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इंदिरा की शहादत से उपजे सबक

 भारत की एकता, अखंडता और अविरल आगे बढ़ने की आकांक्षा का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है? गुजरे 38 वर्षों की अनेक अन्य उपलब्धियां हैं, जिन पर हम गर्व कर सकते हैं, पर ये तीन सबक हमें सतत सतर्कता...

इंदिरा की शहादत से उपजे सबक
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कल अक्तूबर महीने की अंतिम तारीख है और देश की तीसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 38वीं बरसी भी। हर हादसा महज गहरा घाव पीछे नहीं छोड़ जाता, बल्कि कुछ सबक भी सिखा जाता है। इस जघन्य कांड के तीन प्रमुख सबक क्या हैं? 

इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए आपको 38 साल पीछे लौटना होगा। इंदिरा गांधी की हत्या उनके आवास पर उन्हीं के सुरक्षाकर्मियों द्वारा कर दी गई थी। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बाद से खुफिया ब्यूरो (आईबी) और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग (रॉ) को लगातार इनपुट मिल रहे थे कि सीमा पार से आईएसआई के आला अधिकारी इंदिरा गांधी को रास्ते से हटाने की साजिशें रच रहे हैं। यही वजह थी कि प्रधानमंत्री के आवास और कार्यालय की किलेबंदी में दिल्ली पुलिस के साथ केंद्रीय बलों के जवानों को तैनात कर दिया गया था। प्रधानमंत्री की इस सुरक्षा-व्यवस्था की नियमित समीक्षा होती और खुफिया एजेंसियों के अधिकारी भी इनमें हिस्सा लेते।

उन्हीं दिनों ‘रॉ’ को जानकारी मिली कि सुरक्षा चक्र के अंदरूनी घेरे में तैनात दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर बेअंत सिंह ने कुछ दिनों पहले अमृत छका है और उसकी मुलाकातें संदिग्ध लोगों से हो रही हैं। जीते जी किंवदंती बन चुके ‘रॉ’ के आर एन काव उन दिनों इंदिरा गांधी के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार हुआ करते थे। बांग्लादेश के स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत के पूर्व ही काव ने इंदिरा गांधी को वहां पनप रहे असंतोष की सटीक जानकारी दे दी थी। वह न केवल मुक्तिवाहिनी के वास्तुकारों में एक थे, बल्कि सैन्य रणनीति के निर्धारण में भी उनका खासा दखल था। 1971 की उस जंग में भारत की ऐतिहासिक विजय ने 1962 में चीन युद्ध के आघात से उबरने का मौका मुहैया कराया था। हमारा राष्ट्रीय गौरव नए शिखर पर प्रतिष्ठापित हो रहा था। यही वजह है कि प्रधानमंत्री उन पर काफी भरोसा करती थीं। काव ने बेअंत के संदेहास्पद होने की ताकीद की थी। इसी आधार पर उसका तबादला दिल्ली पुलिस की सशस्त्र इकाई में कर दिया गया था। कहते हैं कि इंदिरा गांधी उसे बेहद पसंद करती थीं और ‘सरदार जी’ कहकर पुकारती थीं। उनकी दखल पर वह कुछ दिनों में वापस लौट आया। 31 अक्तूबर की उस काली सुबह प्रधानमंत्री पर सबसे पहले उसी ने गोली चलाई। केहर और सतवंत सिंह ने उसका साथ दिया। कुछ देर बाद बेअंत को ‘रहस्यमय’ कारणों से गोली मार दी गई। प्रधानमंत्री की हत्या के षड्यंत्र का वही मुख्य मोहरा था। उसका बयान कई तथ्यों को उजागर कर सकता था।

इस सनसनीखेज हत्याकांड से सबक लेकर राजीव गांधी सरकार ने  प्रधानमंत्री और उनके परिजनों की सुरक्षा के लिए अलग विशेषाधिकार प्राप्त एजेंसी की स्थापना की। उसका नाम- ‘स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप’ यानी एसपीजी रखा गया। एसपीजी आज तक प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। नियमों के अनुसार, खुद प्रधानमंत्री अपने सुरक्षाकर्मियों और कार्यकारी चिकित्सक के बिना आवास नहीं छोड़ सकते। यह सुखद है कि कुछ चूकों को छोड़ दें, तो इस एजेंसी के गठन से आज तक किसी भारतीय प्रधानमंत्री के नजदीक कोई हमलावर नहीं पहुंच सका है। भविष्य में ऐसा कभी न हो, इसके लिए एसपीजी का तंत्र छोटी-मोटी भूलों का भी संज्ञान ले अपनी व्यवस्था को दुरुस्त करता चलता है। लगभग सभी राज्यों ने आगे चलकर इसी तर्ज पर अति-विशिष्ट लोगों के लिए सफल सुरक्षा प्रोटोकॉल तैयार किए।
उस हादसे से उपजा यह पहला सबक था। अति-विशिष्ट लोग इससे महफूज तो हुए, पर आम आदमी से उनकी दूरी बढ़ती चली गई। आज देश में सुरक्षा पाना जरूरत से ज्यादा रुतबे का प्रतीक बन गया है। लोकतंत्र के लिए यह शुभ शगुन नहीं है। कहते हैं न, हर बुराई में कोई अच्छाई और हर अच्छाई में कोई बुराई छिपी होती है। यह कहावत इस मामले में पूरी तरह चरितार्थ होती है।
अब दूसरी सीख पर आते हैं। 

इंदिरा गांधी पर हमले की खबर फैलते ही लोगों में गम और गुस्से के साथ चिंता व्याप्त हो गई थी। उनका सियासी-सामाजिक कद इतना बड़ा था कि कोई अन्य राजनेता उनके आस-पास नहीं ठहरता था। राजीव गांधी को सियासत में आए तब तक पांच साल भी पूरे नहीं हुए थे। लोग उन्हें विनम्र और ऊर्जावान मानते थे, पर वह इंदिरा गांधी की जगह ले सकते हैं, इसे स्वीकारने को कोई राजी न था। कांग्रेस ने 1980 के आम चुनाव में 353 सीट जीतकर शानदार बहुमत हासिल किया था और उसके पास प्रणब मुखर्जी, नरसिंह राव, नारायण दत्त तिवारी जैसे दिग्गज थे। जनता की नजर में उनमें से एक भी इंदिरा गांधी की पासंग भर न था। ऐसे में, राजीव के राज्यारोहण की खबर फैलते ही यह सवाल भी आकार लेने लगा कि वह अपनी मां की रिक्ति को कैसे भरेंगे?
इस सवाल का जवाब आने वाले वर्षों ने बखूबी दिया। राजीव और उनके बाद शपथ ग्रहण करने वाले सभी प्रधानमंत्रियों ने अच्छा-बुरा जो किया, पर जम्हूरियत की मशाल को बुझने नहीं दिया, जबकि पड़ोसी देश उस दौरान भी आज-सी लड़खड़ाहट के शिकार थे। आज नरेंद्र मोदी दिल्ली के सत्तानायक हैं। पार्टी, सरकार और देश के आमजन पर उनकी जैसी पकड़ है, उसकी तुलना अक्सर इंदिरा गांधी से की जाती है। यहां याद दिलाना चाहूंगा कि इंदिरा गांधी द्वारा थोपे गए आपातकाल में नरेंद्र मोदी को भी परेशानी का सामना करना पड़ा था। वह दो बार से देश के प्रधानमंत्री हैं। इससे साबित होता है कि भारत जब भी रिक्ति महसूस करता है, तो जोशीले भारतीय तत्काल उसे भर भी देते हैं। 

यहां से तीसरे सबक की ओर बढ़ते हैं। इंदिरा गांधी भारत के विभाजक तत्वों से लड़ते हुए शहीद हुई थीं। उस समय पंजाब में आग लगी हुई थी, कश्मीर से चिनगारियां रह-रहकर फूट उठती थीं। उत्तर-पूर्व में भी अलगाव के अलाव सुलग रहे थे। आज पंजाब देश के शांत और संपन्न सूबों में गिना         जाता है। उत्तर-पूर्व की अशांति अतीत की बात बन चुकी है। तमाम घात-प्रतिघात के बावजूद कश्मीर हिन्दुस्तान का मुकुट बना हुआ है। 

मोदी सरकार ने तीन साल पहले न केवल विवादास्पद अनुच्छेद 370 खत्म किया, बल्कि सूबे को बेहतर प्रशासन के लिए दो हिस्सों में बांट केंद्र शासित क्षेत्र में तब्दील कर दिया। आशंकाओं के सौदागर उस वक्त जो भी दावे कर रहे हों, पर सच यह है कि कश्मीर में पर्यटकों की आमद के नए कीर्तिमान कायम हो रहे हैं। भारत की एकता, अखंडता और अविरल आगे बढ़ने की आकांक्षा का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है?
गुजरे 38 वर्षों की अनेक अन्य उपलब्धियां हैं, जिन पर हम गर्व कर सकते हैं, पर ये तीन सबक हमें सतत सतर्कता के साथ समय के अनुरूप बदलने की प्रेरणा देते हें। हमें इन्हें हरदम याद रखना चाहिए। 

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