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11 दिसंबर, 2020|2:44|IST

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महामारी के नए मोड़ पर हम

यह लेख लिखते समय मन उदासी से भरा हुआ है। दो दिन पहले ही ‘हिन्दुस्तान’में मेरे वरिष्ठ सहयोगी रह चुके राजीव कटारा नहीं रहे। वह कोरोना की तीसरी लहर के शिकार हो गए। महीनों पहले ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को कहते सुना था कि यह एक ऐसी महामारी है, जो हमसे हमारे तमाम अपनों को छीन सकती है, लेकिन ऐसी चेतावनियां तब तक पूरी तरह असर नहीं करतीं, जब तक हमारी चमड़ी में उनका डंक न प्रविष्ट कर जाए।

अब तक समूची दुनिया में 14 लाख से अधिक लोग इसका शिकार हो चुके हैं और लगभग छह करोड़ संक्रमित पाए गए हैं। खुद हमारे अपने देश में कोरोना से संक्रमित लोगों का आंकड़ा एक करोड़ की भयावह गिनती क्रॉस करने वाला है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सर्दी गहराने के साथ कोरोना की तीसरी लहर की मारक क्षमता बढ़ती जा रही है। अस्पतालों के बिस्तर भरते जा रहे हैं और एक बार फिर चिकित्सा का संकट विकराल हो रहा है। दिक्कत अकेले कोरोना के मारों की नहीं है। पहले से अन्य रोगों से जूझ रहे लोगों को भी इसका शिकार बनना पड़ रहा है। आवश्यक सर्जरी रुकी पड़ी हैं, आउटडोर पर डॉक्टर देखने से कतरा रहे हैं और मधुमेह या रक्तचाप जैसी बीमारियां तक जानलेवा साबित हो रही हैं। कोरोना पीड़ितों का तो तब भी रिकॉर्ड सहेजा जाता है, पर इन बीमारियों से मरने वालों का कोई पुरसाहाल नहीं। सच यह है कि आपदा से अघियाए इन दिनों में जितने कोरोना से मरे, उससे कहीं ज्यादा इंसानों को अन्य व्याधियां लील गईं। हतभागिता का यह हठधर्मी सिलसिला जारी है।

हम हिन्दुस्तानी आम तौर पर ऐसे में सारा ठीकरा सरकार के सिर फोड़ बैठे रहते हैं, मगर सरकारों के हाथ में भी कोई जादू की छड़ी तो नहीं। केंद्र की हुकूमत हो या सूबाई सत्ताएं, सबने मिलकर, जो हो सका, किया। उत्तर प्रदेश का उदाहरण देता हूं। मार्च 2020 में कोरोना की जांच के लिए पूरे प्रदेश में सिर्फ एक प्रयोगशाला थी। उन दिनों इस रोग के इलाज के लिए अस्पताल तक उपलब्ध न थे। आनन-फानन में वेंटीलेटर्स, बिस्तर और संबंधित दवाओं की आपूर्ति की गई। डॉक्टरों के साथ पैरा-मेडिकल स्टाफ को प्रशिक्षित किया गया। यही वजह है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन तक ने उत्तर प्रदेश सरकार की सराहना की है। अन्य प्रदेश भी भरसक ऐसा ही करने की कोशिश कर रहे थे, फिर भी इतनी बड़ी आबादी में दिन-रात पैर पसारती महामारी से निपटना आसान नहीं है। सरकारों को  राजस्व की व्यवस्था भी करनी है, ताकि लोगों का पेट भरा जा सके। यही वजह है कि कहीं न कहीं कुछ चूक रह जाती है।

संकट के ऐसे विरल वक्त में सरकारों के साथ समाज का सामंजस्य बहुत जरूरी है। यदि इन दोनों में से एक भी शिथिल पड़ता है अथवा एहतियात का पालन नहीं करता, तो अनर्थ हो जाता है। ऐसे तमाम उदाहरण हमारे बीच मौजूद हैं, जब असावधानी दर्जनों लोगों पर मुसीबत की मार का कारण बनी। मतलब साफ है। इस महामारी से जूझने के लिए हमें खुद को बदलना होगा, पर क्या ऐसा हो रहा है? तीज-त्योहार, शादी-ब्याह और सामाजिक रस्म-ओ-रिवाज में अक्सर बचाव के तौर-तरीकों को दरकिनार कर दिया जाता है। नतीजा सामने है। अक्तूबर के महीने में जहां कोरोना के आंकड़ों में शिथिलता दिख रही थी, वहीं नवंबर के आखिरी हफ्ते तक इसका कहर और बेगवान होकर लौट आया है।

यह ठीक है कि फिजां में इस महामारी से लड़ने की वैक्सीन आने की आहटें सुनाई पड़ रही हैं और उम्मीद है कि अगले साल की शुरुआत में यह लोगों तक पहुंचनी शुरू हो जाएगी, पर टीकों से ही सब कुछ सुधर जाएगा, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। कोरोना इंसानों की जीवन-शैली पर लंबा प्रभाव डालने जा रहा है। अगर यह दौर छह महीने और लंबा खिंचा, तो जान लीजिए कि बडे़ दफ्तरों के दिन लद जाएंगे। लोग घरों अथवा भाडे़ के एक्सक्लूसिव दफ्तरों से काम चलाते नजर आएंगे। यदि ऐसा होता है, तो इसका समाज पर दूरगामी प्रभाव पडे़गा। दफ्तर सिर्फ कामकाज की जगह नहीं हुआ करते, वहां हमारा अपने सहकर्मियों से मेल-मिलाप होता है और इसके जरिए एक सामूहिक ऊर्जा का संचरण भी होता है। अब टीमवर्क भौतिक के बजाय वायवीय हुआ करेगा और इसकी वजह से लोगों के आचार-व्यवहार में परिवर्तन आना बेहद जरूरी है।

यही वजह है कि मानसिक व नई तरह के शारीरिक रोगों का प्रसार होना शुरू हो चुका है। पिछले दिनों मेरे एक सहयोगी की नन्ही बेटी की आंखों में दिक्कत होनी शुरू हो गई। वह उसे डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने बताया कि स्कूल न जाने से दूर तक देखने की उसकी क्षमता प्रभावित हो रही है। यदि यह सिलसिला लंबा चला, तो और तमाम बीमारियां हमारे दरवाजों पर दस्तक देती नजर आएंगी।

इस दिक्कत भरे दौर में छोटे कस्बे और गांव उम्मीद की किरण बनते नजर आ रहे हैं। मैं आपको मलिक दंपति का एक रोचक किस्सा बताता हूं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर दीपक मलिक और विदेशी छात्रों को हिंदी पढ़ाने वालीं उनकी स्वीडिश पत्नी मीरिया मलिक पिछले दिनों नैनीताल जिले के एक गांव में मिले। कोरोना काल के शुरुआती दिनों से वह वहीं से ऑनलाइन कक्षाएं चला रही हैं। इससे पहले वे दोनों वाराणसी में बसे हुए थे। उन लोगों ने बताया कि यहां आने के बाद हमारी जिंदगी बदल गई है। यहां आवश्यक सामान खरीदने के लिए दूर तक पैदल चलना होता है, इसके साथ ही शुद्ध हवा, पानी, प्राकृतिक मसालों और शहद आदि के सेवन से हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया है। यहां शोर-शराबा नहीं है और न ही बेमतलब के लोग या कीट-पतंगे परेशान करते हैं। इसकी वजह से हम आठ-नौ घंटे की पूरी नींद लेते हैं।
छठे दशक को जी रहीं मीरिया ने बताया कि पिछले दिनों कामकाज के सिलसिले में मैं स्वीडन की उप्पसला यूनिवर्सिटी के एक प्राध्यापक से वीडियो के जरिए चर्चा कर रही थी। बातचीत में उन्होंने पूछा कि आपके यहां मौसम कैसा है, तो मैंने कहा कि ठंड बढ़ गई है। स्वीडिश प्रोफेसर ने कहा कि आपके पास इंटरनेट और व्हिस्की तो है न! अगर इतना है, तो काम चल जाएगा। इस परिहासपूर्ण वार्तालाप के अर्थ गहरे हैं। व्हिस्की का तो पता नहीं, पर इंटरनेट के विस्तार ने कामकाज की वैकल्पिक राहें खोल दी हैं। आने वाले दिनों में बडे़ शहरों के विशाल दफ्तरों में कार्यरत लोग यदि छोटे शहरों और गांवों की ओर रुख करते नजर आएं, तो कोई आश्चर्य नहीं।
हालांकि, इसके अपने दुष्परिणाम होंगे, मगर इस पर फिर कभी चर्चा करूंगा। फिलहाल इतना ही कि सावधानियां बरतते हुए हमें नए तरीके से कामकाज के उपायों पर विचार करना ही होगा, क्योंकि कोरोना कोई अंतिम महामारी तो नहीं। इसे अगली महामारी के दंश से बचने के लिए चुनौतीपूर्ण चेतावनी मानने में ज्यादा भलाई है।

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 29 november 2020