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11 अक्तूबर, 2020|11:54|IST

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पहाड़ सी पीड़ाएं और उबलते पीड़ित

हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया है। वह गए गुरुवार तक केंद्रीय काबीना में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री का पद संभाल रही थीं। कौर पंजाब के किसानों के बीच पनप रहे असंतोष से खफा हैं। हालांकि, उनकी पार्टी अकाली दल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में बनी रहेगी। मुझे उनकी नीयत पर कोई संदेह नहीं, पर जब इस्तीफा देना ही था, तो सच्चे मन और समूची कर्तव्य भावना के साथ दिया जाना चाहिए था। उन्होंने जो किया, उसे ‘पॉलिटिकल पोजीशनिंग’ कहते हैं। आप याद करें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले कार्यकाल में शिवसेना और तेलुगूदेशम पार्टियों ने ऐसा ही प्रहसन रचा था। उनके शीर्ष नेता ‘दिल्ली दरबार’ की आलोचना करते थे, पर उनके मंत्री केंद्रीय काबीना में भी बने रहते थे। नायडू के अलंबरदारों ने आंध्र प्रदेश के चुनाव से कुछ ही माह पहले इस्तीफे दिए। समूचा लाभ उठाने के बाद बलिदान का यह स्वांग मतदाताओं ने नकार दिया। तेलुगूदेशम इस समय सियासत की निचली सीढ़ी पर मायूस बैठी है। इसके उलट शिवसेना के मंत्री तो अंत तक साथ रहे। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और मौका पाते ही दूसरी राह पकड़ ली। इसे कहते हैं, ‘आम के आम गुठलियों के दाम’।

यह बताने की जरूरत नहीं कि अकाली दल अगर वास्तविक विरोध करना चाहता है, तो उसे ‘आधा इधर और आधा उधर’ की स्थिति से मुक्ति पानी होगी। सत्तापरस्त राजनीति में धरती-पुत्रों के हक-हुकूक के लिए कुरसी त्यागने के बहुत कम उदाहरण हैं। यहां मैं राममनोहर लोहिया का आदरपूर्वक  स्मरण करना चाहूंगा। 1954 में त्रावणकोर (अब केरल) में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की खिचड़ी सरकार बनी थी। आजाद भारत की पहली गैर-कांग्रेस सरकार! उन दिनों वहां तमिल बहुल इलाकों को मद्रास सूबे में मिलाने को लेकर आंदोलन भड़का हुआ था। 11 अगस्त, 1954 को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस ने दो जगह फार्यंरग कर दी, जिनमें 15 लोग मारे गए। इनमें छात्र और किसान भी शामिल थे। लोहिया प्रसोपा के महासचिव थे और उन दिनों नैनी जेल में थे। उन्होंने अगली सुबह ही टेलीग्राम भेज मुख्यमंत्री थानू पिल्लई से इस्तीफा मांग लिया था। मुख्यमंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया, तो लोहिया ने खुद महासचिव पद त्याग दिया। अंतत: इस सवाल पर पार्टी टूट गई और चंद माह बाद ही वह सरकार गिर गई। 

किसानों की सदियों पुरानी दुर्भाग्य-गाथा में बरस-दर-बरस इसीलिए नए अध्याय जुड़ते रहे हैं, क्योंकि जिन हुक्मरानों को उन्होंने सिर-माथे पर रखा, वे उनके साथ पूरे मन से कभी नहीं रहे। यह त्रासदी नहीं तो और क्या है कि भारत को कृषि-प्रधान देश कहा जाता है, परंतु कृषि-क्रांति के मामले में आजाद भारत के पास सफलता का अभी तक सिर्फ एक मॉडल है। दूसरी हरित क्रांति की बात जरूर की जाती रही है, पर उसे सिरे तक पहुंचाने के लिए आवश्यक दृढ़ संकल्प की कमी रह गई।

मैं खुद गंगा-यमुना के दोआब से आता हूं। मैंने अपने सामने तमाम परिवारों को उजड़ते हुए देखा है और इसका सबसे त्रासद उदाहरण तो पिछले महीनों में सामने आया। कोरोना की वजह से जब लाखों लोग अपने गांव की ओर लौटे, तो उनके पुरखों की भूमि उन्हें शरण देने में नाकामयाब रही। शहरों के बाद वे अपने घर में भी दुत्कारे गए। कारखाने बंद और कृषि उन्हें पालने में सक्षम नहीं। आज वे न घर के हैं, न घाट के। अब मौजूदा विवाद पर आते हैं। केंद्र सरकार ने कृषि सुधारों के तर्क के साथ दो विधेयक पास किए हैं। कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवद्र्धन व सरलीकरण) विधेयक के अंतर्गत किसान अपनी उपज कहीं भी बेच सकेंगे। कृषक (सशक्तीकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक के तहत सरकार का दावा है कि किसानों की आय बढ़ेगी, बिचौलिए खत्म होंगे और आपूर्ति शृंखला तैयार होगी। इससे पहले ‘आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक’ पारित किया जा चुका है, जिसमें प्रावधान है कि अनाज, दलहन, खाद्य तेल, आलू, प्याज अनिवार्य वस्तु नहीं रहेंगे। इनका भंडारण किया जा सकेगा। हुकूमत मानती है कि इससे कृषि क्षेत्र में विदेशी निवेश आकर्षित होगा।

इन विधेयकों के विरोध में तर्क दिए जा रहे हैं कि मंडियां खत्म हो गईं, तो किसानों को एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा, जबकि समूचे देश में समान एमएसपी होना चाहिए। इसी तरह, कीमतें तय करने की कोई प्रणाली नहीं है। लोगों में डर है कि इससे निजी कंपनियों को किसानों के शोषण का जरिया मिल जाएगा और किसान अपने ही खेत में मजदूर बनकर रह जाएंगे। कारोबारी जमाखोरी करेंगे और खाद्य कीमतों में अस्थिरता आएगी। इससे खाद्य सुरक्षा खत्म हो जाएगी और आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी बढ़ सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी आदत के अनुसार विरोधियों को दृढ़तापूर्वक जवाब दिया है कि एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था कायम रहेगी। मोदी का आरोप है कि दशकों से जिन लोगों ने कुछ नहीं किया, वे किसानों को भरमा रहे हैं। उनकी अगुवाई में कुछ राज्य सरकारों ने किसानों को खरीद का उचित मूल्य दिलवाने में बेहतरीन काम भी किया है। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने पिछले दो वर्षों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत 21,889 करोड़ रुपये किसानों में बांटे। 

यह बात अलग है कि बरसों के असंतोष और असुरक्षा से डरे किसान आसानी से आंदोलित हो जाते हैं। उनकी असुरक्षा की भावना भी नाजायज नहीं है। देश के लगभग 86 फीसदी भूमि पुत्रों के पास दो हेक्टेयर से भी कम जोत है। ऐसे में, भला कौन परिवार का पेट पाल सकता है? कोई आश्चर्य नहीं कि किसानों की आत्महत्या के आंकडे़ खौफ पैदा करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, पिछले साल 42,480 किसानों और दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की। हालांकि, केंद्रीय कृषि मंत्री ने गुजरे मंगलवार को ही लोकसभा में कहा कि किसानों की आत्महत्या के राज्यवार आंकडे़ 2016 के बाद से उपलब्ध नहीं हैं।

आंकडे़ जो बोलें, न बोलें, पर यह सच है कि पंजाब, हरियाणा, आंध्र और तेलंगाना के गांव उबल रहे हैं। महाराष्ट्र में तो पहले ही कृषक बड़े-बड़े प्रदर्शन कर चुके हैं। तय है, किसानों के लिए अब तक किए गए उपाय काफी नहीं साबित हो रहे। केंद्र और राज्यों की सरकारों को इस पर तुरंत ध्यान देना होगा। 

हमें भूलना नहीं चाहिए कि देश इस समय अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। चीन सीमा पर तनाव, कोरोना का जानलेवा डंक और खस्ताहाल माली हालात ने तमाम आशंकाएं जन दी हैं। ऐसे विकट समय में देश के भीतर ऐसी अशांति का माहौल घातक साबित हो सकता है।

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 20 september 2020