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3 मार्च, 2021|11:43|IST

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असर-बेअसर के बीच आंदोलन

shashi shekhar

दिल्ली के दर पर डटे किसानों का आंदोलन चौथे महीने में प्रवेश कर रहा है। सरकार से उनकी बातचीत टूटे भी एक महीना बीत चुका है। वे जब आए थे, तब सर्दियां शुरू हो रही थीं, अब गरमी दस्तक दे रही है। मौसम बदल गया, पर हालात नहीं। यह ‘डेडलॉक’ कब तक चलेगा? क्या इसीलिए किसान ‘भारत बंद’ और ‘रेल रोको आंदोलन’ के जरिए दिल्ली के सत्ता-सदन पर दबाव बढ़ाना चाहते थे, ताकि रुकी हुई गाड़ी आगे बढ़ सके? हालांकि, अखिल भारतीय स्तर पर न ‘भारत बंद’ सफल हो सका और न ‘रेल रोको आंदोलन’। क्या इससे दोबारा  साबित नहीं हुआ कि यह संघर्ष महज कुछ उत्तर भारतीय प्रदेशों के किसानों का है? यह ठीक है कि तमिलनाडु, तेलंगाना और महाराष्ट्र के भूमिपुत्रों में भी इसी तरह का आक्रोश है, पर वे अभी तक सड़कों पर नहीं उतरे हैं। उधर, गाजीपुर, सिंघु और टिकरी सीमाओं पर भी भीड़ पहले के मुकाबले कम हो चली है। क्या इससे यह ध्वनि नहीं निकलती कि तीन महीने पुराना अहिंसक और अनूठा आंदोलन अपनी आब खो रहा है? इस निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
ऐसा कहने की सबसे बड़ी वजह यह है कि आए दिन जो ‘महापंचायतें’ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और हरियाणा के विभिन्न इलाकों में बुलाई जा रही हैं, उनमें भीड़ बढ़ती जा रही है। इन पंचायतों में अब राजनीतिक हस्तियों को भी शामिल होने का अवसर दिया जा रहा है। ऐसे में, क्या यह माना जा सकता है कि धरनारत किसानों की लड़ाई भले ही नए प्रदेशों तक न पहुंची हो, पर यह आंदोलन छह राज्यों के रहे-बचे भागों में पैर पसारता जा रहा है?  
दिल्ली के दर पर कम होती भीड़ को लेकर किसान नेताओं का दावा है कि शादियों के मौसम और खेतों में बढ़ते काम के कारण लोगों ने पालियां बना ली  हैं। एक दल जाता है, तो दूसरा उसकी जगह ले लेता है। हम लंबे आंदोलन के लिए तैयार हैं और हमारे हौसले में कोई कमी नहीं है। राकेश टिकैत तो यहां तक कहते हैं कि पूरे देश में किसान अपने हालात से असंतुष्ट हैं और अन्य प्रदेशों में भी बड़ी किसान रैलियां हो रही हैं, जिसमें मुझे भी शिरकत करने का अवसर मिल रहा है। क्या ऐसा संभव है कि दिल्ली जैसे धरने अब कुछ और राज्यों में भी देखने को मिलें? इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में है, पर पंजाब के नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने समूचे मसले को नया मोड़ दे दिया है। वहां गए बुधवार को कांग्रेस ने अभूतपूर्व जीत हासिल की और बरसों बाद अकालियों से अलग होकर लड़ने वाली भारतीय जनता पार्टी चौथे स्थान पर रही। यह जीत कितनी विकट है, इसे समझने के लिए कृपया इन आंकड़ों पर नजर डाल देखिए। नगर परिषद और नगर निगम के कुल 2,165 वार्डों में से 1,484 कांग्रेस, 294 शिरोमणि अकाली दल, 57 आम आदमी पार्टी और 47 में भाजपा को जीत मिली। कांग्रेस ने 68.5 प्रतिशत वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि अकाली दल 13.5 फीसदी, आम आदमी पार्टी 2.6 और भाजपा 2.1 फीसदी वार्डों में ही जीत हासिल कर सकी। कांग्रेस ने जहां 53 साल बाद बठिंडा नगर निगम पर कब्जा करने में सफलता हासिल की, वहीं भाजपा अपने गढ़ों तक को गंवा बैठी। गुरदासपुर से सन्नी देओल सांसद हैं, वहां भी पार्टी को भयंकर दुर्गति का सामना करना पड़ा। ये नतीजे आम आदमी पार्टी को भी आत्ममंथन पर मजबूर करते हैं।  
क्या निकाय चुनावों ने अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों की पटकथा लिखनी शुरू कर दी है? ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। 2017 में कांग्रेस यहां  विजयी हुई थी, पर 2015 के निकाय चुनावों के नतीजे अधिकांशत: अकाली-भाजपा गठबंधन के पक्ष में रहे थे। राजनीति संभावनाओं का खेल है और पता नहीं, कब हवा का रुख किस ओर मुड़ जाए! यहां जो लोग अति उत्साह में भाजपा की विदाई के गीत गाने लगे हैं, उन्हें याद दिलाता चलूं कि केरल में भी दिसंबर, 2020 में स्थानीय निकायों के चुनाव हुए थे, जिनमें कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे को शिकस्त मिली और सत्तारूढ़ वाम मोर्चा आगे रहा था। वैसे, केरल और पंजाब के हालात में जमीन-आसमान का अंतर है। उत्तर भारत की तरह वहां किसान आंदोलनरत नहीं हैं और भाजपा भी लड़ाई से बाहर है। किसान असंतोष के राजनीतिक फलितार्थ का दूसरा उदाहरण राजस्थान है। पिछले माह हुए नगर निकाय चुनावों में वहां कांग्रेस ने बाजी मारी थी। इस प्रदेश के भी एक हिस्से में किसान आंदोलनरत हैं। ऐसे में, यह मान बैठना कि इतना बड़ा आंदोलन कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं छोडे़गा, समझदारी नहीं होगी। इस अवधारणा का अगला इम्तिहान उत्तर प्रदेश में होगा। उच्च न्यायालय के आदेश के चलते उत्तर प्रदेश में पंचायतों के चुनाव 30 अप्रैल से पहले कराए जाने हैं। देश के सबसे बडे़ इस सूबे में इन चुनावों के कुछ ही महीने बाद विधानसभा चुनाव भी हैं। कहने की जरूरत नहीं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस वक्त कृषक असंतोष का ‘एपिसेंटर’ बना हुआ है। राकेश टिकैत भी यहीं से आते हैं और उनके स्वर्गीय पिता के वक्त से किसान अपने हक-हूकुक की लड़ाई लड़ने के आदी रहे हैं। यही वजह है कि बुधवार को एक तरफ पंजाब से चुनाव परिणाम आ रहे थे, दूसरी तरफ दिल्ली में केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के यहां पश्चिमी उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण भाजपा नेताओं की बैठक चल रही थी। बालियान के यहां तय हुआ कि भाजपा नेता किसानों के बीच जाकर अपनी बात रखेंगे, नए कानूनों के लाभ समझाएंगे, पर उनका रास्ता आसान नहीं साबित होने जा रहा।  
ऐसा कहने की सबसे बड़ी वजह यह है कि संजीव बालियान जब नई दिल्ली में मीटिंग कर रहे थे, उसी दौरान मुजफ्फरनगर में होने वाली मासिक पंचायत में भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ललकार रहे थे कि जो सरकार हमें दाम नहीं दे रही, उसके नेताओं को शादी-ब्याह के निमंत्रण देना बंद करो। यह एक तरह से सामाजिक बहिष्कार का आह्वान है। तय है, भाजपा के जिस ‘मुजफ्फरनगर मॉडल’ ने 2014 से अब तक उसकी जानदार जीत की राह हमवार की है, उस पर खतरा मंडरा रहा है। प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और मायावती ने भी इसीलिए अपने-अपने दांव आजमाने शुरू कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी को भी उत्तर प्रदेश में अपने लिए संभावना नजर आ रही है।  क्या आर्थिक वजहों से उदित होने वाले सामाजिक आंदोलन का यह राजनीतिक अवसान है?

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 21 february 2021