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एक रुका हुआ फैसला

गुजरे 27 वर्षों में पांच से अधिक बार पहले भी इस मुद्दे को अमली जामा पहनाने की कोशिश की गई थी, पर हर बार सत्ता पक्ष का कमजोर संख्या बल उसकी सदिच्छा पर भारी साबित होता था। उनकी राह रोकने वाले दल आज...

एक रुका हुआ फैसला
Amitesh Pandeyशशि शेखरSat, 23 Sep 2023 11:01 PM
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मुंह पर चकाचौंध कर देने वाली रोशनी। मंच पर एंकर के अलावा तीन और मेहमान। आंख उठाते ही कैमरों के लेंस से टकराती नजरें। सामने प्रदेश की नामी-गिरामी हस्तियों का जमघट। ऐसे में, एंकर सधी आवाज में उनसे मुखातिब होती है- ‘आप अपनी जीवन-यात्रा के बारे में कुछ बताइए।’ मनीषा बोरा अचकचा जाती हैं। रुंधे हुए से शब्द फूट पड़ते हैं- ‘मैं कभी ऐसे माहौल में नहीं आई। मुझे अपनी बात भी अच्छे से कहनी नहीं आती।’
कौन हैं यह मनीषा बोरा? यहां उनकी चर्चा क्यों?
मनीषा बोरा एक उनींदे शहर रुद्रपुर में रहने वाली युवा महिला हैं। वह अपनी बच्चियों के लालन-पालन के लिए घर-घर खाद्य सामग्री पहुंचाने का काम करती हैं। अखबार वालों ने उन्हें ‘स्विगी गर्ल’ का खिताब दे रखा है। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स समूह’ की पुरानी रीति-नीति है कि उन लोगों को आगे लाया जाए, जिन्होंने अपनी गुरबतों और मुसीबतों से हार माने बिना कुछ नया करने की ठान रखी है। मनीषा को हमने देहरादून में पिछले दिनों आयोजित ‘हिन्दुस्तान शिखर समागम’ में इसी सदनीयत के साथ बुलाया था।
उनकी अचकचाहट में छिपी ईमानदारी और साफगोई श्रोताओं का दिल छू गई। एंकर के साथ हॉल में मौजूद लोगों की ओर से जोरदार प्रोत्साहन के अल्फाज उभरने लगे। मनीषा ने बोलना शुरू किया, मैंने बचपन में बाइक चलानी सीख ली थी। आज वही मेरे काम आ रही है। काम की तलाश में रुद्रपुर पहुंची, पर परिश्रम और भुगतान का अनुपात बेहद खराब था। किसी ने ‘स्विगी’ का नाम लिया और मैं उसके साथ जुड़ गई। मैं बिना नागा भोर में उठ जाती हूं। बच्चियों के लिए खाना बनाकर उन्हें तैयार करती हूं और फिर दूसरों का पेट भरने के लिए बाहर निकल पड़ती हूं। काम के सिलसिले में अक्सर पंद्रह किलोमीटर दूर पंतनगर तक जाना पड़ता है। कभी-कभी घर लौटने में आधी रात के आस-पास का वक्त तक हो जाता है।
जो नहीं जानते, उन्हें बता दूं। रुद्रपुर से पंतनगर के बीच राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरना होता है। बडे़-छोटे वाहन हरदम उस पर दौड़ते रहते हैं। उनकी डरावनी गति, अंधा कर देने वाली रोशनी, इंजनों और प्रेशर हॉर्न की कानफोड़ू आवाज के बीच बाइक चलाना जीवट का काम है। कोई आश्चर्य नहीं कि उनके जवाबों के बीच लोग रह-रहकर तालियां बजा उठते थे।
उनके बगल में बैठी कमला देवी की कहानी भी कम प्रेरणादायक नहीं। वह नैनीताल जिले की एक सड़क पर पंक्चर जोड़ने का काम करती हैं।
कमला बिला हिचक बताती हैं कि मैं बहुत पहले बच्चों को पांच रुपये में साइकिल चलाना सिखाती थी, ताकि वे दूर स्थित स्कूलों में पढ़ने जा सकें। कभी उनकी साइकिल पंक्चर हो जाती, तो दस रुपये लेकर उसे दुरुस्त कर देती। यहीं से मुझे प्रेरणा मिली कि मैं अपने पति के साथ पंक्चर जोड़ने का काम करूं। आज वह साइकिल से लेकर ट्रक तक के पंक्चर जोड़ती हैं। आम तौर पर मर्दों के लिए आरक्षित इस काम में आपने शायद ही कोई महिला देखी हो।
एंकर पूछती है कि आप तो सड़क पर बैठती हैं, तमाम तरह के लोग आपसे टकराते होंगे। कुछ ऐसे भी होंगे, जिनका व्यवहार अनुचित होता होगा। उनसे आप कैसे निपटती हैं? वह हंसकर जवाब देती हैं कि पंक्चर जोड़ने के लिए मैं हथौड़ा चलाती हूं और ऐसे लोगों के लिए भी हथौड़ा हमेशा मेरे हाथ में होता है। वे डरकर भाग जाते हैं। बाद में मैंने देखा कि अच्छे से कपड़ों में दो बच्चियां उनके साथ थीं। उन्होंने बताया कि ये मेरी पोतियां हैं। दोनों दिल्ली में केंद्रीय विद्यालय में पढ़ती हैं। मेरा बेटा सशस्त्र सीमा बल में तैनात है। 
मनीषा और कमला देवी की बातों से वहां मौजूद लोग कभी हंसे, कभी रोए, तो कभी तालियों से उनका खैरमकदम किया। ये हिन्दुस्तान की वे बेटियां हैं, जो सशक्त और सबल भारत की रचना में जुटी हुई हैं।
क्या इतना काफी है? 
यकीनन नहीं। भारत का रिकॉर्ड महिलाओं के मामले में अभी तक उम्मीद के अनुरूप नहीं हो सका है। आधी आबादी पर तरह-तरह के अत्याचार अक्सर सुर्खियां बनते हैं। आधिकारिक आंकडे़ भी आशा बंधाने के बजाय निराश करते हैं। ऐसे में, मनीषा, कमला और उन जैसी महिलाएं दीये की भूमिका भले निभाती हों, पर अंधेरा दूर करने के लिए समाज तथा सरकार की और कोशिशों के अनुरोध उभरते रहते थे। गुजरे हफ्ते संसद में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित कराकर मोदी सरकार ने नई आस जगाई है। प्रमुख विपक्षी दलों ने भी दो दिन पूर्व सरकार से इसकी मांग की थी। 
यहां बताना जरूरी है कि गुजरे 27 वर्षों में पांच से अधिक बार पहले भी इस मुद्दे को अमली जामा पहनाने की कोशिश की गई थी, पर हर बार सत्ता पक्ष का कमजोर संख्या बल उसकी सदिच्छा पर भारी साबित होता था। उनकी राह रोकने वाले दल आज भी कुछ संशोधनों की मांग कर रहे हैं, पर अंकगणित उनके पक्ष में नहीं है। 
सवाल उठता है कि आम चुनाव से ऐन पहले इस बिल को लाने का मकसद क्या था? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी अगुवाई में नए संसद भवन में कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिसका अवसर आजादी के तत्काल बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू को कालचक्र ने मुहैया करा दिया था? विपक्ष का आरोप है कि यह चुनावी दांव है। ध्यान रहे, लोकतंत्र में सभी राजनीतिज्ञ और दल चुनाव जीतने के लिए लड़ते हैं, ताकि वे अपने सिद्धांतों को अमली जामा पहना सकें। मौजूदा सरकार ने पिछले चुनाव से पूर्व जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाने का संकल्प लिया था, दोबारा सत्ता में आते ही उसने उसे पूरा कर दिया। इस बार गृह मंत्री अमित शाह ने बहस के दौरान संसद को आश्वासन दिया है कि वर्ष 2024 के तत्काल बाद आवश्यक कार्रवाई कर इस अधिनियम को 2029 से पूर्व अमली जामा पहना दिया जाएगा। 
क्या नई दिल्ली की सरकार और भाजपा संगठन अभी से आश्वस्त हैं कि 2024 का आम चुनाव हम जीतने जा रहे हैं? या, पांच वर्ष पूर्व भी हुकूमत के सर्वशकारों ने इसी तरह के बयान दिए थे। यह उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वे मतदाताओं को बताना-जताना चाहते हैं कि आने वाला चुनाव हमारे पक्ष में मुनादी कराने जा रहा है, आप किसी और के झांसे में न आएं। विपक्ष इस दांव को समझता है, पर आधी आबादी के हक-हुकूक को सियासत की सांप-सीढ़ी का हिस्सा नहीं मानना चाहिए। इस रुके हुए फैसले को अब और रोकना अनुचित होगा। 
प्रधानमंत्री मोदी अगर इस मुद्दे को सिरे तक पहुंचाने में कामयाब रहते हैं, तो तय है कि इसका असर उतना ही दूरगामी होगा, जितना जवाहरलाल नेहरू के दलित और विश्वनाथ प्रताप सिंह के पिछड़ा आरक्षण का हुआ था।  

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