयान दिया था। उस पर भरोसा करने की बजाय इस आलेख के लेखकों ने अगर राजधानी के आसपास के इलाके पर नजर डाल ली होती, तो मालूम पड़ जाता कि तमाम होटल और रेस्तरां 25 और 31 दिसंबर के लिए कैसे-कैसे प्रस्ताव दे रहे हैं और उन्हें कितनी जबर्दस्त बुकिंग मिल रही है। वे यह भी भूल गए कि ज्यादातर भारतीय विक्रम संवत् की बजाय ईस्वी सन् को अपना चुके हैं। इसीलिए 31 दिसंबर को उत्सव आयोजित किए जाते हैं। हालांकि, कुछ लोग रह-रहकर ईस्वी सन् की जगह विक्रम संवत् अपनाने की सलाह देते हैं, पर इसका बहुत असर नहीं पड़ता है। इसकी दो खास वजहें हैं- आदत और सुविधा। अंग्रेजों ने पौने दो सौ साला हुकूमत में जो लत डलवाई, वह ऐसी आदत बन गई है, जो आसानी से जाती नहीं। इसके अलावा समूची दुनिया में ईस्वी सन् का बोलबाला है। प्रशासनिक और लेखाकार्य इसी के अनुसार चलते हैं, जिनकी अनदेखी आसान नहीं।

मुझे लगा कि ऑड्री और उस अखबार के सामने सही तस्वीर रखनी चाहिए। मैंने जवाबी ट्वीट में उन्हें बताया कि मेरे ख्याल से भारत में क्रिसमस मनाने में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं है। तमाम होटल, रेस्टोरेंट, क्लब आदि इसके लिए बुक हो रहे हैं। मैं क्रिसमस की पूर्व संध्या पर समूची जिम्मेदारी से यह कह सकता हूं कि कल किसी को क्रिसमस मनाने से रोका नहीं जाएगा। बताने की जरूरत नहीं, क्रिसमस शांति और उल्लास के साथ बीता।

मैं चाहूं, तो ऐसे और उदाहरण दे सकता हूं, पर हमारी समझ को साफ करने के लिए यह अकेला नमूना काफी है। हम भारतीयों को जान-समझ लेना चाहिए कि हमारे बीच के ही कुछ लोग सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में ऐसे बयान दे बैठते हैं, जिससे परदेस में बैठे लोग आशंकित हो उठते हैं। अगर मीडिया इनका तिरस्कार कर भी दे, तो वे सोशल मीडिया पर अपना प्रोपेगेंडा फैलाने में कामयाब हो जाते हैं। एक हिन्दुस्तानी होने के नाते क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि ऐसे तत्वों से खुद को दूर रखें और जहां तक हो सके, उन्हें नकारात्मकता फैलाने से रोकें?  

उस शाम मेट्रो से बाहर निकलते वक्त मुझे लगा कि पर्यावरण रक्षा के लिए सप्ताह में एक दिन निजी कार की बजाय मेट्रो अथवा किसी और सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल की खब्त आज कुछ काम तो आई।

कल पहली जनवरी है। नए साल का पहला दिन। इस दिन तमाम लोग अपनी बुरी आदतें छोड़ने का संकल्प लेते हैं। क्यों न हम इस साल एक साझा ‘न्यू ईयर रिजॉल्यूशन’ लें कि हम अपने देश को नकार और निषेध का नक्कारखाना नहीं बनने देंगे! हमें भूलना नहीं चाहिए कि इस वर्ष भारत का शुमार संसार की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में हो सकता है, पर यह विकास-यात्रा तभी आगे बढ़ सकती है, जब देश में हो रहे नेक कार्यों की रोशनी समूची दुनिया में फैले। क्यों न अगले वर्ष परदेसी निंदकों की निंदा करने की बजाय हम पहले अपनी खामियों को सुधारें? हमें हिन्दुस्तान को सिर्फ अमीर नहीं, बल्कि विचार समृद्ध देश भी बनाना होगा।

उम्मीद है, नए साल की शुभकामनाओं के साथ आप मेरी इस पेशकश को भी स्वीकार करेंगे।

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