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परीक्षा तो मतदाता की भी है

हमारे सत्तानायक सिर्फ जन-हितकारी कार्यों के बूते पर चुनाव लड़ने का साहस क्यों नहीं जुटा पाते? इस सवाल का जवाब नेताओं को नहीं, भारतीय मतदाताओं को देना होगा। वे राजनेताओं की इस कुटैव के प्रश्रयदाता...

परीक्षा तो मतदाता की भी है
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पिछले दिनों मैं एक ‘टीवी डिबेट’ में था। वह चैनल गुजरात चुनाव के मुद्दों, व्यक्तित्वों और बदलते हालात पर प्रतिदिन सर्वे करता है। उस दिन पेश किए गए सर्वे के नतीजे बता रहे थे कि साठ फीसदी लोग मानते हैं कि मोरबी की दुर्घटना एक बड़ा और असरकारी मुद्दा है। क्या राजनीतिक वर्ग उसको इसी संवेदना से लेता है? 
गुजरी 31 अक्तूबर का एक उदाहरण देता हूं। मोरबी दुर्घटना को अभी चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे। एक प्रमुख चैनल पर गरमागरम बहस चल रही थी। इसके दौरान कांग्रेस के प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल ने अपनी जिम्मेदारी का सही तौर पर निर्वाह नहीं किया। जवाब में हुकूमत की नुमाइंदगी कर रहे प्रवक्ता ने आरोपकर्ता पर ही आरोप जड़ दिया कि आपकी पार्टी ने पटेल का अपमान किया था। संयोग से सरदार पटेल की उस दिन जयंती थी। वह भूल गए थे कि पटेल को गुजरे 72 बरस हो चले हैं, जबकि मोरबी पुल के इस्पाती तार माचिस की तीलियों की तरह चंद घंटे पहले टूटे थे। 
नतीजतन, दर्जनों घरों के चिराग बुझ चुके थे और सौ से अधिक शव अस्पताल में औपचारिकताएं पूरी होने के इंतजार में पडे़ थे। ऐसे में, अतीत के अंधेरे बंद कपाट खोलने के बजाय सरकारी सहायता के ब्योरे और योजनाओं का खुलासा करना जरूरी था, मगर हमारे सियासी सूरमा तथ्य के बजाय खुद गढ़े गए कथ्य पर बल देते हैं। बाद में प्रधानमंत्री मोदी ने खुद मोरबी पहुंचकर सांत्वना, राहत, जांच और कार्रवाई की अगुवाई की। वह जब भरी आंखों से लोगों के आंसू पोंछ रहे थे, तब भी टेलीविजन पर वही उबाऊ तू-तू, मैं-मैं बुलंद थी। अपने राजनेताओं की मेहरबानी से हमने सत्य से अर्द्धसत्य की ओर बढ़ना तो आजादी के पहले से ही शुरू कर दिया था, पर अब सच और झूठ का अंतर आभासी हो चला है। सिर्फ सियासी सूरमा नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श में शामिल लोग भी इसके कुसूरवार हैं। हालांकि, भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने बाद में संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल शुरू कर दिया। शायद उन्हें भरोसा हो गया था कि दोषियों पर कठोर कार्रवाई के जरिये डैमेज कंट्रोल कर सकेंगे। बाद में जब भगवा दल ने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की, तो पता चला कि 38 विधायकों के टिकट कट गए हैं। इनमें मोरबी के विधायक भी शामिल हैं। सत्ता विरोधी लहर से निपटने का यह आजमाया हुआ राजनीतिक फॉर्मूला है।
इसके साथ ही पार्टी ने अपनी रणनीति में परिवर्तन भी किया। पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री मोदी ने नारा बुलंद किया, जिसमें उन्होंने सभा में शामिल हर व्यक्ति से कहलवाया- ‘आ गुजरात में बनाव्यु छे’(यह गुजरात मैंने बनाया है)। इस संदेश के गहरे राजनीतिक अर्थ हैं। प्रत्यक्ष तौर पर लगता है, जैसे यह गुजरात के विकास और उसके प्रति गुजरातियों की प्रतिबद्धता का नारा है, लेकिन परोक्ष तौर पर इससे यह भी साबित होता है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने गए 22 साल की हुकूमत में मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की हैसियत से इस प्रदेश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। मोदी खुद को मतदाता के स्वाभिमान से जोड़ते आए हैं। आपको याद होगा, सोनिया गांधी ने जब उन पर कुछ आरोप लगाए थे, तब उन्होंने गुजरात की सभा में कहा था कि यह मेरा नहीं, बल्कि 12 करोड़ गुजरातियों का अपमान है। इस बार भी उन्होंने यही दांव चला है। 
इसके जवाब में कांग्रेस अधिक हो-हल्ले के बिना जन-संवाद कार्यक्रम चला रही है, लेकिन अरविंद केजरीवाल खासे मुखर हैं। पिछले दिनों एक लाइव इंटरव्यू के दौरान उन्होंने एक पर्ची लिखी और एंकर के हाथ में थमा दी। उसमें लिखा था कि कांगे्रस इस बार पांच से भी कम सीट जीतेगी। इसके साथ ही उन्होंने दावा किया कि हम नंबर दो की पार्टी बन चुके हैं और अब नंबर वन बनना है। केजरीवाल ने यह भी कहा कि लोग कहते हैं, मेरे पास ‘ओटीपी’ का समर्थन है। ओटीपी, यानी ओबीसी, ट्राइबल और पटेल। केजरीवाल ‘वैकल्पिक राजनीति’ का दावा करते हुए चुनावी समर में उतरे थे। उन्होंने दस साल से भी कम समय में तीन बार दिल्ली और फिर पंजाब में धुआंधार जीत के साथ तमाम कीर्तिमान गढे़ हैं। इस दौरान उनकी भाषा और तेवर में खासा बदलाव आया है।
इसी बीच उनके करीबी मंत्री सत्येंद्र जैन और मीडिया सलाहकार भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों में सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं। जेल में बंद ‘महाठग’ सुकेश चंद्रशेखर आए दिन सत्येंद्र जैन सहित आप के आला नेताओं और अधिकारियों पर आरोपों की झड़ी लगा रहा है। यह ‘महाठग’ का कोई नया पैंतरा है या हकीकत? जवाब में अरविंद केजरीवाल ‘महाठग’ के चरित्र पर सवाल खड़ा करते हुए हमला बोलते हैं कि ऐसा मोरबी हादसे से ध्यान हटाने के लिए किया जा रहा है। लगभग इसी दृढ़ता से केजरीवाल ने अपने डिप्टी मनीष सिसोदिया का यह कहते हुए बचाव किया था कि उन्हें तो आम आदमी के बच्चों को स्तरीय शिक्षा मुहैया कराने के लिए ‘नोबेल प्राइज’ दिया जाना चाहिए। वह अपने आरोपग्रस्त सहयोगियों को भगत सिंह बताते हैं, जबकि भाजपा सिसोदिया और उनके सहयोगियों पर तथाकथित शराब घोटाले के आरोप लगाती है। सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है। 
यह सही है कि जब तक आरोप प्रमाणित नहीं हो जाते, तब तक किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता, पर राजनीति काजल की ऐसी कोठरी है कि इसमें जो भी घुसता है, खुद को कालौंच से बचा नहीं पाता। कालिख असली है या नकली, इससे फर्क नहीं पड़ता।
यहां मैं आपको सन 2014 के चुनाव से पहले प्रकाश में आए ‘2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले’ की याद दिलाना चाहूंगा। केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए और तमिलनाडु में डीएमके सरकार के पतन के पीछे यह तथाकथित घोटाला बड़ा कारण माना गया था। उस समय आम आदमी पार्टी और भाजपा के नेता, जो आज भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सींग से सींग भिड़ाए हुए हैं, मिलकर तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा के खिलाफ आरोपों के अंगारे बिछा रहे थे। सीबीआई ने राजा के साथ द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम के सर्वेसर्वा करुणानिधि की बेटी कनिमोई को भी महीनों के लिए जेल में बंद करवा दिया था। बाद में अदालत ने उन्हें साक्ष्य न मिलने के कारण बरी कर दिया। 
उस समय राजा, कनिमोई और कांग्रेस पर आरोप लगाने वाले क्या आज माफी मांगेंगे? 
यकीनन नहीं! आरोप-प्रत्यारोप हमारी राजनीति की प्राणवायु बन गए हैं। इससे सत्तानायकों के अच्छे काम भी धूमिल पड़ जाते हैं। मेरा मानना है कि मोदी हों या ममता, अरविंद हों या योगी आदित्यनाथ, शिवराज हों या नवीन पटनायक, नीतीश कुमार हों या केसीआर, इन सभी ने अगर दो या उससे ज्यादा बार लगातार चुनाव जीते हैं, तो कुछ बेहतरीन काम अपने मतदाताओं के लिए जरूर किए होंगे। इसके बावजूद हमारे सत्तानायक सिर्फ जन-हितकारी कार्यों के बूते पर चुनाव लड़ने का साहस क्यों नहीं जुटा पाते? इस सवाल का जवाब नेताओं को नहीं, भारतीय मतदाताओं को देना होगा। वे राजनेताओं की इस कुटैव के प्रश्रयदाता साबित हुए हैं। 
समय आ गया है, जब हमें अपने नेताओं से कहना ही होगा कि हम आपके काम और विचारों पर वोट करते हैं, नफरत या शोशेबाजी पर नहीं।  

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