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संपादकीयदर्द की दूसरी दास्तां से गुजरते हुए

शशि शेखरPublished By: Manish Mishra
Sun, 18 Apr 2021 10:43 AM
दर्द की दूसरी दास्तां से गुजरते हुए

कहा जाता है- ‘यदि आज हालात बेकाबू हो रहे हों, तो अपने अतीत पर नजर डालें’। मतलब, कठिन समय में लिए गए पुरखों के फैसलों के फलितार्थ आपको रास्ता सुझा देंगे। कोरोना के दूसरे दौर ने जो तबाही इस समय हमारे मुल्क में मचा रखी है, उसने हुक्मरानों के हाथ-पांव फुला दिए हैं। इसके बावजूद उन्हें इतिहास के सबकों पर नजर डालने की जरूरत नहीं महसूस हो रही। नतीजा सामने है। शनिवार तक भारत में 1,45,26,609 लोग इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ चुके थे और 1,75,673 लोग अपने प्राणों से हाथ धोने पर मजबूर हो गए थे। मैं इस विरल वक्त में हुक्मरानों को अतीत की पोथियों में दर्ज एक महागाथा से रूबरू कराना चाहता हूं। यह कथा हमारे जैसे आम जन के लिए भी जरूरी है। वह ईस्वी सन 1918 के सितंबर की 28वीं तारीख थी। अमेरिका के पेंसिल्वेनिया सूबे के फिलाडेल्फिया शहर में पहले विश्व युद्ध के लड़ाकों की आर्थिक मदद के लिए ‘लिबर्टी लोन परेड’ का आयोजन किया गया था। बौद्धिक लोग इस आयोजन का विरोध कर रहे थे। उनका मानना था कि स्पेनिश फ्लू का हमला अभी बीता नहीं है। ऐसे में, भीड़ भरा आयोजन आपदाओं के नए सिलसिले को दावत दे सकता है। फिलाडेल्फिया के सार्वजनिक स्वास्थ्य निदेशक विल्मर क्रूसेन ने इस दबाव को दरकिनार करते हुए परेड की इजाजत दे दी। मामला देशभक्ति का था, लिहाजा दो लाख लोग उमड़ पडे़। अंजाम वही हुआ, जिसकी सयानों को चिंता थी। अगले कुछ दिनों में 47 हजार नए लोग संक्रमित पाए गए और इनमें से 12 हजार जिंदगी का जुआ हार बैठे। स्पेनिश फ्लू की दूसरी लहर ने 25 से 35 बरस के जवानों पर बेरहमी से कहर बरपाया  था। उस दौर में अकेले अमेरिका में सिर्फ अक्तूबर महीने में 1 लाख, 95 हजार लोग मारे गए थे। 
उधर जानलेवा विश्व युद्ध जारी था। किसी भी कीमत पर जीत के लिए मतवाले दुनिया के अन्य देश भी ‘क्वारंटीन’ जैसे अहम बचाव को नजरअंदाज कर नौजवानों को मोर्चों की ओर रवाना किए जा रहे थे। हम हिन्दुस्तानी उस समय बरतानिया सरकार की मिल्कियत थे। कहने की जरूरत नहीं कि अग्रिम मोर्चों पर हमारे नौजवानों को दोहरी लड़ाई में झोंका जा रहा था। उन्हें ब्रिटेन के दुश्मनों के साथ-साथ फ्लू से भी जूझना था। कहते हैं, उस फ्लू ने दो से पांच करोड़ लोगों की जान ली। हालात इतने खराब हो चुके थे कि ताबूत बनाने वाली कंपनियां भी हाथ खडे़ कर गई थीं। जरा उस त्रासदी को आज की घटनाओं से जोड़कर देखें। बीते सितंबर में कोरोना का पंजा जरा-सा ढीला क्या पड़ा, हमारी हुकूमतें अपनी वाहवाही में जुट गईं। कोई टीके के निर्माण से खुश था, तो किसी को आर्थिक स्थिति पटरी पर लौटती नजर आ रही थी। कहीं पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा था, तो कहीं कुंभ के आयोजन पर बल था। इसी दौरान, पांच राज्यों में चुनाव भी होने थे। शीर्ष से लेकर सामान्य तक, सभी नेता लोगों को अपने पक्ष में लाने के लिए चुनावी रैलियों में जुट गए। ऐसे में, कोई सुविज्ञ यह कहने की कोशिश करता कि कृपया सावधानी बरतें, तो तत्काल उसका उपहास उड़ा दिया जाता। उन डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की चेतावनियां भी दरकिनार कर दी गईं, जिनका गला यह बताते-बताते सूख गया था कि जनाब, अभी दूसरी लहर आपका इंतजार कर रही है। उधर, कोरोना किसी परी कथा के दानव की तरह जैसे भारत के बेटे-बेटियों के खोल से बाहर आने का इंतजार कर रहा था। इस बार वह दोगुनी ताकत से टूटा। पहले बडे़-बूढे़ इसका निशाना बन रहे थे, अब पांच दिन के नवजात से लेकर तमाम दशक जी चुके लोग समान रूप से इसकी चपेट में हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमर टूट चुकी है। वेंटिलेटर कम पड़ गए हैं, ऑक्सीजन व जरूरी दवाओं का टोटा है, और अस्पतालों में गंभीर मरीजों के लिए भी जगह नहीं है। इसके दारूण नतीजे सामने हैं।
कल तक हम अमेरिका, ब्राजील या इटली में दफनाए जाने के लिए यत्र-तत्र रखे गए शवों का दृश्य देख सिहर उठते थे। अब हमारे शहर उसी श्रेणी में जा खड़े हुए हैं। काशी के हरिश्चंद्र घाट से झकझोर देने वाली खबर आई कि वहां पिछले हफ्ते इतनी लंबी लाइन लग गई थी कि लोगों के लिए अपने परिजनों को चिता पर चढ़ाने का इंतजार भी दुरूह लग रहा था। खुद संक्रमण की चपेट में न आ जाएं, इस डर से उन्होंने ‘डोम राजा’ के वंशजों से पूछा कि दाह-कर्म पर कितना खर्च आएगा। मुंहमांगे रुपये चुकाए और वहां से रुखसत हो लिए। सुदूर सूरत में एक दिन में इतने शव जलाने पडे़ कि विद्युत शवदाह गृह की भट्ठियों की चिमनियां पिघल गईं। रायपुर में भी औसतन 55 शवों का अंतिम संस्कार प्रतिदिन हो रहा है। लखनऊ में धू-धू करती चिताओं की लंबी कतार सोशल मीडिया पर वायरल है। लोग दोबारा ऐसा न कर सकें, इसके लिए नगर-निगम ने श्मशान घाट के बाहर टीन की आड़ खड़ी कर दी। निगम अधिकारियों का कहना था कि ऐसा इसलिए किया गया, ताकि शवों को जलता देख लोग ‘विचलित’ न हों। देश की राजधानी दिल्ली में भी अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए लोगों को पांच से आठ घंटे इंतजार करना पड़ रहा है। उत्तर और पश्चिम भारत के तमाम शहरों की यही दुर्दशा-गाथा है। ऐसे में, यह सवाल उठना लाजिमी है कि चुनावों और धार्मिक आयोजनों में मस्त हमारा राजनीतिक वर्ग महामारी के ‘लीन पीरियड’ में क्या रहा-बचा इंतजाम नहीं कर सकता था? उसे तो मालूम था कि दूसरी लहर आने वाली है। होना यह चाहिए था कि हम अपने अस्पतालों को सुसज्जित करते और प्रयोगशालाओं की तादाद में बढ़ोतरी को बल देते। अगर सरकार के पास संसाधन नहीं थे, तो वह निजी कंपनियों को आवश्यक नियम-कायदों के साथ न्योता दे सकती थी। जब अन्य क्षेत्रों में निजीकरण को बढ़ावा दिया जा सकता है, तो इस क्षेत्र में क्यों नहीं? ऐसा नहीं हो सका। अब, जब दूसरी लहर अपने चरम की ओर बढ़ रही है, तब हमें यह भी जानने की जरूरत है कि स्पेनिश फ्लू ने तीन बार हमला किया था। हो सकता है कि कोरोना के भी एक-दो दौर शेष हों। कहने का आशय यह है कि जो सितंबर से फरवरी के बीच में नहीं किया जा सका, उसे अब कर लेना चाहिए। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को इस सिलसिले में समझदार पहल की। उन्होंने स्वामी अवधेशानंद को फोन कर कुंभ को अब प्रतीकात्मक रखने की प्रार्थना की। यह जरूरी था। उत्तराखंड में इस दौरान कोरोना के प्रसार में 90 गुणा की वृद्धि दर्ज की गई। ज्यादातर संतों ने प्रधानमंत्री का अनुरोध मान लिया है। इससे इस प्राणघाती सिलसिले को रोकने में मदद मिलेगी। इसके उलट चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत मतदान कराने का निर्णय किया है। उन्मुक्त प्रचार की वजह से पश्चिम बंगाल में संक्रमण की दर 560 फीसदी तक बढ़ गई है और अभी तीन दौर के मतदान बाकी हैं। संक्रमण-प्रसार के ये आंकडे़ चेताते हैं, अगर अभी निर्णायक कदम न उठाए गए, तो बंगभूमि के हालात भी बेकाबू हो सकते हैं। ऐसे में, इतिहास किन-किन को विल्मर क्रूसेन की पंक्ति में खड़ा करेगा, बताने की जरूरत नहीं। 

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