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विभाजित विश्व और वे तीन भाई

झूठ को सच का चमकीला वरक पहनाकर अगर इतिहास जनित कुंठाओं को सहलाने का प्रयास किया जाए, तो वह अनाड़ियों और अर्द्धशिक्षितों को अवश्य आकर्षित करेगा। सोशल मीडिया पर इसीलिए ऐसे लोगों की बाढ़ आ गई है, जो...

विभाजित विश्व और वे तीन भाई
Shashi Shekhar शशि शेखरSat, 23 Dec 2023 08:38 PM
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रूस-यूक्रेन, इजरायल और फलस्तीन के बीच जारी बारूदी जद्दोजहद ने तमाम सवाल खडे़ कर दिए हैं। बरसों की खुशहाल शांति के बावजूद यह दुनिया हिंसक क्यों हो चली है? अब कोई अगला हमला या युद्ध धरती के किसी और हिस्से को लहूलुहान कर सकता है? 
जाते हुए 2023 का यह संदेश दुखद है कि संचार साधनों से सिमटी हुई दुनिया अंदर ही अंदर पूरी तरह विभाजित हो चली है। 
इसका एक उदाहरण मुझे अपने परिवार के तीन नौजवान बच्चों में देखने को मिला। पिछले दिनों वाराणसी में मेरे नजदीकी रिश्तेदार का स्वर्गवास हो गया था। उस दौरान सभी प्रमुख रिश्तेदार वहां मौजूद थे। इनमें तीन मौसेरे भाई ऐसे थे, जो पेशेवर तौर पर अपनी काबिलियत दर्ज करा चुके हैं। कायदे से उन्हें नए भारत के उन दीपों की तरह होना चाहिए, जो अपने रोशन खयालों से दुनिया का अंधेरा दूर करने की कोशिश करते हैं। वहां इसका उल्टा देखने को मिला। 
निधनोपरांत की रस्मों के बाद वे तीनों ड्रॉइंग रूम में सुस्ता रहे थे। अचानक उनमें से सबसे युवा ने सुस्ती दूर करने की गरज से इजरायल और गाजा की चर्चा छेड़ दी। मुझे उम्मीद थी कि वे एकमत से उस जहालत की आलोचना करेंगे, पर बातचीत का शुरुआती वाक्य इजरायल की प्रतिहिंसा को गरिमा प्रदान करने वाला था। उसकी मान्यता थी कि फलस्तीनियों को उनके किए की सजा मिल रही है। यह सिलसिला जारी रहना चाहिए, ताकि वे कभी न भूलने वाला सबक हासिल कर सकें। 
वहां मौजूद सबसे बडे़ नौजवान का तर्क था कि इजरायल को आत्मरक्षा का अधिकार तो है, परंतु वह निरपराध ‘सिविलियन्स’ का खून कैसे बहा सकता है? इससे तो नफरत और बढे़गी। वह यूरोप में नौकरी कर चुका है, दुनिया के कई देश घूम चुका है और अपनी कंपनी में मैनेजरी करते हुए भी आंखें खुली रखता है। उसने कहा कि कभी पोलैंड में ऑशविट्ज जाकर देखना, नस्लीय हिंसा कैसे कारनामे कराती है? वहां निरपराध यहूदियों को हिटलर की सेना ने तड़पा-तड़पाकर मारा था। अगर यहूदी जर्मनी के खिलाफ नफरत पाले रहते, तो वे आगे नहीं बढ़ पाते। उन्होंने न केवल अपने लिए एक अलग मुल्क का निर्माण किया, बल्कि जर्मनी तक से दोस्ती कर तकनीक और आगे बढ़ने के दरवाजे खोले। 
वह यहीं नहीं रुका। उसने कहा, हमें सोचना चाहिए कि हमले के लिए यही वक्त क्यों चुना गया? इसी समय इजरायल अपने धुर-विरोधी सऊदी अरब से सुलह करने जा रहा था। इससे कुछ देश खफा थे। हमला करने वालों की शक्ल और सूरत पर नजर डाल देखो। वायरल वीडियो चीख-चीखकर कहते हैं कि आतंकवादियों में से तमाम अफ्रीकी मुल्कों से आए थे। उनका भला फलस्तीन से क्या मतलब? यकीनन, यह हमला इस पनपती नई दोस्ती की जड़ों में मट्ठा डालने के लिए किया गया था। अब लंबे समय तक ये मुल्क एक-दूसरे के करीब नहीं आ पाएंगे। 
मंझला नौजवान अब तक चुप बैठा था। वह इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा हुआ है। उसने याद दिलाया कि जब-जब भारत और पाकिस्तान ने करीब आने की कोशिश की, तब इसी तरीके के हमले किए गए। कहीं न कहीं तो कुछ लोग, संस्थाएं या सरकारें ऐसी हैं, जो धरती पर एका नहीं चाहतीं, लेकिन सबसे छोटा अपने रुख पर अड़ा हुआ था। उसने चर्चा का रुख इजरायल-गाजा, भारत-पाकिस्तान, कूटनीति और सामाजिक संदर्भों से हटाकर अपने देश के इतिहास की ओर कर दिया। 
उसकी नजर में ‘वे’ लोग और ‘उनके’ रहनुमा समूची दुनिया की हर समस्या की जड़ हैं। तर्क की एक दिक्कत होती है। उसे किसी खास मकसद के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उसमें सामने वाले पर जीत की आकांक्षा पल-प्रतिपल प्रबल होती जाती है। यही वजह है कि कुछ देर बाद ‘छोटा’ कुतर्कों का सहारा लेने लगता है। इजरायल और फलस्तीन से शुरू हुई चर्चा ‘हमारे’ और ‘उनके’ बीच आकर अटक गई थी। इसी दौरान बडे़ और मंझले ने उससे पूछा कि ऐतिहासिक तथ्यों की ऐसी दुर्गति तुम क्यों कर रहे हो? कहां लिखा है यह सब? उसका मासूम जवाब था- टीवी की बहसों और वाट्सएप के जरिये मैंने यह सब पढ़ा और जाना है। अगर वे गलत हैं, तो मैं क्या करूं? 
बाकी दो नौजवान तो इस पर मुस्कराकर रह गए, मगर वहीं ऊंघता हुआ मैं चिंता में पड़ गया। पढे़-लिखे नौजवान कैसे दिग्भ्रमित हो सकते हैं, इसकी मिसाल घर में मौजूद थी। आप अपने आस-पास के वातावरण पर नजर डालें, तो पाएंगे कि ऐसे बहस-मुबाहिसे आम हो गए हैं। हवाई अड्डों पर, ट्रेन के डिब्बों में, चलती बसों की घरघराहट में, स्कूलों में और कभी-कभी घर की डाइनिंग टेबिल तक पर लोग ऐसी बातें करने लगे हैं, जो कुछ वर्ष पहले तक वर्जित थीं। 
ऐसा अकारण नहीं है। झूठ को सच का चमकीला वरक पहनाकर अगर इतिहास जनित कुंठाओं को सहलाने का प्रयास किया जाए, तो वह अनाड़ियों और अर्द्धशिक्षितों को अवश्य आकर्षित करेगा। सोशल मीडिया पर इसीलिए ऐसे लोगों की बाढ़ आ गई है, जो ‘हमारे’ और ‘उनके’ का वितंडावाद खड़ा करके अपना व्यवसाय चला रहे हैं। उन्हें सोशल मीडिया से लाखों की आमदनी होती है और एक खास तरह की पहचान भी मिलती है। सार्वजनिक स्थलों पर सहयात्री उनका एहतराम करते हैं। अगर कोई विरोध करे, तो उनके साथ चल रहे लोग वीडियो बनाकर ऐसे पेश करते हैं, जैसे सत्य के मसीहा को प्रताड़ित किया जा रहा है। घृणा ने नया बाजार विकसित कर दिया है और उसे फैलाना व्यापार बन गया है। 
इस संबंध में जो कानून बनाए गए हैं, वे भी भोथरे साबित हुए हैं। पिछले पांच सालों में भारत में नफरती बोल के सिलसिले में हजारों केस दर्ज किए गए, लेकिन सजा कितनों को मिली? यहां यह भी सवाल उठता है कि इस जुर्म की सजा कितनी है? भारतीय दंड संहिता की धारा-153ए, 153बी और 295ए के तहत घृणा फैलाने को अपराध माना गया है। आरोप प्रमाणित होने की स्थिति में अधिकतम तीन से पांच साल की कैद और जुर्माने की पेशकश है। यकीनन, यह नाकाफी है। इस मामले में दुनिया के कई मुल्कों ने विधान बनाए हैं, पर वे भी नफरत के कारोबार को रोकने में असफल रहे हैं। नतीजतन, सोशल मीडिया का प्रयोग धड़ल्ले से दंगे और हिंसा भड़काने में किया जा रहा है। 
क्या आने वाले वर्ष में हमें इस जानलेवा बला से कुछ निजात मिल सकेगी? 

@shekharkahin
@shashishekhar.journalist