फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियन आजकलकाशी में मोदी पर पूर्वांचल में लड़ाई

काशी में मोदी पर पूर्वांचल में लड़ाई

पूर्वांचल में काशी को छोड़कर हर सीट पर कड़ा संघर्ष है। कहीं बाहुबल का दबदबा, कहीं विरासत, तो कहीं मंत्री पद का रुतबा कसौटी पर कसा जा रहा है। 4 जून का फैसला सिर्फ जय-पराजय नहीं, बल्कि नया सियासी चलन भी..

काशी में मोदी पर पूर्वांचल में लड़ाई
Shashi Shekhar शशि शेखरSat, 25 May 2024 07:31 PM
ऐप पर पढ़ें

ये पंक्तियां काशी से। पिछले दस साल से यह देश के प्रधानमंत्री की निर्वाचन भूमि रही है। इस नाते देश-दुनिया की निगाहें इस सरजमीं पर आ टिकी हैं। 
प्रधानमंत्री ने यहां के लोगों से दिली अपनापा बनाया है, लिहाजा उन्हें कोई खास चुनौती नहीं दिखाई पड़ती। बीएलडब्ल्यू, यानी बनारस लोकोमोटिव वर्क्स (पूर्व में डीएलडब्ल्यू) के सामने खोखा लगाने वाले रिंकू के बयान से इसकी झलक मिलती है। जब प्रधानमंत्री यहां आते हैं और जितने समय तक रहते हैं, उतने वक्त के लिए रिंकू को अपना खोखा हटाना पड़ता है। उन सहित दर्जनों लोगों के लिए यह व्यावसायिक हानि का मामला है, पर वे क्षुब्ध नहीं हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री के लिए इतना तो होना ही चाहिए। 
‘मोदी भक्ति’ में काफी कुछ न्योछावर करने के लिए तत्पर लोगों में वे अकेले नहीं हैं। गुजरे मंगलवार को मोदी संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में चुनिंदा महिलाओं से मिले थे। उसी दौरान मुझे अचानक शिवदासपुर में कुछ महिलाएं मिलीं। पुलिस के घेरे के पीछे वे मायूस खड़ी थीं। कौतूहलवश मैंने उनसे पूछा कि आप लोग इतनी बड़ी संख्या में ऐसे क्यों खड़ी हैं? उनका जवाब था कि हम मोदी जी से मिलने के लिए जाना चाहते थे, परंतु कुछ देर हो गई और सुरक्षा व्यवस्था लागू हो गई। अब जा तो नहीं सकते, लेकिन वह इस रास्ते से निकलेंगे, इसलिए उनके इंतजार में रुके हुए हैं। उस वक्त तापमान 40 डिग्री से अधिक था और हवा में जानलेवा तपिश थी। मैंने उनसे पूछा कि अभी प्रधानमंत्री को आने में काफी समय लग सकता है, आप तब तक यूं ही खड़ी रहेंगी! जवाब मिला- कोई बात नहीं, अब घर से निकले हैं, तो सोचा कि हाथ हिलाकर उनका अभिवादन ही कर लें।  
हालांकि, करौंदी जैसे मोहल्लों में, जहां अतिक्रमण की वजह से लोगों के घर तोडे़ गए हैं, कुछ लोग कुपित भी हैं। मगर इससे बड़े नुकसान की आशंका नहीं है। उनके आवास सड़क चौड़ीकरण के लिए हटाए गए थे, जिससे बड़ी तादाद में राहगीरों को लाभ मिलता है। नई दिल्ली की सरकार ने तरह-तरह के लाभार्थियों की नई फौज खड़ी की है। 
कांग्रेस के अजय राय नरेंद्र मोदी के मुकाबिल हैं। वह पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पुरानी सियासी शख्सियत हैं। उनकी कोशिश है कि वह जीत के अंतर को अधिक से अधिक पाट सकें। उधर, भाजपा के कार्यकर्ता चाहते हैं कि प्रधानमंत्री बढ़त की हैट्रिक लगाएं। मोदी ने 2019 के चुनाव में 2014 से ज्यादा वोट हासिल किए थे।
बनारस ऐसा शहर है, जहां वामपंथी, समाजवादी, राष्ट्रवादी, जातिवादी और संप्रदायवादी चाय या पान की दुकान पर एक-दूसरे की बात काटते नजर आते हैं। ये लोग हार और जीत के अंकगणित से परे हमेशा प्रतिरोध का रसायन रचने में मशगूल रहते हैं। अगस्तकुंडा के चक्रवर्ती मोशाय इन सियासी तुर्कों पर बनारसी पिंगल बोलते हैं, इनके चक्कर में मत पड़ना। ये लोग कहें कुछ भी, पर अंत में मोदी को ही वोट दे आते हैं। 
कौन कितने मत हासिल करेगा, इसके विमर्श में मैं चाहकर भी अन्य प्रत्याशियों के नाम नहीं ले पा रहा हूं। बहुजन  समाज पार्टी ने अतहर जमाल लारी को खड़ा जरूर किया है, पर वह चर्चा के केंद्र में नहीं आ सके हैं। 
काशी का अपना रंग-ढंग जो हो, मगर आसपास की शेष 11 सीटों पर रोमांच के तमाम रंगों का साया है। कभी बनारस का ही हिस्सा रहे चंदौली से डॉक्टर महेंद्रनाथ पांडेय चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने लंबा समय महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के निर्वाह में बिताया है। उनकी गिनती गंभीर नेताओं में होती है। इस बार उन्हें ‘इंडिया’ ब्लॉक से पूर्व मंत्री वीरेंद्र सिंह चुनौती दे रहे हैं। वह समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर लड़ रहे हैं। 
चंदौली और वाराणसी से सटी हुई सीट है मिर्जापुर। यहां से मोदी कैबिनेट की एक और सदस्य अनुप्रिया पटेल किस्मत आजमा रही हैं। अनुप्रिया अपना दल के संस्थापक सोनेलाल पटेल की पुत्री हैं और केंद्र में मंत्री हैं। वह अपना दल (एस) की अध्यक्ष हैं और एनडीए की सदस्य भी। अनुप्रिया को इंडिया गठबंधन की ओर से रमेश बिंद चुनौती दे रहे हैं। 
पड़ोसी रॉबर्ट्सगंज से अपना दल की रिंकी कोल और भाजपा के पूर्व सांसद छोटेलाल खरवार समाजवादी पार्टी के टिकट पर मैदान में हैं। रिहंद, अनपरा और बीना जैसी महाकाय परियोजनाओं के बावजूद यहां के आदिवासी आज भी विकास की राह जोह रहे हैं। प्रधानमंत्री की ‘हर घर जल’जैसी योजनाओं का उन्हें लाभ मिला है, पर अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। कभी विस्तार से उन पर लिखूंगा, फिलहाल चुनावी राजनीति पर लौटते हैं।
अनुप्रिया की तरह भदोही में तृणमूल प्रत्याशी ललितेश पति त्रिपाठी और बलिया में नीरज शेखर अपनी विरासत को बचाने के लिए संघर्षरत हैं। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज फिलहाल राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे पहले भी वह दो बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा की चौहद्दी में दाखिल हो चुके हैं। नीरज को समाजवादी पार्टी के सनातन पांडेय से चुनौती मिल रही है। इस सीट पर ब्राह्मणों और राजपूतों के बीच पुरानी खींचतान है। 
समीपस्थ गाजीपुर में मौजूदा सांसद अफजाल अंसारी ताल ठोक रहे हैं। उनके छोटे भाई मुख्तार अंसारी की जेल में विवादास्पद स्थितियों में हुई मौत के बाद उनके समर्थकों को लगता है कि उन्हें सहानुभूति का लाभ मिलने जा रहा है। अफजाल एक आपराधिक मामले में पहले ही सांसदी गंवा चुके हैं। इसी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला अगर उनके खिलाफ गया, तो उनकी उम्मीदवारी स्वत: निरस्त हो जाएगी। एहतियातन उन्होंने अपनी बेटी नुसरत को बतौर निर्दलीय मैदान में उतार रखा है। अगर चुनाव पूर्व उनकी उम्मीदवारी रद्द हो जाती है, तो क्या वह आनन-फानन में अपने सारे मत नुसरत को स्थानांतरित करा पाएंगे? अफजाल को भारतीय जनता पार्टी के पारसनाथ राय से पुरजोर टक्कर मिल रही है। 
आप जब इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं, तब तक आजमगढ़, लालगंज, जौनपुर, मछलीशहर और भदोही का जनादेश ईवीएम में कैद हो चुका है। यहां भी लड़ाई रोचक रही है।  
जौनपुर में बहुजन समाज पार्टी ने शुरू में बाहुबली धनंजय सिंह की पत्नी श्रीकला रेड्डी को उतारा था। कहते हैं कि अचानक धनंजय सिंह और नई दिल्ली के सत्ता-सदन के बीच कुछ चर्चाएं शुरू हो गईं। इससे क्षुब्ध मायावती ने श्रीकला की जगह मौजूदा सांसद श्याम सिंह यादव को दोबारा टिकट दे दिया। हालांकि, यहां मुख्य लड़ाई इंडिया गठबंधन के बाबू सिंह कुशवाहा और भाजपा के कृपाशंकर सिंह के बीच है। यहां किसी दल से ज्यादा धनंजय के प्रभाव की परीक्षा है। आजमगढ़ में धर्मेंद्र यादव ने भी ‘नेताजी’ की विरासत को कायम रखने की पुरजोर कोशिश की है। उन्हें भोजपुरी फिल्मों के सितारे और वर्तमान सांसद निरहुआ से पार पाना है। 
मतलब साफ है, पूर्वांचल में काशी को छोड़कर हर सीट पर कड़ा संघर्ष है। कहीं बाहुबल का दबदबा, कहीं विरासत, तो कहीं मंत्री पद का रुतबा कसौटी पर कसा जा रहा है। आगामी 4 जून का फैसला सिर्फ जय-पराजय नहीं, बल्कि नया सियासी चलन भी गढ़ने जा रहा है।  

@shashishekharkahin

@shashishekhar.journalist

 

Advertisement