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सहमे लोकतंत्र से कुछ सवाल

राजनीति यकीनन एक महंगा शगल है, इसे चलाने के लिए चंदे की जरूरत तो पड़ती ही पड़ती है। ऐसे में, यह सवाल कतई नाजायज नहीं है कि जो व्यापारी या कारोबारी घराने चुनावी चंदा देंगे, वे भला राजनीतिज्ञों से लाभ...

सहमे लोकतंत्र से कुछ सवाल
Shashi Shekhar शशि शेखरSat, 13 Apr 2024 08:26 PM
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बोस्फोरस की खाड़ी की शांत लहरों पर फिसलती-सी हमारी जहाजनुमा नौका प्रिंसेस द्वीप के मुहाने पर पहुंचने को थी कि कानों से जोशीले भाषण के बोल टकराते हैं। इस टापू की चिरंतन वीरानी में यह क्या? विस्मित भाव से हम जेटी पर उतरते हैं। सामने द्वीप के मुख्य चौक पर चुनावी सभा चल रही है।
पिछले महीने के आखीर में जब पुन: तुर्किये जाने का मौका मिला, तो इस्तांबुल के लोगों की गर्मजोशी और माहौल में पसरी सदाबहार रोमानियत याद हो आई थी। हालांकि, इस बार माहौल बदला-बदला सा था। चाहे तक्सिम स्क्वॉयर हो या प्रिंसेस द्वीप, आया सोफिया के चारों ओर बिखरी पुरातनता हो या फिर किसी मॉल की आधुनिकता- जोशीले तुर्क चुनावी बहस-मुबाहिसे में मशगूल थे। सड़कें बैनरों और तरह-तरह के साइन बोर्ड से अटी पड़ी थीं। नुक्कड़ सभाओं में जोरदार भाषण हो रहे थे और रेडियो सहित सभी संचार माध्यम चुनाव राग से तर थे। यह हाल तो मेयर के चयन हेतु होने वाले मतदान से पहले था! आम चुनाव होते तो?
हम हिन्दुस्तानी भी तो इस वक्त आम चुनाव से गुजर रहे हैं। क्या कोई उत्तेजना दिख रही है? हमारे चुनावों पर चुनाव आयोग ने यह नीरसता धन का दुरुपयोग रोकने के लिए थोपी थी? क्या धनबल का प्रकोप रुक सका?
इन सवालों का उत्तर देने से पहले मैं आपको 1960 के दशक में ले चलना चाहूंगा। यह वह समय था, जब कांग्रेस को तमाम महारथी चुनावी टक्कर दे रहे थे। राम मनोहर लोहिया उनमें से एक थे। लोहिया जानते थे कि वह सत्ताधारी पार्टी के धनबल से निपट नहीं सकते। उन्होंने इसकी काट के लिए नारा दिया, ‘एक नोट एक वोट’। उनके दल के लोग जनसभाओं में शामिल हर व्यक्ति से एक रुपये की मदद की अपील करते थे। यह प्रयोग बाद में तमाम पार्टियों ने किया। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम और अरविंद केजरीवाल भी मतदाता से जुटाए धन के जरिये सफलता हासिल कर चुके हैं।
कैसी विडंबना है, कांशीराम की उत्तराधिकारी मायावती सत्ता पाने के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गईं। उन पर आय से अधिक संपत्ति के मामले दर्ज हैं और केजरीवाल कथित शराब घोटाले के आरोप में फिलवक्त सीखचों के पीछे हैं। वे अकेले नहीं हैं। ऐसे तमाम सियासतदां हैं, जो परिवर्तन की हिमायत के साथ तमाम सदनों में दाखिल हुए और देर-सवेर उन्हें इलहाम हो गया कि जुनून, जोश और नारों के सहारे राजनीति के महंगे राजमार्ग पर लंबी दूरी नहीं नापी जा सकती।
यही वजह है कि 1970 और 80 के दशक में ही राजनीति में धन और बाहुबल का प्रकोप जोर पकड़ गया था। सत्ताधीशों को आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की संगत अधिक पसंद आने लगी थी। देखते-देखते कोई राजनीतिक दल इस रोग से अछूता न रहा। ‘माननीय’ होने के बाद आप इन्हें अपराधी नहीं कह सकते थे, इसलिए उन्हें बाहुबली कहा जाने लगा।
यह नया पनपा मुहावरा कई दास्तानें एक साथ बयां करता है।
कोई आश्चर्य नहीं कि ग्राम पंचायतों से लेकर देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा और राज्यसभा में भी ऐसे लोगों की तादाद बढ़ने लगी। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के आंकड़े बताते हैं कि देश की 17वीं लोकसभा में जहां 159 सदस्य (लगभग 29 प्रतिशत) बेहद गंभीर अपराधों से जुडे़ मामलों में आरोपी थे, तो वहीं राज्यसभा में ऐसे सदस्यों की संख्या 18 फीसदी है। एडीआर के ही जून 2023 के एक विश्लेषण में पाया गया था कि 28 राज्यों और दो केंद्रशासित क्षेत्रों के विधानमंडलों में 1,136, यानी करीब 28 प्रतिशत ऐसे ‘माननीय’ आस्तीनें चढ़ाए बैठे थे। यही हाल धनपतियों का है। एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि देश के उच्च सदन (राज्यसभा) में जहां आज 12 प्रतिशत सदस्य सौ करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति रखने वाले हैं, तो वहीं आज से पांच साल पहले चुने गए 266 लोकसभा सदस्य पांच करोड़ रुपये से अधिक संपत्ति के मालिक थे। बताने की जरूरत नहीं, आज भी हमारे देश में प्रति व्यक्ति रोजाना आय 464 रुपये पर अटकी हुई है।
मतलब साफ है, आम हिन्दुस्तानी की भूमिका महज एक मतदाता तक सीमित होकर रह गई है। इनमें से बहुतों को जाति, धर्म, क्षेत्र, संप्रदाय के साथ धन का प्रलोभन किसी प्रत्याशी विशेष के लिए संजीवनी का काम करता है। यह अकारण नहीं है कि पिछले एक दशक में चुनाव आयोग द्वारा जब्त किए गए धन और शराब के आंकड़ों में खासी बढ़ोतरी हुई। साल 2009 के आम चुनाव में निर्वाचन आयोग ने जहां 190 करोड़ रुपये जब्त किए थे, तो 2019 में यह जब्ती 841 करोड़ से भी अधिक की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई। इसी तरह, 2014 में जहां एक करोड़ 60 लाख लीटर शराब बरामद की गई थी, तो 2019 में एक करोड़ 86 लाख लीटर जब्त की गई।
यही नहीं, अपने मुल्क में जहां हर कुछ महीने पर कोई न कोई चुनाव होता हो, वहां राजनेताओं और पार्टियों को तमाम तरह से धन खर्च करने की जरूरत पड़ती है। एक वरिष्ठ नेता ने मुझे बताया था कि हमें चुनाव के दौरान प्रति ब्लॉक कम से कम दो गाड़ियों और उनके जरिये प्रचार करने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पड़ती है। लोकसभा के एक चुनाव में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से पचास के आसपास गाड़ियां कम से कम लगानी पड़ती हैं। इसके अतिरिक्त हर ब्लॉक में एक दफ्तर चलता है, जहां कार्यकर्ताओं के विश्राम और भोजन की व्यवस्था करनी होती है। चुनाव के पहले वाली रात तो गांव-दर-गांव लोगों को ‘खिलाने-पिलाने’ में लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं। अपनी अथवा किसी बडे़ नेता की चुनावी सभा में भी लाखों रुपये खर्च होते हैं।
एक अन्य ‘माननीय’ ने बताया कि पहले तो सिर्फ परचे, बैनर और पोस्टर के जरिये काम हो जाता था। अब पोस्टर और बैनर पर रोक लग गई है, मगर सोशल मीडिया पर पूरे पांच साल तमाम लोगों को सक्रिय रखना पड़ता है। वे न केवल हमारा गुणगान करते हैं, बल्कि विपक्षियों पर भी हमला बोलते रहते हैं। इस सब में चुनाव के लिए खर्च की तय राशि से काम नहीं चलता। राजनीति यकीनन एक महंगा शगल है, इसे चलाने के लिए चंदे की जरूरत तो पड़ती ही पड़ती है।
ऐसे में, यह सवाल कतई नाजायज नहीं है कि जो व्यापारी या कारोबारी घराने चुनावी चंदा देंगे, वे भला राजनीतिज्ञों से लाभ की उम्मीद क्यों नहीं करेंगे? संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस यक्ष-प्रश्न के आगे सहमा-सा क्यों नजर आता है? 

@shekharkahin
@shashishekhar.journalist