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सावरकर राग का हासिल

हमारे समूचे राजनीतिक वर्ग में पिछले कुछ सालों से अतीत के पन्नों की चिंदियां बनाने की प्रवृत्ति घर करती चली गई है। ‘आधी हकीकत, आधा फसाना’ के इस सियासी खेल ने भारत की विचार सत्ता को झकझोर कर रख दिया...

सावरकर राग का हासिल
Pankaj Tomarशशि शेखरSat, 26 Nov 2022 11:39 PM
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राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बीच ‘सावरकर राग’ छेड़कर क्या साबित करने की कोशिश की? क्या यह पार्टी और अपनी छवि को वैचारिक आधार प्रदान करने के लिए उठाया गया एक सुविचारित फैसला था? 
जिस महाराष्ट्र की धरती पर उन्होंने यह बयान दिया, वहां एक वर्ग विशेष के बीच विनायक दामोदर सावरकर का नाम काफी सम्मान के साथ लिया जाता है। कल तक जिस शिव सेना के साथ कांग्रेस सरकार में थी, वह खुद को ‘वीर सावरकर’ के पदचिह्नों का यात्री बताती है। यही वजह है कि उद्धव ठाकरे के करीबी संजय राउत ने तत्काल इस पर गंभीर आपत्ति जताई। इसके बाद से कांगे्रस की राज्य इकाई को ‘महाविकास अघाड़ी’ बचाने और अपनी साख बनाए रखने के लिए काफी एहतियात बरतना पड़ रहा है। राहुल गांधी के प्रशंसक कह सकते हैं कि भले ही महाराष्ट्र में इस समय फौरी प्रतिक्रिया दिखाई पड़ रही है, मगर इससे कांग्रेस की पुरानी छवि मजबूत हुई है। शेष भारत में भी इसका सकारात्मक संदेश जा सकता है। सवाल उठता है, सावरकर का महाराष्ट्र के बाहर कोई बड़ा सियासी असर नहीं है, तो उनके नाम से जुड़े विवाद भला क्या लाभ दिलाएंगे? 
लाभ-हानि का कल्पना-लोक अपनी जगह है, पर इससे विपक्ष के राजनीतिक तीरंदाजों को शाब्दिक अग्निबाण छोड़ने का मौका जरूर मिल गया। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा ने राहुल की तुलना सद्दाम हुसैन से कर डाली, तो जवाब में कांग्रेस की अलका लांबा को ‘कुत्ते’ याद आने लगे। कांगे्रस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने बाद में यह कहकर इस विवाद पर परदा डालने की कोशिश की कि ‘सावरकर प्रकरण अब खत्म हो गया है। मैं बस यही दोहराना चाहूंगा कि जिस दिन भाजपा और आरएसएस के लोग हमारे नेताओं के बारे में झूठ बोलना छोड़ देंगे, उसी दिन से हम उनके नेताओं के बारे में सच कहना बंद कर देंगे!’ 
बंदूक से निकली गोली और जुबां से फिसली बोली किसी तर्क से भला कहां लौटती है? 
राहुल गांधी चाहते, तो इस मुद्दे को दरकिनार कर सकते थे। वह सौवें दिन की ओर सरकती इस लंबी यात्रा में सकारात्मक और संयमित नजर आए हैं। मोरबी हादसे के समय उनकी टिप्पणी इसका उदाहरण है। उस वक्त उन्होंने कहा था, ‘मैं इस हादसे का राजनीतिकरण नहीं चाहता। लोगों की जान गई है, और ऐसा करना उनका अपमान होगा। मैं इस पर राजनीति करना नहीं चाहता।’ हर रोज 22 किलोमीटर पैदल चलना, सैकड़ों लोगों से मिलना, हर शाम सार्वजनिक सभा को संबोधित करना आसान नहीं है। लगभग तीन महीने का वक्त वह इस अभियान को दे चुके हैं। इससे उनकी छवि बदली है, पर अभी उन्हें लंबा रास्ता तय करना है। ऐसे में, अचानक उनके संयम का बांध कैसे दरक गया?
बेहतर होगा कि वह इतिहास की परतें उधेड़ने के बजाय मौजूदा ज्वलंत समस्याओं पर बात करें। 
इसके लिए उनके पास अनुभवों का नया खजाना मौजूद है। अब तक उन्होंने दक्षिण, पश्चिम और मध्य भारत का बड़ा हिस्सा नाप लिया है। इस दौरान उन्होंने सैकड़ों गांवों के हजारों लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया है। वह उन समस्याओं को नजदीक से देख पाए हैं, जिन्हें अब तक सिर्फ सुनते और पढ़ते आए थे। क्यों न वह अपने श्रोताओं से इन समस्याओं के साथ भविष्य का रोडमैप साझा करें? इससे आम आदमी को उनके नजरिये की सही जानकारी हो सकेगी और उनकी पार्टी को लाभ भी होगा। 
यहां मैं सिर्फ राहुल गांधी या कांग्रेस की बात नहीं करना चाहता। हमारे समूचे राजनीतिक वर्ग में पिछले कुछ सालों से अतीत के पन्नों की चिंदियां बनाने की प्रवृत्ति घर करती चली गई है। ‘आधी हकीकत, आधा फसाना’ के इस सियासी खेल ने भारत की विचार-सत्ता को झकझोर कर रख दिया है। हिन्दुस्तानी राजनेता इतिहास के काले दलदल में धंसने के बजाय 14 और 15 अगस्त, 1947 के प्रभातों से कुछ रोशनी क्यों नहीं हासिल करते? 
वे सुविधापूर्वक भूल जाते हैं कि हमारा सहोदर पाकिस्तान अपने जन्म के कुछ दिन बाद से ही मजहबपरस्ती, फिरकापरस्ती और नफरती उन्माद का शिकार हो गया था। इसके विपरीत भारत अपने अंतरविरोधों के बावजूद कुछ मुद्दों पर हमेशा एकमत रहा। पहले मंत्रिमंडल में नेहरू के साथी रहे आंबेडकर उनके खिलाफ मुखर रहते थे, पर दलितों और शोषितों के उत्थान के मामले में दोनों के बीच की वैचारिक खाई सियासी प्रतिरोध के मुकाबले काफी संकरी थी। आज पटेल और नेहरू को अलग करके देखा जाता है, पर सच है कि तमाम ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ हैं, जो साबित करते हैं कि दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। सरदार सरेआम नेहरू को अपना नेता कहते थे और नेहरू, सरदार पटेल की बातों, तर्कों और तथ्यों को नजरंदाज करने से बचते थे। देश की एकता और अखंडता के लिए दोनों के विचार समान थे। 
इसी तरह, सुभाष चंद्र बोस और गांधी-नेहरू की जोड़ी के लिए कई बातें कही जाती हैं, पर तथ्य यह भी है कि कमला नेहरू जब जानलेवा तपेदिक का इलाज कराने भुवाली पहुंचीं, तो बोस हजारों किलोमीटर की दुरूह यात्रा कर वहां उनकी मिजाजपुर्सी के लिए पहुंचे थे। बकौल इतिहासकार मृदुला मुखर्जी, 23 जनवरी, 1946 को नेताजी की जयंती पर पंडित नेहरू ने दिल्ली की एक सार्वजनिक सभा में कहा था- ‘कुछ लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं सुभाष चंद्र बोस की अब प्रशंसा क्यों कर रहा हूं, जबकि भारत में रहते हुए मैंने उनका विरोध किया था? मैं इस बात का स्पष्ट उत्तर देना चाहता हूं। बोस और मैं 25 वर्षों तक आजादी के संघर्ष में सहयोगी रहे हैं। वह मुझसे दो-चार साल या शायद इससे कुछ अधिक छोटे थे। मैं उन्हें अपने छोटे भाई की तरह मानता था। यह एक खुला रहस्य है कि राजनीतिक प्रश्नों पर हमारे बीच कभी-कभी मतभेद हो जाया करते थे, लेकिन उनके स्वतंत्रता संग्राम के बहादुर सेनानी होने पर मुझे एक पल भी संदेह नहीं हुआ।’
यह हमारे उन महान पुरखों का पुण्य प्रताप है कि भारत में लोकतंत्र आज तक कायम है, जबकि पाकिस्तान चौतरफा दुर्दशा के हालात में छटपटा रहा है! वहां सेना ने समूचे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे पर कब्जा कर लिया है। सेना और उससे जुड़े लोग माचिस की तीली से लेकर हथियार बनाने तक के कारखाने चलाते हैं। वही सबसे बड़े बिल्डर हैं और वही सबसे बड़े औद्योगिक निर्माता। राजनीति और राजनीतिज्ञों को तो उन्होंने 1958 से ही इशारों पर नचाना शुरू कर दिया था। यही वजह है कि परमाणु हथियारों से लैस पाकिस्तान आज समूची दुनिया के लिए खतरा बन गया है। 
इसका वहां की सेना के चरित्र पर भी दुष्प्रभाव पड़ा है। पिछले हफ्ते तक पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष रहे जनरल कमर जावेद बाजवा की पुत्रवधू और परिवार के अन्य व्यक्तियों के ऊपर पद पर रहते हुए बेतहाशा संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज हुआ है। जिस देश का सर्वोच्च सैनिक भ्रष्टाचारी हो और कुछ वर्ष पहले तक प्रधानमंत्री रह चुका व्यक्ति सजायाफ्ता हो, उस मुल्क से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? 
भारत इस बदहाली से अब तक सिर्फ इसलिए बच सका है, क्योंकि हमारे राजनीतिज्ञों ने बरसों-बरस मर्यादा के घूंघट को उलटने का दुस्साहस नहीं किया। उम्मीद है, सभी पार्टियों के खिवैया इस तथ्य पर गौर फरमाएंगे। 

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