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फौजी दखलंदाजी के खिलाफ जनादेश 

पाकिस्तान के आम चुनावों के नतीजे बता रहे हैं कि कौमी असेंबली (संसद) में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी जरूर है, लेकिन उससे भी अधिक संख्या उनकी होगी, जो निर्दलीय...

फौजी दखलंदाजी के खिलाफ जनादेश 
Pankaj Tomarटीसीए रंगाचारी, पूर्व राजनयिकSun, 11 Feb 2024 11:51 PM
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पाकिस्तान के आम चुनावों के नतीजे बता रहे हैं कि कौमी असेंबली (संसद) में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी जरूर है, लेकिन उससे भी अधिक संख्या उनकी होगी, जो निर्दलीय यानी तकनीकी तौर पर बिना किसी दलीय चुनाव-चिह्न के मैदान में उतरे। इनमें से ज्यादातर नेताओं को इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) का समर्थन प्राप्त है। हां, उनकी असल संख्या कितनी है, यह अभी साफ नहीं है। आधुनिक लोकतंत्र में दलीय प्रणाली अहम मानी जाती है और इसमें उन प्रतिनिधियों का प्रभाव कम समझा जाता है, जो किसी पार्टी से जुडे़ हुए नहीं हैं। मगर पाकिस्तान इस मामले में अलहदा साबित हुआ है।
फिलहाल, यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान में गठबंधन की सरकार बनने जा रही है। इसके प्रयास शुक्रवार देर रात से ही शुरू हो गए थे, जब यह साफ हो चला था कि किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं आने वाला है, तब अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि पीएमएल-एन चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन गई है और गठबंधन सरकार के लिए हम पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) की तरफ हाथ बढ़ाना चाहते हैं। उन्होंने अपनी तकरीर में शहबाज शरीफ को पीपीपी के साथ बातचीत के लिए अधिकृत भी कर दिया था।
मगर जनादेश के कुछ अन्य संकेत भी स्पष्ट हैं। मसलन, पाकिस्तानी फौज ने उस तरह से नवाज शरीफ का साथ नहीं दिया, जिसके कयास चुनाव-पूर्व लगाए जा रहे थे। आरोप था कि फौज उन सबका दमन कर रही है, जो नवाज शरीफ की राह में चुनौती पेश कर रहे हैं। इमरान खान का उदाहरण सबके सामने था। फौज से सीधी जंग मोल लेने के कारण वह चुनाव से बाहर कर दिए गए थे। यहां तक कि उनकी पार्टी पीटीआई को भी खत्म कर दिया गया था और उसके तमाम बडे़ नेता फौज के निशाने पर थे। यही वजह है कि जो थोड़े-बहुत पीटीआई नेता बचे रहे गए, उनको निर्दलीय चुनाव लड़ना पड़ा। चूंकि चुनाव में पीटीआई समर्थकों को बड़ी जीत मिली है, इसलिए इमरान खान के लिए यह आरोप लगाना काफी मुश्किल होगा कि फौज ने नवाज शरीफ के पक्ष में बल्लेबाजी की है। अब आरोप यह है कि अगर फौज ने हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो उनकी पार्टी पीटीआई को पूरा बहुमत मिल जाता। हालांकि, साल 2018 में, जब फौज ने इमरान खान को प्रधानमंत्री बनाने की मशक्कत की थी, तब भी पीटीआई को बहुमत हासिल नहीं हुआ था।
इसका मतलब यह नहीं माना जाना चाहिए कि फौज ने चुनाव को बिल्कुल प्रभावित नहीं किया। अलग-अलग स्रोतों से जो वीडियो फुटेज आए हैं, उनमें यह तो दिखता ही है कि चुनाव में धांधली करने की कोशिशें की गईं। हां, वे पिछले आम चुनाव जैसी नहीं थीं, क्योंकि तब के फुटेज से फौज की चौतरफा फजीहत हुई थी। मुमकिन है, उसने पिछली घटना से सबक लिया हो।
इस जनादेश से यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तानी नौजवान खास तौर से जम्हूरियत में फौजी दखलंदाजी के खिलाफ हैं। इमरान खान खुलकर फौज की लानत-मलामत कर रहे थे और उन्हें उम्मीद से कहीं अधिक सीटें प्राप्त हुई हैं, जो यह बताता है कि लोगों ने उनको संभवत: इसीलिए पसंद किया, क्योंकि उन्होंने विद्रोही तेवर अपनाया हुआ था। हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए हमें मत-प्रतिशत जैसे कुछ अन्य आंकड़ों की भी जरूरत होगी। वैसे, जिस तरह से पीएमएल-एन को सीटें मिली हैं, उससे यह नहीं लगता कि फौज की पसंद होने के कारण लोग उससे नाराज हैं। पंजाब सूबे की असेंबली के नतीजे इसी का संकेत देते हैं। 
यहां मैंने पंजाब प्रदेश की इसलिए चर्चा की, क्योंकि पाकिस्तान की राजनीति में इस सूबे का खास महत्व है। माना जाता है कि यदि पंजाब और केंद्र की सत्ता में एक ही पार्टी रहे, तो हुकूमत को चलाने में दिक्कतें पेश नहीं आती हैं। मुझे 1988 का चुनाव याद आ रहा है, जब मैं वहां अपनी सेवाएं दे रहा था। उस चुनाव में भी फौज की पसंद नवाज शरीफ थे, लेकिन खंडित जनादेश पीपीपी नेता बेनजीर भुट्टो के पक्ष में आया। तब केंद्र की सत्ता बेनजीर ने संभाली और पंजाब सूबा नवाज शरीफ के जिम्मे रहा। उस समय विपक्षी दल के नेता बेशक इस्लामाबाद में रहते थे, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह जिम्मेदारी नवाज शरीफ ही निभाते रहे। बेनजीर के लिए सरकार चलाना काफी कठिन साबित हुआ था।
अभी पीएमएल को पीपीपी की जरूरत है, तो पाकिस्तान को पांच साल तक चल सकने वाली एक स्थायी सरकार की। यहां साल 2008 का दौर याद आता है, जब इन्हीं दोनों पार्टियोंकी मिली-जुली सरकार बनी थी। नवाज शरीफ की इस मामले में जरूर सराहना की जानी चाहिए कि उस वक्त उन्होंने पीपीपी सरकार को अस्थिर करनेका कोई प्रयास नहीं किया। संभवत: दोनों राजनीतिक दल यह समझ रहे थे कि उनकी आपस की लड़ाई में फौज का पलड़ा हमेशा भारी रहता है। क्या इस बार भी एक स्थिर सरकार बनेगी? 
सवाल यह भी है कि नई सरकार के साथ भारत के रिश्ते कैसे रहेंगे? फिलहाल इसके बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि भारत या कश्मीर पाकिस्तान चुनाव के मुद्दे नहीं थे। राजनीतिक दलों के अपने घोषणापत्रों में भले ही भारत का नाम लिया गया, लेकिन यह पाकिस्तान की सियासत का हिस्सा है। फिलहाल नई सरकार का पूरा ध्यान अपनी अर्थव्यवस्था को उबारने, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों का कर्ज चुकाने, बेरोजगारी दूर करने या गरीबी उन्मूलन पर ही होगा। हिन्दुस्तान के साथ ताल्लुकात बेहतर बनाने के बारे में सोचने की उसे अभी फुरसत ही कहां? वैसे भी, भारत पर आम चुनाव का खुमार चढ़ने लगा है, और कोई भी सरकार ऐसे मौकों पर इंतजार करना ही पसंद करती है। मसलन, साल 2014 के चुनाव से पहले कमोबेश यह तय था कि पाकिस्तान हमें ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा देने जा रहा है। दस्तावेज पर बस दस्तख्त होने शेष थे। मगर पाकिस्तान ने हिन्दुस्तान में नई हुकूमत आने के बाद इस पर आगे न बढ़ने की सोची, और आज तक यह दर्जा फाइलों में ही बंद है। 
बहरहाल, नवाज शरीफ व्यक्तिगत तौर पर भारत-विरोधी नहीं हैं। मगर चूंकि वहां सत्ता की बागडोर फौज के हाथों में है, इसलिए तय उसे ही करना है, इस्लामाबाद नई दिल्ली के कितना करीब आए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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