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दरिद्र नारायण को भूलिए मत

आज जब नए उभरते हर कुबेर के साथ हजारों दरिद्र पनप रहे हैं, तब सवाल उठता है कि इस खाई को कैसे पाटा जाए? हम भारतीय ऐसे असुविधाजनक प्रश्नों के उत्तर खुद खोजते आए हैं, आज नहीं तो कल इस पहेली को भी सुलझा...

दरिद्र नारायण को भूलिए मत
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हर दीपावली मुझे दु:स्वप्न की तरह दो दृश्य याद आते हैं- 
पहला, 12 नवंबर 2007, मॉस्को। हमलोग तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ रूस में थे। वहां के भारतीय दूतावास ने चुनिंदा लोगों के लिए आलीशान रेस्तरां, ‘नसीरुद्दीन’ में रात्रिभोज का आयोजन किया था। नसीरुद्दीन दिव्य मध्य एशियाई भोजन के साथ बैले नृत्य के लिए मशहूर है। वहां थिरक रही नर्तकी की ओर जब भी नजर उठती, तो उसकी आंखों में सूनेपन का समंदर ठहरा हुआ पाता। चकाचौंध भरी जगहों पर परिचारकों और प्रस्तुतकर्ताओं की आंखों में अक्सर ऐसे भाव दिखाई दे जाते हैं। तब तक मालूम न था कि कुछ मिनट बाद ऐसा दृश्य सामने आने वाला है, जो स्मृतियों के खंडहरों में अपनी स्थायी जगह बना लेगा। 
भोज समाप्त कर हम एयरकंडीशंड गाड़ियों में सवार हो मोस्क्वा नदी की ओर बढ़ चले थे। चौड़ी सड़कों के दोनों ओर गगनचुंबी इमारतें पसरी हुई थीं। एक लालबत्ती पर गाड़ी रुकी और अचानक बगल की गली में मेरी नजर पड़ी। कमान जैसी झुकी कमर लिए एक बुजुर्ग महिला छड़ी के सहारे खरामा-खरामा किसी तरह आगे बढ़ने की कोशिश कर रही थी। मॉस्को को जानने वाले जानते हैं कि मध्य नवंबर का वक्त वहां कितना सर्द होता है। बर्फ पड़नी शुरू हो चुकी थी और बर्फीली हवाएं बदन को चीरे डाल रही थीं। ऐसे में किसी तरह खुद को आगे धकेलती वृद्धा के दोनों ओर बहुमंजिला इमारतों के  साए मानो उसे लीले जा रहे थे। कवि दुष्यंत दिमाग के बंद दरवाजे भड़भड़ाने लगे थे- ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा, मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा। तीन दिन पहले हम संपदा का त्योहार दिवाली मनाकर नई दिल्ली से उडे़ थे। मॉस्को वह शहर है, जहां संसार के सर्वाधिक नवधनाढ्य रहते हैं। पूंजीवाद ने सिर्फ इस मुल्क के समाजवाद को नहीं लीला, बल्कि उस वृद्धा जैसे लाखों लोगों को आफतों के अनंत साए में धकेल दिया है।  
अगला वाकया दिल्ली में पेश आया। पांच साल बाद लगभग वैसा ही दृश्य दिवाली से दो दिन पहले देश की राजधानी में देखने को मिला। मैं रांची से देर शाम की उड़ान से लौटकर घर की ओर निकला था। चाणक्यपुरी के एक पंच सितारा होटल के ठीक बगल वाली सड़क पर मैंने मजदूर मां को अपने पांच-छह साल के बच्चे के साथ तेज कदमों से घर लौटते देखा। राजनयिकों और रईसों की इस रिहाइश में गरीबों के डेरे न जाने कितनी दूर और कहां हैं? पता नहीं, तेज भागती गाड़ियों के बीच उन्हें कितनी और देर कदम घसीटने थे? लगता था कि हेडलाइट्स की चुंधियाती रोशनी पर परत की तरह जमे ऊंची इमारतों की परछाइयों के बोझ में वे मां-बेटे दबे जा रहे हैं। 
तब से अब तक गंगा, यमुना, दजला, फरात, मोस्क्वा, राइन और इन जैसी दुनिया भर की तमाम नदियों में न जाने कितना जल बह गया, लेकिन विषमता की खाई कम होने के बजाय विकराल होती चली गई। इस दौरान कुछ अच्छी खबरें अवश्य आईं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपनी ताजा रिपोर्ट में भारत की अनुमानित विकास दर को कुछ कम करने के बावजूद मंदी से खुद को बचा सकने में सक्षम आंका। यही रिपोर्ट बताती है कि साल 2028 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसी तरह, संयुक्त राष्ट्र का पिछले हफ्ते प्रकाशित हुआ सर्वेक्षण कहता है कि 2005-21 के बीच भारत में 41.5 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से ऊपर उठाए गए। यकीनन, कोविड और दुनिया भर में मची उथल-पुथल के बावजूद मोदी सरकार ने हिम्मत और हौसले को कायम रखा है। हालांकि, असमानता की खाई हमारे यहां भी पांव पसार रही है। इस पर नजर रखनी जरूरी है। 
स्वदेशी का मॉडल इस महादुर्दशा से उबारने में कामयाब हो सकता है। वजह? हिन्दुस्तान के गांव और कस्बे अभी तक ऊर्जा रहित नहीं हुए हैं। आपको आंख खोलने वाला एक उदाहरण देता हूं। देश की सर्वाधिक प्रति-व्यक्ति आय का गौरव रखने वाले छोटे-बड़े प्रमुखतम शहरों में गुजरात का छोटा कस्बाई शहर मोरबी है। बरसों पहले शामली गया था। वहां के लोगों ने कहा था, प्रति-व्यक्ति आयकर देने के मामले में हम बेंगलुरु से आगे हैं। मैंने कभी इस दावे को आंकड़ों की कसौटी पर नहीं कसा, मगर इसमें दो राय नहीं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस कस्बे के लोग अपने दम-खम पर यकीन रखने वाले थे। खुद पर यकीन रखने वालों की हार नहीं होती। 
हमें बस इतना करना है कि समाज की निचली सीढ़ी पर बैठे लोगों के भरोसे को डिगने नहीं देना है। कोविड के दौरान सरकार ने उन्हें नि:शुल्क राशन दिया, जिससे उनमें भरोसा जागा कि हम सिर्फ राम-भरोसे नहीं हैं। अब उन्हें उनकी सरजमीं पर ही सक्षम बनाने की जरूरत है। हमें उनका  पलायन रोकना होगा। तीन वर्ष पूर्व जारी एक सरकारी सर्वे के अनुसार, प्रति मिनट 25-30 व्यक्ति रोटी-रोजगार या बेहतरी के लिए गांवों से शहर की ओर भाग रहे हैं। यही रफ्तार रही, तो देश की 60 करोड़ आबादी अतिशीघ्र शहरों में रहती पाई जाएगी। हमारे शहर पहले से ही जनसंख्या के बोझ से कराह रहे हैं। गंदे होते शहर और वीरान हो रहे गांव हमारा नसीब नहीं   सुधार सकते।
अब दुनिया के अन्य देशों पर नजर डाल लेते हैं। अमेरिका के चर्चित सांसद बर्नी सैंडर्स के अनुसार- ‘आज जब साठ प्रतिशत से अधिक अमेरिकी सिर्फ मासिक वेतन पर जी रहे हैं, तब केवल तीन लोगों के पास अमेरिकी समाज के निचले आधे हिस्से के मुकाबले अधिक दौलत है। शीर्ष के इन तीनों के पास नीचे के 16.5 करोड़ लोगों से ज्यादा संपत्ति है।’ यूरोप और चीन भी समान समस्या से जूझ रहे हैं।
मैं दिवाली के मौके पर आपका ध्यान इन डरावने आंकड़ों की ओर इसलिए खींचना चाहता हूं, क्योंकि हम हिंदू इस दिन लक्ष्मी के साथ कुबेर को पूजते हैं। क्यों? हिंदू धर्मशास्त्र के आधिकारिक विद्वान ‘भारत-रत्न’ पांडुरंग वामन काणे के मुताबिक, दिवाली का आरंभिक उल्लेख वात्स्यायन के कामसूत्र  में मिलता है, जहां इसका वर्णन यक्ष रात्रि के रूप में किया गया है। यक्ष-संस्कृति के नायक कुबेर हैं और कुबेर को निर्विवाद तौर पर धन का देवता कहा जाता है। 
कुबेर धन-संपदा के अधिपति अवश्य हैं, पर हमारी संस्कृति का एक और तत्व है- दरिद्र नारायण की सेवा। इसके बिना अकूत संपदा का स्वामी भी धनपति नहीं माना जाता। स्वामी विवेकानंद ने कहा था- ‘एकमात्र ईश्वर जिसका अस्तित्व है, एकमात्र ईश्वर जिस पर मैं विश्वास करता हूं, वह दीन-हीन व दुखी लोगों में निवास करता है और इनकी सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है।’
आज जब नए उभरते हर कुबेर के साथ हजारों दरिद्र पनप रहे हैं, तब सवाल उठता है कि इस खाई को कैसे पाटा जाए? हम भारतीय ऐसे असुविधाजनक प्रश्नों के उत्तर खुद खोजते आए हैं, आज नहीं तो कल इस पहेली को भी सुलझा ही लेंगे। इसी नेक उम्मीद के साथ आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं! 

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