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4 मार्च, 2021|4:19|IST

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अब यह बिगड़ी बात बननी चाहिए

shashi shekhar

केंद्र सरकार और किसानों के बीच बातचीत के नौवें दौर में महज यही सहमति बन सकी कि हम 19 जनवरी को अगली बातचीत के लिए मिलेंगे। यह अनोखा आंदोलन है। यहां दोनों पक्ष समझौते का सुर अलापते हुए भी अपने-अपने कौल पर दृढ़ता से डटे हुए हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों कानूनों पर अमल स्थगित कर दिया, फिर भी लड़ाई जारी है। सरकार और आंदोलनकारी, दोनों शायद एक-दूसरे के धीरज की परीक्षा ले रहे हैं कि कौन पहले पलक झपकाए?
इस इंतजार में दोनों पक्ष जीत हासिल करने के लिए अलग-अलग दांव इस्तेमाल कर रहे हैं। सत्ता-सदन में बैठे लोग शायद किसानों को इतना थका देना चाहते हैं कि वे तीनों कानून वापस लेने की जिद से संशोधनों तक उतर आएं। उधर, किसान संगठन 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च के लिए आस्तीनें चढ़ा रहे हैं। सरकार पर दबाव बनाने का यह उनका अपना तरीका है। मैं मनाता हूं कि तब तक कोई न कोई हल जरूर निकल आए, पर ऐसा न हुआ तो? इस सवाल के जवाब पर विचार करने में भी डर लगता है। कोई नहीं चाहता कि ये अनूठा आंदोलन अग्नि शिखाओं में घिरकर समाप्त हो। महीनों पुरानी इस कशमकश में हजारों की संख्या में लोग राष्ट्रीय राजधानी की चार सीमाओं पर डटे हुए हैं। 50 दिन से अधिक बीत जाने के बावजूद उन्होंने न धीरज खोया है, न आपा। वे जब आए थे, तब मौसम अंगड़ाई ले रहा था, पर इस दौरान सर्दी समूची बेरहमी से उन पर टूटी। बेमौसम की बारिश ने तमाम मुश्किलें खड़ी कीं, पर वे टस से मस न हुए। अलग-अलग स्थानों से विभिन्न प्रवृत्तियों के व्यक्ति जब इकट्ठा होते हैं, तब इतनी मुश्किलात के बावजूद उन्हें लंबे समय तक एकजुट रख पाना मुश्किल होता है, पर इन किसानों ने साबित कर दिखाया कि धरती से उन्हें धीरज भी विरासत में मिला है। इस दौरान कुछ संगठनों ने किसानों के संघर्ष को ‘हाईजैक’करने की कोशिश की। कहीं ऐसे पोस्टर दिखाई पड़े, जिन पर लोगों को आपत्ति थी, तो कुछ अन्य लोगों ने ऐसी बातें कहीं, जो किसी भी भारतवासी को अखर सकती हैं। किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संगठनों ने इनकी पहचान कर आनन-फानन में इनसे छुटकारा पा लिया। यही नहीं, इन लोगों ने धर्म, समाज और तात्कालिक आवश्यकता का ऐसा रसायन तैयार करने में सफलता प्राप्त की, जो इतनी बड़ी संख्या में लोगों को जोडे़ रखने में कामयाब रहा। किसान संगठनों का दावा है कि अब तक 75 से अधिक लोग धरना स्थल पर दम तोड़ चुके हैं। आमतौर पर ऐसी स्थिति में उत्तेजना फैल जाती है, पर ऐसा नहीं होने दिया गया। यही नहीं, कुछ किसानों और संतों ने आत्महत्या कर ली, तो उसे भी बहुत प्रचारित नहीं किया गया, ताकि अन्य लोगों में यह प्रवृत्ति न फैले।
इस बीच सिंघु बॉर्डर पर तो सचल गुरुद्वारे तक की स्थापना कर दी गई। संघर्ष के दौरान धर्म लोगों को एक रखने और हौसला जुटाने में मददगार साबित होता है। यही नहीं, पुलिस और सुरक्षा बल भी कार्रवाई के दौरान धार्मिक स्थलों से दूरी बरतते हैं। जहां गुरुग्रंथ साहिब स्थापित हों, वह स्थान अपने आप में पवित्र और पूज्य माना जाता है। आंदोलनकारियों ने आस्था और भक्ति का उपयोग धरनारत लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए किया। धरना स्थल पर बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे भी मौजूद हैं। इससे इस जद्दोजहद को अलग पहचान मिलती है और मीडिया का भी अधिक ध्यान आकर्षित होता है। किसान नेताओं ने इसका भी ध्यान रखा कि आस-पास के मोहल्ले और गांव वाले ज्यादा परेशान न हों। उनका अमन-चैन कायम रहे, इसके लिए स्वयंसेवकों ने जान लगा दी। नतीजतन, उन्हें जन-सहयोग मिलना शुरू हो गया। यदि वे इसे नहीं जुटाते, तो सरकार का काम आसान हो जाता। ये निस्संदेह बड़ी उपलब्धियां हैं, पर क्या इतना काफी है?
मैं विनम्रतापूर्वक कहता आया हूं कि हर आंदोलन की एक मीयाद होती है। जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचता जाता है, उसके प्रति लोगों का आकर्षण कम होता जाता है। इस देश में अहिंसात्मक आंदोलनों को स्थापित किया था मोहनदास करमचंद गांधी ने। गांधी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वह समझते थे, किस संघर्ष को कब और कितना खींचा जाना चाहिए। वह सही समय पर सम्मानपूर्वक कदम खींचने के बावजूद अपनी मांगों को जिंदा रखने में कामयाब रहते थे। किसानों को इससे सीखना चाहिए। शायद एक नेता अथवा संगठन न होने की वजह से तमाम कामयाबियों के बावजूद इस संभावना पर विचार नहीं किया जा सका है। इसके अलावा और भी चिंताएं हैं, जिन्हें मैं अपने पिछले स्तंभों में विस्तार से रेखांकित कर चुका हूं। उनका दोहराव अनुचित होगा।
इन संगठनों को यह भी सोचना चाहिए कि इतने लंबे आंदोलन से आस-पास के उद्योग-धंधों पर असर पड़ता है, राजमार्गों की गति धीमी होती है। इसका देश के विकास से सीधा नाता है। वे एमएसपी जारी रखने की मांग पर भले कायम रहें, पर उन्हें भूलना नहीं चाहिए कि इस प्रणाली के बावजूद पिछले दस सालों में उनके एक लाख 10 हजार से अधिक बंधुओं ने आत्महत्या की है। हर रोज दो से ढाई हजार धरती-पुत्र अपनी मिट्टी छोड़कर दूर-दराज के शहरों में मजदूरी के लिए बाध्य हो रहे हैं। अगर मौजूदा व्यवस्था इतनी ही कारगर थी, तो फिर हमारे गांव उजड़ते क्यों चले गए? मैं किसानों के साथ समूची सहानुभूति रखते हुए भी यह कहने की इजाजत चाहूंगा कि हर प्रणाली में संशोधन की जरूरत होती है। इसके अभाव में वे दम तोड़ बैठती हैं। आज अगर खेतों की संतानें जलावतनी को मजबूर हैं, तो यकीनन कृषि-व्यवस्था में सुधार जरूरी हैं। जब भी कुछ बदलाव किए जाते हैं, तो विवाद उठना स्वाभाविक है। इतने बडे़ देश में सभी भला एकमत कैसे हो सकते हैं? यही वजह है कि संविधान भी विरोध की इजाजत देता है। किसानों  ने इस अधिकार का बहुत अच्छे तरीके से प्रयोग किया, पर अब उन्हें भी बीच की राह निकालने के बारे में सोचना चाहिए। इसके साथ ही सरकार को भी इन लोगों को समझाने-बुझाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। लंबे आंदोलन कभी-कभी बडे़ अहित रच जाते हैं। मई 1974 की रेल हड़ताल इसका उदाहरण है। इसके बाद इंदिरा गांधी आत्मविश्वास खो बैठी थीं और हड़बड़ाकर आपातकाल देश पर थोप दिया था। मैं ऐसा कतई नहीं कह रहा कि दोबारा ऐसा हो सकता है, पर यह सच है कि असंतोष का लंबा प्रदर्शन अव्यवस्था और अलगाव को बल देता है। सरकार ने अपनी ओर से काफी कोशिशें की हैं, पर अब यह सोचना  जरूरी हो गया है कि अगले प्रयास निष्फल न साबित हों। लगातार खिंचता ‘डेडलॉक’किसी के हित में नहीं।

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 17 january 2021