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मोदी की तीसरी पारी और कुछ प्रश्न 

हालात में एक बुनियादी फर्क है। नरेंद्र मोदी पिछली दो पारियों की तरह इस बार बहुमत संपन्न भारतीय जनता पार्टी नहीं, बल्कि लोकसभा में सर्वाधिक सीट पाने वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मुखिया हैं...

मोदी की तीसरी पारी और कुछ प्रश्न 
शशि शेखर शशि शेखरSat, 08 Jun 2024 08:30 PM
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नरेंद्र मोदी की ताजपोशी में अब सिर्फ शपथ की औपचारिकता शेष है। वह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लगातार तीन बार चुने जानेके उस कीर्तिमान की बराबरी में कामयाब हो गए हैं, जिस तक कोई अन्य सत्तानायक नहीं पहुंच सका। हालांकि, हालात में एक बुनियादी फर्क भी है। मोदी पिछली दो पारियों की तरह इस बार बहुमत संपन्न भारतीय जनता पार्टी नहीं, बल्कि लोकसभा में सर्वाधिक सीट पाने वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के मुखिया हैं। क्या यह अंतर उनकी कार्यशैली और भावी योजनाओं की राह में रोड़े का काम करेगा?
देश इस यक्ष प्रश्न से आंदोलित है।
इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पूर्व उनके नए बने दोस्तों के बयानों पर गौर करना होगा। महज कुछ सप्ताह पूर्व तेलुगुदेशम पार्टी का घोषणा-पत्र जारी करते हुए चंद्रबाबू नायडू ने कहा था- ‘हम मुस्लिमों को चार प्रतिशत आरक्षण देंगे और सूबे की प्रत्येक मस्जिद को रख-रखाव के लिए हर माह पांच हजार रुपये दिए जाएंगे।’ इसके बरक्स आप प्रधानमंत्री के मुस्लिम आरक्षण और तुष्टीकरण संबंधी वक्तव्यों को याद कर देखिए। आपको जबरदस्त विरोधाभास नजर आएगा। टीडीपी भाजपा के समान नागरिक संहिता संबंधी संकल्प का भी विरोध करती आई है।
यही नहीं, टीडीपी ने आंध्र की महिलाओं को प्रतिमाह डेढ़ हजार रुपये का भत्ता, नि:शुल्क बस यात्रा और बेरोजगारों को तीन हजार रुपये प्रतिमाह की राशि देने का वचन भी दिया है। इन संकल्पों को परवान चढ़ाने के लिए बहुत बड़ी रकम की आवश्यकता होगी। आंध्र की सरकार अपने बलबूते इतना धन जुटाने की हैसियत नहीं रखती।
भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक, आंध्र उन सूबों में शुमार है, जिन पर सर्वाधिक कर्ज है। इसके बावजूद चंद्रबाबू राजधानी अमरावती को बिल्कुल नया रूप देना चाहते हैं। इसके लिए साढ़े तीन लाख करोड़ की दरकार अलग से है। नरेंद्र मोदी के पहले सत्ता-काल में चंद्रबाबू नायडू की ऐसी मांगों के चलते ही केंद्र से खटपट हुई थी। आज जब तेलुगुदेशम पार्टी अपने 16 सांसदों के साथ राजग की सबसे बड़ी सहभागी है, तब हमें चंद्रबाबू की शख्सियत के एक और पहलू पर ध्यान देना चाहिए। वह बेहिसाब सियासी मोल-तोल के अभ्यस्त रहे हैं।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का दूसरा बड़ा साझीदार है- जनता दल (यू)। नीतीश कुमार पिछले दस सालों में दो बार राजग को धता बता चुके हैं। वर्ष 2013 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी का खुला विरोध किया था। वह चंद्रबाबू नायडू की तरह अपने प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलवाना चाहते हैं। इसके अलावा समान नागरिक संहिता और अग्निवीर जैसे मुद्दों पर उनकी राय भारतीय जनता पार्टी के घोषित रुख से अलग है। राजग के अन्य दल भी अपने-अपने वायदों से बंधे हुए हैं। उनके और भाजपा के बीच हर मुद्दे पर सहमति हो, यह कतई जरूरी नहीं।
इनमें से लगभग सभी कभी न कभी ‘इंडिया’ ब्लॉक के पुराने स्वरूप, यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का हिस्सा रहे हैं। उनके निर्णय राजनीतिक मौसम पर निर्भर रहते हैं। यहां एक और तथ्य गौरतलब है कि नीतीश कुमार की पार्टी से रह-रहकर उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वाधिक योग्य उम्मीदवार बताया जाता रहा। वह अपनी पार्टी के इकलौते नियामक हैं और जब चाहें, तब इस तरह की बयानबाजी पर लगाम लगा सकते हैं। उन्होंने शायद अभी तक इस सिलसिले में कोई सख्त संदेश अपने पार्टीजन को नहीं दिया है।
आप इसे कैसा शगुन मानते हैं?
इन क्षेत्रीय नेताओं की वचनबद्धताओं की याद दिलाकर सूबाई विपक्ष ने अभी से उन्हें घेरने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। मसलन, तेजस्वी यादव ने कुछ दिन पूर्व तंजिया अंदाज में बयान दिया- ‘चाचा किंग मेकर की भूमिका में हैं, तो अब विशेष राज्य का दर्जा दिलवाएं। देश भर में जातीय जनगणना करवाएं।’ जाहिर है, नायडू हों या नीतीश, चिराग हों या पवार, शिंदे हों या  चौधरी, सबके अपने क्षेत्रीय और जातीय आग्रह हैं। वे उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते। इसके लिए सभी घटक दल मंत्रिपरिषद में अधिक से अधिक पद और महत्वपूर्ण विभाग पाने की हाड़तोड़ कोशिश करेंगे।
ऐसे मेें, भाजपा को अपने लोगों की कीमत पर बड़ा दिल दिखाने को मजबूर होना पड़ सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी के वक्त में लोकसभा का अध्यक्ष पद तेलुगुदेशम के पास हुआ करता था। संकट और बिखराव के लम्हों में अध्यक्ष का महत्व बहुत बढ़ जाता है। कहीं नायडू अंदरखाने वही मांग दोहरा तो नहीं रहे? वाजपेयी को अपने वक्त में ऐसी तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। उन्हें केंद्र में अपना नेता स्वीकार करने वाली ममता बनर्जी, मायावती और जयललिता अनोखी मांगें और अबूझ चेतावनियां जारी किया करती थीं? नई दिल्ली के गलियारों में उन्हें ‘तीन देवियों’ के विशेषण से नवाजा जाता था। ऐसी देवियां, जो अपने वरदान से बड़ा प्रतिदान चाहती थीं। यह अटल जी पर चस्पां नियति का क्रूर व्यंग्य था। 
मोदी और वाजपेयी के बीच यकीनन बहुत फर्क है, पर यह सवाल पुरगरम है कि मोदी इस ‘मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना’ की स्थिति से कैसे निपटेंगे?
जवाब बहुत मुश्किल नहीं है। आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अतीत पर नजर डाल देखिए। वह अपनी मेहनत से फर्श से अर्श पर पहुंचे हैं। वर्ष 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और फिर पार्टी की तरह-तरह से खिदमत की। वह सफल महासचिव के साथ हरियाणा एवं मध्य प्रदेश में कामयाब संगठन मंत्री, चुनाव प्रभारी की भूमिका निभा चुके हैं। इन दोनों राज्यों के बाद गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के पैर जमाने में उनकी जबरदस्त भूमिका रही है।
सियासत की समझ रखने वाले सरकार और संगठन का मूलभूत अंतर समझते हैं। जब कोई सरकार में होता है, तो सत्ता का दंड उसके हाथ में होता है। संगठन में हुकूमत की ताकत के बिना लोगों को जोड़ना होता है। मोदी ने दोनों काम बखूबी किए हैं। वह संगठन से सत्ता में आए, इसीलिए पिछले 23 सालों से सिर्फ सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे थे। इस बार उनकी पार्टी जरूर लड़खड़ाई है, पर इसे प्रधानमंत्री की निजी लड़खड़ाहट मान लेना जल्दबाजी होगी।
उनकी एक और विशेषता उन्हें पहले के प्रधानमंत्रियों से अलग करती है। दस साल तक प्रधानमंत्री की कुरसी संभालने से पूर्व लगातार तेरह वर्षों तक वह गुजरात के कामयाब मुख्यमंत्री रहे हैं। इस दौरान उनकी पार्टी केंद्र की सत्ता में रही, तो उसे और उसके सांसदों को विपक्ष की बेंचों पर भी बैठना पड़ा। मोदी ने दोनों ही हालात में गुजरात की बेहतरीन खिदमत की थी। वह तनी हुई रस्सी पर देर तक और दूर तक चलने की कला जानते हैं।
इसकी एक झलक शुक्रवार को संसद के सेंट्रल हॉल में मिली। गठबंधन धर्म और अपनी तीसरी पारी के एजेंडे को उन्होंने जैसे रूपायित किया, सहयोगियों ने उसको वैसे ही ग्रहण किया। वातावरण में उनके प्रति उमड़ती गर्मजोशी की गमक साफ तौर पर महसूस की जा सकती थी।
पुरानी भारतीय परंपरा है कि हम किसी अपरिचित तक को नई पारी अथवा काम के लिए शुभकामना देते आए हैं। नरेंद्र मोदी और राजग के सभी घटकों को दिल से बधाई। आशा है कि वे उन करोड़ों मतदाताओं का मान रखेंगे, जिन्होंने उन्हें बड़ी उम्मीदों के साथ चुना है।

@shekharkahin

@shashishekhar.journalist