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27 जून, 2020|9:24|IST

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कुदरत ने कहा है अब आदत बदलिए

अद्भुत दृश्य था। फ्रांस के नौजवान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पूरी गर्मजोशी के साथ बाहें फैलाए हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की ओर बढ़ रहे थे, पर झिझके जॉनसन ने उन्हें गले मिलने से रोकने के लिए हाथ जोड़ दिए। मैक्रों भी ठिठककर रुक गए। यह वक्त का वह दौर है, जहां गले मिलने और गले पड़ने का फर्क समाप्त हो गया है। यह वही जॉनसन हैं, जिन्होंने पहले कोविड का उपहास उड़ाकर न केवल अपने देशवासियों, बल्कि खुद को भी खतरे में डाल लिया था। ऐसा सियासी कौतुक कभी देखा-सुना नहीं गया था। दुनिया में जब भी राष्ट्राध्यक्षों के कौतुक की बात हो और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम न आए, यह संभव ही नहीं है। ट्रंप ने भी जॉनसन की तरह शुरू में इस महामारी का उपहास उड़ाया था।

नतीजतन, अब तक सवा लाख से अधिक अमेरिकी इसकी भेंट चढ़ चुके हैं। संसार का सबसे शक्तिशाली देश एक छोटे-से वायरस के सामने इस तरह घुटने टेक देगा, यह किसी ने सोचा भी नहीं था। होना तो यह चाहिए था कि ट्रंप साहब जॉनसन की तरह समय रहते सीख लेते, पर ओक्लाहोमा में अपने चुनाव अभियान की शुरुआत करते समय उन्होंने फिजिकल डिस्टेंसिंग के सारे नियम-कायदों को चकनाचूर कर दिया। उनके समर्थकों में बहुतों ने न तो मास्क पहन रखे थे, न दस्ताने लगाए थे और न ही वे अपने साथियों से आवश्यक शारीरिक दूरी का ख्याल रख रहे थे। उनके आलोचक कह रहे हैं कि इससे ओक्लाहोमा में महामारी के नए दौर के खतरे पैदा हो गए हैं। ट्रंप साहब चाहते थे कि इस रैली में दस लाख लोग इकट्ठा हों। उन्हें निराश होना पड़ा। जरा सोचिए, इतने सारे लोग यदि एक साथ भौतिक दूरी के जरूरी नियम की अवहेलना करने लग जाते, तो क्या होता?

यह इस दौर का ही दोष है कि ट्रंप साहब अकेले नहीं हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसोनारो तो उनसे भी कई कदम आगे निकल गए। वह सार्वजनिक समारोहों में पहले की ही मुद्रा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे। दुष्परिणाम सामने हैं। इस छोटे से देश में अब तक 55 हजार लोग महामारी के शिकार हो चुके हैं और 12 लाख से अधिक संक्रमित हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संक्रमण इसी गति से फैलता रहा, तो ब्राजील में मौत का  आंकड़ा बहुतों को आश्चर्यचकित करेगा। वह अकेले सत्तानायक हैं, जिन्हें संघीय अदालत ने मास्क न पहनने के लिए न केवल फटकारा, बल्कि जुर्माना लगाने की चेतावनी भी दे डाली।

पश्चिम के इन नेताओं के विपरीत भारतीय प्रधानमंत्री और तमाम मुख्यमंत्रियों ने पहले दिन से ही काफी सावधानी बरती है। भारत में काफी पहले लॉकडाउन लागू कर दिया गया। वरिष्ठ नेता जब भी सार्वजनिक मंचों पर आए, मास्क लगाकर आए। लॉकडाउन की तकलीफों ने लोगों को बदलने के लिए बाध्य किया है। आशावादी इस संबंध में कुछ बेहतरीन उदाहरण देते हैं। एक खबर हमारे अलीगढ़ से आई है कि अब शादियों में पैर छूने और पूजने की रस्म विदा हो रही है। यही नहीं, वेदी के पास दूल्हा-दुल्हन को बैठाने के लिए अब लंबे तख्तों की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि लड़का और लड़की के गठबंधन के लिए उनका साथ बैठना जरूरी होता है। पंडित जी भी दूरी बनाकर बैठ रहे हैं और समिधा हाथ से डालने की बजाय इसके लिए बांस से बनी विशेष खपच्ची का इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या कोविड ने सामाजिक रीति-नीति को बदलना शुरू कर दिया है?

कुछ समझदार लोग भले ही ऐसा कर रहे हों, पर कोविड-19 के शिकार लोगों के बढ़ते आंकडे़ भयावह हालात की ओर इशारा कर रहे हैं। यूरोप के देशों में उसका कहर भले ही ढलान पर हो, मगर एशिया और अफ्रीका के देश अब भी तेजी से इसकी आग में झुलस रहे हैं। यही वजह है कि भारत में मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उम्मीद से कम जांच के बावजूद कोरोना हर रोज पुराने रिकॉर्ड तोड़ रहा है। अगर हम इसी तरह फिसलते रहे, तो आबादी के घनत्व के कारण हमारा शुमार इस बदहाली के शिकारों में भी पहले नंबर पर होने लगेगा। भारत में रोजाना संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या 17 हजार को पार कर चुकी है। अब तक पांच लाख से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और जान गंवाने वालों का आंकड़ा भी 20 हजार की ओर बढ़ रहा है। हमारा शुमार वैसे भी विश्व के चार सर्वाधिक संक्रमित देशों में होने लगा है। 

कोई आश्चर्य नहीं कि भय ने चारों ओर कब्जा कर लिया है। पिछले रविवार को मैं नोएडा के सेक्टर-18 गया था। शहर के सर्वाधिक भीड़भाड़ वाले इस मार्केट को जब 20 साल पहले मैंने पहली बार देखा था, तब मुझे लगा था कि यह बाजार आने वाले दिनों में कनॉट प्लेस को भी पार कर जाएगा, पर इन दिनों वहां इसका उल्टा दिख रहा था। इक्का-दुक्का दुकानों के शटर खुले थे और खरीदार पूरी तरह नदारद थे। क्या यह स्थिति अभूतपूर्व आर्थिक मंदी की ओर इशारा नहीं कर रही है? आपको विश्व बैंक का एक आंकड़ा देता हूं। बडे़ कॉरपोरेट और परंपरागत उद्यमों को छोड़ दीजिए, सिर्फ स्कूलों के बंद पड़ जाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 10 ट्रिलियन डॉलर की हानि होने की आशंका जताई जा रही है। यह भारत की समूची अर्थव्यवस्था से तीन गुना ज्यादा है। 

अभी तक हम सिर्फ नुकसान के आकलन पर चल रहे हैं, लेकिन असली हाय-तौबा तब मचेगी, जब इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही के नतीजे आएंगे। कई विद्वान मानते हैं कि वे आंकडे़ स्थिति की भयावहता को सही तौर पर दर्शाने वाले होंगे। कोई आश्चर्य नहीं कि हम चारों ओर बेरोजगारी व बदहाली को और सघन होता हुआ पाएं। सवाल उठता है कि ऐसे में क्या करें? डर स्वाभाविक है और जीवन का अनिवार्य हिस्सा भी, पर हमें इससे निपटने के लिए अपने अन्य नैसर्गिक गुणों का सहारा लेना पडे़गा। मानवीय जिजीविषा का इतना बड़ा इम्तिहान इससे पहले कभी नहीं देखा गया था। नए नियमों का पालन करना अब अनिवार्य हो गया है। ध्यान रखिए, दवा विकसित हो जाने के बाद भी यह बीमारी पूरी तरह जाने वाली नहीं है और इसके आर्थिक दुष्प्रभावों से उबरने में जो समय लगेगा, उसका उपचार भी किसी के पास नहीं है। इसके लिए हमें खुद प्रयास आरंभ करने होंगे। राम भरोसे रहने के नाम पर खुद को सरकार के आसरे छोड़े रखने के दिन विदा हुए। हमें अपनी और अपने संसार की सुरक्षा की पहल और प्रयास खुद करने होंगे।

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 28 june 2020