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4 अप्रैल, 2020|7:57|IST

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हवाएं अब तेवर बदलने लगी हैं

hindustan editor shashi shekhar

क्या भारत और भारतीयता एक बार फिर करवट ले रहे हैं? 
इस सवाल का जवाब ढंूढ़ने के लिए हमें बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं। बस आसपास के माहौल पर नजर दौड़ा देखिए, हालात का इशारा समझ में आ जाएगा। 70 दिन बीत गए, देश की 14 फीसदी आबादी मुखर रूप से आंदोलित है। उसे नागरिकता संशोधन कानून और एनपीआर से परहेज है। प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री समेत केंद्रीय कैबिनेट के तमाम सदस्य दिलासा दिला चुके हैं कि उन्हें डरने की जरूरत नहीं। किसी भारतीय नागरिक का बाल बांका नहीं होने जा रहा, पर आशंका का वातावरण खत्म होने का नाम नहीं ले रहा।

इसी प्रतिरोध के चलते कुछ दिनों पहले तक दिल्ली वालों के लिए अपरिचित शाहीन बाग अब अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां अर्जित कर रहा है। वहां जमी महिलाएं सरकार के आश्वासनों और अन्य प्रयासों के बावजूद धरना खत्म करने को तैयार नहीं हैं। नतीजतन, नोएडा को फरीदाबाद और दक्षिण दिल्ली से जोड़ने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण सड़क बंद है। लाखों लोगों को इसकी वजह से यातायात संबंधी दुर्गति का शिकार होना पड़ रहा है। आजादी के बाद संभवत: यह पहला अवसर है, जब राष्ट्रीय राजधानी का कोई प्रमुख मार्ग किसी प्रतिरोध के चलते इतने दिनों तक रुका पड़ा हो।

यह आंदोलन इतना लंबा कैसे खिंच गया?
वजह साफ है, यहां जमे लोगों ने नकारात्मक तर्कों और तत्वों को अपने प्रतिरोध का हिस्सा नहीं बनने दिया। अब तक मुस्लिमों के आंदोलन अपनी पहचान बताने और जताने के लिए होते थे। इनमें धार्मिक नारे लगते थे और हरे झंडे लहराए जाते थे। इससे समाज के बडे़ तबके में दुराव की भावना प्रबल हो उठती थी। शाहीन बाग आंदोलन को भी शुरुआती दिनों में कुछ लोगों ने उत्तेजक नारों और तकरीरों के जरिए धार्मिक रंग देने की कोशिश की, पर ऐसे लोगों को प्रदर्शनकारियों ने बाहर कर दिया।

यहां राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय संविधान के जरिए बार-बार जताने की कोशिश की गई कि हम मुसलमान जरूर हैं, पर हमारी भारतीयता में किसी को शक नहीं होना चाहिए। धरनास्थल पर सभी धर्मग्रंथों के पाठ हुए और गांधी, भगत सिंह, आंबेडकर जैसे नेताओं के चित्र शिद्दत से प्रदर्शित किए गए। यही नहीं, इस धरने को किसी नेता की बजाय नानियों, दादियों, माताओं और बहनों के हवाले कर दिया गया, ताकि पूर्वाग्रहों की काली छाया से दूर रहा जा सके। यही वजह है कि इन्हें सिख, दलित और ईसाई धड़ों का समर्थन मिला। तमाम सवर्ण हिंदू भी खुले मन से यहां आते-जाते रहे। दिल्ली के चुनावों में शाहीन बाग के नाम पर सांप्रदायिकता के प्रवाह के प्रयास भी इसीलिए असफल रहे।

देखते-देखते नेता विहीन शाहीन बाग शीघ्र ही एक प्रतीक बन गया और इसकी प्रतिध्वनि देश के तमाम हिस्सों में सुनी गई। कई शहरों में महिलाएं-बच्चे धरने पर बैठे। जहां जुलूस निकाले गए, वहां भी धार्मिक की जगह राष्ट्रीय प्रभुसत्ता के प्रतीकों को आगे रखा गया। इस आंदोलन ने एक बात तो साबित कर दी है कि भारतीय मुसलमान अब अपनी नई पहचान गढ़ने के लिए प्रयासरत हैं। अब तक कुछ लोग उन पर यह विचार थोपने की कोशिश करते थे कि हम मुसलमान पहले हैं, किसी देश के नागरिक बाद में। पहली बार पूरे देश के पैमाने पर मुस्लिम इस विचार को खारिज करते दिखे। मुनव्वर राणा जैसे मशहूर शायर ने जब कहा कि इस देश पर आठ सौ बरस हमारी हुकूमत रही है, तो उन्हें अपनी कौम से ही मुखालफत का सामना करना पड़ा। बाद में, वारिस पठान भी इसी दुर्गति के शिकार हुए। यही वजह है कि शाहीन बाग में ‘जिन्ना वाली आजादी’ का नारा दोहराया नहीं गया। महिलाओं की अगुवाई के कारण यह धरना पुलिस के हस्तक्षेप से तो बचा ही, कठमुल्ले भी इस पर कब्जा नहीं कर सके। वे पुरुषों के मुकाबले संयत और कारगर साबित हुई हैं।

इस दौरान तमाम तकरीरों में खुद को पृथक पहचान के जंग लगे पिंजरे से निकालने के भी आह्वान हुए। इंदौर के एक सज्जन का वायरल वीडियो इस तथ्य की मुनादी करता है। वह कह रहे थे कि वक्त आ गया है कि हम इजहार करें दूसरी कौमों से अपनी मोहब्बत का। हमलोग इस मामले में कंजूस हैं। आज दूसरी कौम कुछ करती है, तो हम खाना, चाय-पानी लेकर जाते हैं? नहीं जाते।... हम भी उनके त्योहारों में हिस्सा लें। हमें बताना होगा कि हम भी इस देश से प्यार करते हैं, यह हमारा मुल्क है। तय है, पहले भी ज्यादातर मुस्लिम यही राय रखते थे, पर राजनीतिक प्रतीकवाद के जरिए खास तरह का लबादा ओढ़ाने की कोशिश की गई। यह पहला मौका है, जब इस कुटैव से मुक्ति की छटपटाहट साफतौर पर दीख रही है।

क्या मुस्लिम महिलाएं और नौजवान अपनी पृथक भविष्यगाथा गढ़ रहे हैं? कुछ लोग कह सकते हैं कि यह सरकार की सख्ती का कमाल है। सरकार ने एनपीए और नागरिकता संशोधन कानून पर सफाई दी, तो यह भी साफ कर दिया कि इन्हें वापस नहीं लिया जाएगा। उत्तर प्रदेश में हिंसा का जवाब जिस सख्ती से दिया गया, उसका भी संदेश स्पष्ट था। आने वाले दिनों में अमित शाह नए कानून के समर्थन में सार्वजनिक सभाएं करने जा रहे हैं।

हालांकि, ऐसे सामूहिक आत्मचिंतन पहले भी हुए हैं। अपनी आंखों देखे एक बदलाव का जिक्र करना चाहूंगा। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सिखों के खिलाफ जानलेवा हिंसा भड़क उठी थी। नफरत के उस उबलते लावे को देखकर लगता था, जैसे हमारा मानसिक विभाजन हो गया है, पर उत्तेजना का अलाव बहुत जल्दी ठंडा पड़ गया। इसका सर्वाधिक संताप बहुसंख्यकों के मन में देखा गया। मैं बहैसियत पत्रकार उस समय दर्जनों लोगों से मिला और हरेक को कहते पाया कि जो हुआ, बहुत गलत हुआ। सिखों का संत्रास, अन्यों का संताप बन चुका था। नतीजतन,  इस खूंरेजी से पहले सिखों को लेकर जो चुटकुले बनते थे, वे भी धीरे-धीरे हवा में विलुप्त होते चले गए। यह मामूली परिवर्तन नहीं, बल्कि समूचे समाज की गहरी आत्मस्वीकृति थी। बहादुर सिख कौम भी बहुत जल्द अपनी त्रासदी भूलकर फिर से उठ खड़ी हुई। गिरने, लड़खड़ाने और सम्हलकर आगे बढ़ चलने की हिन्दुस्तानी रवायत पुरानी है, पर हम इस परंपरा को तभी कायम रख सकते हैं, जब दोनों पक्ष साझी सहमतियों के लिए गुंजाइश बनाकर रखें। आंदोलनकारी भूले नहीं, हर आंदोलन की एक मियाद होती है।

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  • Web Title:Hindustan Aajkal Column By Shashi Shekhar 23rd February 2020