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क्या युद्ध हमें देख रहा है

hindustan editor shashi shekhar

एक उपन्यास में लियोन ट्रॉटस्की का संवाद था- युद्ध में आपकी रुचि भले न हो, परंतु युद्ध की रुचि आप में अवश्य होती है। पता नहीं, असल जिंदगी में वह ऐसा मानते थे या नहीं, पर प्रचलित कथाओं और कथनों के पीछे की सीख हमेशा कारगर होती है। होमर की ओडेसी  से तुलसी कृत रामचरितमानस  तक के पात्र और उनके वक्तव्य इसका उदाहरण हैं। 

मुझे यह सब कुछ इसलिए याद आया, क्योंकि पाकिस्तान की युद्ध-आसक्ति फिर से जोर मारने लगी है। वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पहले संसद में परमाणु युद्ध की धमकी दी और उसके बाद जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया भर के संवाददाताओं से कह दिया कि 'कश्मीर' भारत और पाकिस्तान का द्विपक्षीय मामला है, तो वह फिर बौखला उठे। 

आनन-फानन में राष्ट्र के नाम संदेश में उन्होंने एक बार फिर परमाणु युद्ध की धमकी दोहराते हुए चेतावनी दे डाली कि इसका नतीजा पूरी दुनिया को भुगतना पडे़गा। वह भारत के साथ समूची दुनिया को धमकाना चाहते हैं। वह यहीं नहीं रुके। गुजरे जुमे को उन्होंने यहां तक कह डाला कि मुस्लिमों पर जुल्म के मामले में संयुक्त राष्ट्र खामोश रहता है। साफ है। कश्मीर के मसले पर उन्हें मुस्लिम मुल्कों से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला, अब वह उनकी गैरत को ललकार रहे हैं। 

इमरान कितनी भी शाब्दिक अकड़ दिखा लें, पर हकीकत में वह कमजोर प्रधानमंत्री हैं। पिछले चुनाव में उनकी पार्टी को पूरा बहुमत नहीं मिला था। संसदीय गणित उनके पक्ष में करने के लिए रावलपिंडी के सैन्य प्रतिष्ठान ने छल-बल के सारे तरीके इस्तेमाल किए थे। यही वजह है कि उन्होंने सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा को तीन साल की सेवा वृद्धि देकर एहसान चुकाया। पाकिस्तान में सेना और शासन की ऐसी जुगलबंदी लंबे समय बाद देखने को मिली है। पिछले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सेना के रिश्तों की धूप-छांव जगजाहिर है।

यह गठजोड़ संशय पैदा करता है, क्योंकि पाकिस्तान जन्मजात तौर पर संशयशील मुल्क है। धार्मिक आधार पर मोहम्मद अली जिन्ना देश बनाने में भले कामयाब हो गए हों, मगर यह राष्ट्र खुद को 25 साल भी संगठित नहीं रख पाया। 1971 में बांग्लादेश के अभ्युदय के साथ जिन्ना का सपना भी सदा-सर्वदा के लिए बेमानी हो गया था। वहां के नेता, पत्रकार और तथाकथित विद्वान भले ही मुस्लिम बिरादरान की दुहाई देते रहें, पर यह सच है कि पड़ोसी ईरान और अफगानिस्तान में भी अलगाववादी गतिविधियों के लिए आईएसआई ही जिम्मेदार रही है। पाक सैन्य प्रतिष्ठान ने पड़ोसियों के घर में आग लगाने के लिए जिन लड़ाकों को प्रशिक्षित किया, उन्होंने पाकिस्तान को तमाम नुकसान पहुंचाए। ऐसे तत्वों ने धार्मिक उन्माद फैलाया, तरक्कीपसंद ख्यालों का गला घोटा और खुद इतने शक्तिशाली बन बैठे कि कई बार रावलपिंडी के सैन्य प्रतिष्ठान को भी चुनौती दे डाली। जनरल परवेज मुशर्रफ ने जब इन्हें उखाड़ने की कोशिश की, तो उन्हें बारूद से उड़ाने का षड्यंत्र रचा गया। रावलपिंडी के पास हुए हमले में वह बाल-बाल बचे थे।

पाकिस्तानी जम्हूरियत के इस दोमुंहेपन ने अंदरूनी तौर पर उसे लगातार खोखला किया है। 1980 के दशक की शुरुआत तक वहां की प्रति व्यक्ति आय भारत से ज्यादा थी, पर पड़ोसियों से छद्म युद्ध लड़ने के प्रयास में उसकी अर्थव्यवस्था लुढ़कती चली गई। भारत की तरह पाकिस्तान में भी नौजवान आबादी ज्यादा है, पर वहां लगभग 45 फीसदी बच्चे किसी भी तरह की औपचारिक शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और 33 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी-रेखा से नीचे बसर करते हैं। यही वजह है कि दहशत का कारोबार चलाने वालों को वहां आत्मघाती दस्ते बनाने में किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता। इन नौजवानों के लिए ‘जेहाद’ रोजगार का जरिया है।

भारत के हालात इसके उलट हैं। भारतीयों ने न केवल अंदरूनी तरक्की की, बल्कि समूची दुनिया में लोहा मनवाया है। 2014-2015 में अमेरिका में हुई 'रिसर्च' में सामने आया था कि वहां की कुल आबादी में भारतीय मूल की हिस्सेदारी सिर्फ एक प्रतिशत के आसपास है, पर जहां आम अमेरिकी नौजवानों में 28 प्रतिशत ग्रेजुएट थे, वहीं भारतीय मूल के 67 फीसदी नौजवान स्नातक अथवा उससे बड़ी डिग्री हासिल करने में सफल रहे। इसका असर निजी आमदनी पर भी पड़ा। शोध के अनुसार, आम अमेरिकी की औसत आय 50 हजार डॉलर थी, जबकि भारतीय मूल के लोग औसतन 90 हजार डॉलर कमा रहे थे। स्ट्रोब टालबोट ने यूं ही नहीं कह दिया था कि भारत सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि एक मुकम्मल विश्व शक्ति है। होना तो यह चाहिए था कि पाकिस्तान, भारत और भारतीयों से सबक लेता, परंतु वहां के भारत-ग्रंथि के शिकार जनरलों ने इसके बिल्कुल विपरीत लाइन चुनी। 

भारत की इस प्रगतिशीलता का विश्व बिरादरी पर खासा असर हुआ है। यही वजह है कि इमरान खान ने परमाणु युद्ध के जरिए दुनिया को डराने की कोशिश की, पर चीन और इंग्लैंड के अलावा कोई टस से मस न हुआ। इससे पहले बालाकोट हमले के जरिए भारत ने साबित कर दिया था कि परमाणु युद्ध की धमकी पाकिस्तान की मनमानी का जरिया नहीं बन सकती। अब इमरान और बाजवा की जोड़ी इस फिराक में है कि अमेरिका पर वह दबाव बना सके कि अगर अफगानिस्तान से अपनी सेना की वापसी चाहिए, तो पहले हमारे लिए भारत को 'लाइन पर' लाओ। उनका यह दांव अभी तक कारगर साबित नहीं हुआ है। यही वजह है कि इस्लामाबाद बौखला रहा है। इसी महीने द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका को 74 बरस पूरे हो रहे हैं। पहले विश्व युद्ध से अघाए लोगों की जंग में कोई रुचि नहीं थी, पर जंग की पूरी दिलचस्पी उनमें थी। हमें मानना ही होगा। मैदान-ए-जंग में पहली गोली चलने से बहुत पहले युद्ध सत्तानायकों के दिमाग में घर कर चुका होता है। 

हमें अपने बौखलाए पड़ोसी से सावधान रहना होगा। वह पहले भी चार युद्ध हम पर थोप चुका है।

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