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दहशत के विरुद्ध दिल्ली मॉडल

26/11 के जघन्य घटनाक्रम में जान-माल का जो भारी नुकसान हुआ, उससे कहीं अधिक भारतीय आन-बान और शान को धक्का लगा था। हमारी सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी, समुद्री सीमा के प्रति लापरवाही और आतंकवाद निरोधक...

दहशत के विरुद्ध दिल्ली मॉडल
Amitesh Pandeyशशि शेखरSat, 25 Nov 2023 08:56 PM
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आज 26/11 की 15वीं बरसी है। उस दिन पाकिस्तान से भेजे गए दस हत्यारों ने मुंबई के सबसे व्यस्त हिस्से में तबाही मचा दी थी। अगले लगभग 60 घंटे संघर्ष और लाचारी के थे। 
संघर्ष और लाचारी एक साथ?
पहले संघर्ष की बात। हमले के शुरुआती क्षणों में ऐसा लगा था, जैसे यह कोई ‘गैंगवार’ है। सबसे पहले कोलाबा के लियोपोल्ड कैफे में गोलियां चलनी शुरू हुईं और स्थानीय पुलिस दाऊद और छोटा राजन की खूनी लड़ाइयों के हिसाब से कमर कसने लगी। उसका अनुमान गलत था। देखते-देखते छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन, ओबेराय ट्राइडेंट, ताज होटल, कामा अस्पताल, नरीमन हाउस यहूदी समुदाय केंद्र, मेट्रो सिनेमा सहित सेंट जेवियर्स कॉलेज के पीछे कुल आठ हमले हुए। हर तरफ अफरा-तफरी मच गई थी। महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते और सिविल पुलिस के जवान हकबकाए से हर ओर भागते नजर आ रहे थे। इस संघर्ष में भारतीय पुलिस सेवा के जांबाज अधिकारी हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे शहीद हो गए। यह बड़ा आघात था। इससे पहले कभी किसी महानगर में इतनी बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारियों को मुठभेड़ के दौरान जान नहीं गंवानी पड़ी थी। 
मुंबई पुलिस का मनोबल इसके बावजूद नहीं टूटा। साधनहीनता के बावजूद वह मोर्चा-दर-मोर्चा जूझती रही। इसकी सबसे बड़ी मिसाल तो आतंकी अजमल कसाब की गिरफ्तारी है। उस वक्त कसाब के सिर पर खून सवार था। वह दर्जनों लोगों को मार चुका था और आगे भी उसे किसी की जान लेने में कोई संकोच नहीं होना था, लेकिन एएसआई तुकाराम ओंबले सिर्फ अपनी लाठी के बल पर उससे उलझ गए। इस दौरान उन्हें प्राणघातक गोलियां लगीं, पर वह जान गंवाकर भी इतिहास रच गए। कसाब की गिरफ्तारी दहशतगर्दी के इतिहास में मील का पत्थर है। अब तक किसी भी फिदायीन हमले में कोई आतंकवादी जिंदा नहीं पकड़ा गया था। उसकी गिरफ्तारी ने पाकिस्तान के काले मनसूबों पर प्रामाणिकता की मोहर लगा दी। 
अब लाचारी की बात।
ताज होटल पर कब्जा जमाए आतंकवादियों से भिड़ने के लिए शुरुआत में नौसेना के ‘मार्कोस’ कमांडो बुलाए गए थे। वे बहादुरी से लडे़, पर अपेक्षा के अनुरूप सफलता नहीं पा सके। उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे। बाद में नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) ने मोर्चा संभाला और लगभग तीन दिन बाद ताज होटल में आखिरी दहशतगर्द के मारे जाने के साथ यह ऑपरेशन खत्म हुआ। इस जघन्य घटनाक्रम में जान-माल का जो भारी नुकसान हुआ, उससे कहीं अधिक भारतीय आन-बान और शान को धक्का लगा था। हमारी सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी, समुद्री सीमा के प्रति लापरवाही और आतंकवाद निरोधक दस्तों की तैनाती को लेकर तमाम सवाल उठे थे। 
सरकार ने इससे कई सबक हासिल किए। 
मसलन, पहले एनएसजी सिर्फ गुड़गांव में तैनात होती थी, इसीलिए उसके ‘कमांडोज’ को मुंबई तक पहुंचाने में घंटों लग गए थे। इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में उसके चार केंद्र बना दिए गए। विभिन्न प्रदेशों के आतंकवाद निरोधी दस्तों, खुफिया इकाइयों को भी चाक-चौबंद किया गया। इसके साथ ही समुद्री सीमाओं की सुरक्षा के लिए तटरक्षक बलों के साथ नौसेना को आवश्यक साज-ओ-सामान मुहैया कराए गए। कसाब के जिंदा पकड़े जाने का फायदा विदेश मंत्रालय ने भी उठाया। सभी प्रमुख देशों के भारतीय राजदूतों को नई दिल्ली बुलाकर सुबूतों के पुलिंदे थमाए गए। उन्हें जब दुनिया भर के शासनाध्यक्षों को सौंपा गया, तो पाकिस्तान का सारा झूठ बेपरदा हो गया। यह अभूतपूर्व कूटनीतिक घेराबंदी थी। 
आज मैं 26/11 के उस हादसे को सिर्फ रस्मो-रिवाज के लिए याद नहीं कर रहा। पिछले महीने की सात तारीख को इजरायल पर हमास के हमले को टीवी पर देखते हुए मुंबई का वह हमला रह-रहकर दिमाग के दरवाजे खटखटा रहा था। इजरायल की सेना, उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद और वहां के नागरिकों का जुझारूपन दशकों से चर्चा के केंद्र में है। इसके बावजूद वे हमला रोकने में नाकाम रहे। जहां-जहां आक्रमण हुआ, वहां पुलिस अथवा सुरक्षा दस्तों का ‘रिस्पॉन्स टाइम’ भी बेहद खराब था। कई स्थानों पर तो वे घंटों बाद पहुंचे। इसके उलट मुंबई में अपने सीमित संसाधनों के बावजूद पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों के जवानों ने अपनी कुर्बानी देकर भी लोहा लेने में कोई कोताही नहीं बरती थी। 
यहां एक और बात गौरतलब है। इजरायल ने आक्रमण के बाद जो जवाबी कार्रवाई की, उसने कई सवाल खडे़ कर दिए हैं। मैं बिल्कुल नहीं कह रहा कि अपने ऊपर हुए हमले का बदला लेने का हक तेल अवीव को नहीं था, पर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके साथियों ने उसी अति-उत्साह का प्रदर्शन किया, जो कभी जॉर्ज डब्ल्यू बुश कर बैठे थे। 9/11 के बाद उन्होंने अफगानिस्तान के खिलाफ जंग छेड़ दी थी। 20 वर्ष से अधिक लंबे चले इस युद्ध ने अमेरिका को भयंकर माली नुकसान पहुंचाया। इसी दौरान चीन को अपनी आर्थिक शक्ति के विस्तार का खुला अवसर मिल गया। नतीजा सामने है। बीजिंग आज वाशिंगटन डीसी को खुली चुनौती देने की स्थिति में है। 
इसी तरह, इजरायल अब लंबे समय के लिए गाजा में फंस गया है। लेबनान और जॉर्डन से जुड़ी उसकी सीमाएं भी अशांत हैं। इनसे निपटने के लिए उसे लंबे समय तक बेहिसाब संसाधन झोंकने होंगे। यही नहीं, इतने खून-खराबे के बावजूद अपने बंधक छुड़ाने के लिए उसे हमास के आतंकी तक छोड़ने पडे़। इस 45 दिन की जंग के बजाय अगर वह हमास को खत्म करने के लिए खुफिया और कूटनीतिक उपाय करता, तो क्या बेहतर नहीं होता? बड़े से बड़े युद्ध का निपटारा अंतत: बातचीत की टेबल पर ही होता है। 
इस मामले में भारत की मिसाल दी जा सकती है। 26/11 के बाद मनमोहन सिंह ने उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ  अली जरदारी से साफ तौर पर कहा था, ‘मुझे मिला जनादेश आपको यह बताने के लिए है कि पाकिस्तानी सरजमीं का इस्तेमाल दहशतगर्दी के लिए कतईनहीं होना चाहिए।’ इसके साथ इस्लामाबाद को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर जो कई अन्य संदेश दिए गए, वे कारगर भी साबित हुए थे। 
मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस रवायत को ठोस और अधिक प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया। उरी में 18 सैनिकों की शहादत के तत्काल बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ और पुलवामा में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 जवानों की शहादत के बाद भारत सरकार ने बालाकोट पर ‘एयर स्ट्राइक’ कर संदेश दे दिया था कि अब बातचीत नहीं, रण होगा। इन दोनों आक्रमणों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंतिम क्षण तक देखा-परखा था। यह भारत की नीति में स्पष्ट और प्रभावी परिवर्तन था। बताने की जरूरत नहीं कि पुलवामा के बाद आज तक उस स्तर की कोई बड़ी आतंकवादी वारदात हमारे यहां नहीं हुई। 
जरा सोचें, अगर भारत ने पलटकर हमला कर दिया होता, तो हम इजरायल और अमेरिका की भांति एक लंबे और अनुत्पादक युद्ध में फंस गए होते। तय है, देश चलाने के लिए जोश के साथ होश की भी जरूरत होती है। 

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