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10 अक्तूबर, 2020|11:29|IST

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सिर्फ घात-प्रतिघात और संघात

बिहार अपनी ही रची राजनीति के प्रचलित मुहावरे को बदलता दिख रहा है। यह सिर्फ हर पांच बरस में होने वाला सत्ता-संग्राम मात्र नहीं है, तमाम  अकुलाहटों की तार्किक परिणति की शुरुआत भी यहीं से होनी है।
आप अगर इस चुनाव के तीन सर्वाधिक चर्चित युवा चेहरों पर नजर डालें, तो उनमें समानता के तमाम सूत्र नजर आएंगे। तेजस्वी यादव विपक्ष के सबसे बडे़ गठबंधन के नेता और मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। उनकी उम्र महज 30 वर्ष है। उनके पिता, यानी बिहार की राजनीति को विशिष्ट शैली प्रदान करने वाले लालू यादव सीखचों के पीछे हैं। उनकी अनुपस्थिति में तेजस्वी ने न केवल नए-पुराने द्वैत को संभाला, बल्कि गठबंधन के अन्य साथियों के दबाव का भी दृढ़तापूर्वक मुकाबला किया। वीआईपी के सुप्रीमो मुकेश सहनी से बात नहीं बनी, तो तेजस्वी ने उन्हें दरकिनार कर दिया। यह बात अलग है कि मुकेश सहनी को एनडीए ने लपक लिया। अब भाजपा उन्हें 11 सीटें अपने कोटे से प्रदान करने जा रही है। पुराने गठबंधन से रिश्ता टूटने के बाद सहनी को जो मिला, उससे उनका सियासी कद और बढ़ गया। यही हाल उपेंद्र कुशवाहा का हुआ। 
सहनी तो यूपीए से अलग हो गए, पर चिराग पासवान एनडीए में हैं भी और नहीं भी। वह दिल्ली में तो सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बने रहेंगे, पर बिहार में प्रधानमंत्री की सफलता की कामना के साथ एनडीए उम्मीदवारों के खिलाफ ताल ठोकेंगे। उन्होंने 143 सीटों पर लड़ने का एलान किया है। लोग आश्चर्यचकित हैं कि क्या उनकी पार्टी के पास इतने उम्मीदवार हैं भी? इस सवाल का जवाब धीमे-धीमे मिल रहा है। बीजेपी के दो कद्दावर नेता रामेश्वर चौरसिया और राजेंद्र सिंह उनकी पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे। आने वाले दिनों में बीजेपी व अन्य पार्टियों के कुछ और लोग उनसे हाथ मिला सकते हैं। चिराग ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर वह हिम्मत दिखाई है, जो उनके पिता स्वर्गीय रामविलास पासवान तक न दिखा सके। उनमें यह हौसला आया कहां से? यही वह मुकाम है, जहां आशंकारथी यह कहते नजर आते हैं कि बीजेपी के दोनों हाथों में लड्डू हैं। मुकेश सहनी उसके छाते के नीचे से जो काम करेंगे, वही चिराग एनडीए के दुर्ग से दूर रहकर करते नजर आएंगे।
भरोसा न हो, तो लोजपा के अब तक घोषित प्रत्याशियों पर नजर डाल देखें।  यह लेख लिखे जाने तक पार्टी के 42 उम्मीदवारों के नाम सामने आए हैं, इनमें से एक भी भाजपा के खिलाफ नहीं लडे़गा, पर जेडी-यू के विरुद्ध 35 प्रत्याशी ताल ठोकेंगे। यही नहीं, नीतीश कुमार के फिर से सहबाला बने जीतन राम मांझी के छह उम्मीदवार भी उनके निशाने पर होंगे। इसी बीच रामविलास पासवान का निधन चिराग और उनके चाहने वालों के लिए भले ही अपूरणीय क्षति हो, पर यह भी सच है कि भावनाओं का ज्वार चुनावी दौर में पार्टियों को अक्सर लाभ पहुंचा जाता है।
इस दौरान एक और गठबंधन उभरा है, जो आरजेडी की अगुवाई वाले महागठबंधन की राह का रोड़ा साबित होगा। आरजेडी से असंतुष्ट उपेंद्र कुशवाहा ने मायावती, ओवैसी और पूर्व केंद्रीय मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव के साथ मिलकर यह व्यूह रचना रची है। कुशवाहा ने गुरुवार की शाम तक जो 42 प्रत्याशी घोषित किए हैं, उनमें से आधे से अधिक यानी 26 आरजेडी के खिलाफ खडे़ होंगे। इसका लाभ किसे होगा? ध्यान दिलाता चलूं, कुशवाहा कभी मोदी सरकार में मंत्री रह चुके हैं। 
सियासत घात-प्रतिघात और संघात का अटूट सिलसिला बन चुकी है।
इस जंग में एक ऐसी पार्टी भी मैदान में है, जो चुनाव से ऐन पहले उभरी है, पर उसकी नेता ने खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर रखा है। पुष्पम प्रिया चौधरी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में स्नातकोत्तर हैं और सिर्फ आधुनिक शिक्षा प्राप्त नौजवानों को टिकट दे रही हैं। पुष्पम प्रिया और उनकी महिला कार्यकर्ता गांवों में पहुंचकर ‘खोइंछा’ मांगती हैं। खोइंछा बिहार की ग्रामीण परंपरा में सुखद और समृद्ध भविष्य की मंगल कामना का प्रतीक है। इसे लेने वाली बेटी-बहू से यह अपेक्षा की जाती है कि जहां से खोइंछा मिल रहा है, वह वहां स्नेही भाव से बार-बार आए। ये लोग मतदाताओं से रोटी, कपड़ा और मकान से संबंधित मूलभूत प्रश्न पूछते हैं और इस बहाने उनके मन में छिपे असंतोष को हवा देने की कोशिश करते हैं। ये नौजवान लोग कुछ असर डाल पाएंगे या यह सोशल मीडिया का शगल भर होकर रह जाएगा?
अब तेजस्वी, चिराग और मुकेश सहनी जैसे युवा तुर्कों की समानता की चर्चा। इस वक्त ये भले ही गुत्थम-गुत्था हों, पर इनमें तमाम समानताएं हैं। ये तीनों मंडल आयोग की सोशल इंजीनिर्यंरग की अगली पीढ़ी के प्रतीक हैं। ये खाते-पीते लोग हैं। गरीबी से इनका कोई वास्ता नहीं रहा। सहनी भले ही मुंबई के कारोबार से फिलहाल अवकाश लेकर राजनीति में आए हों, पर चिराग और तेजस्वी को राजनीति विरासत में मिली है। अब देखना यह है कि वे इस विरासत को आगे बढ़ा पाते हैं या नहीं।
इस प्रश्न की सबसे बड़ी वजह यह है कि सामने नीतीश कुमार हैं। उन्हें नापसंद करने वाले लोग भी अपनी माटी और मानुस के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को नकार नहीं पाते। कुछ अंतराल को छोड़ दें, तो उन्होंने बिहार में लगभग 15 वर्षों तक हुकूमत की है। इस दौरान उन्होंने महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए पंचायतों और स्थानीय निकायों में 50 फीसदी आरक्षण दिया। सरकारी विभागों में उन्होंने महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत नौकरियां आरक्षित की हैं। इन नौकरियों को हासिल करने के लिए बच्चियां पढ़ सकें, इसके लिए उन्होंने मुफ्त साइकिलें वितरित कराईं। यही नहीं, ग्रामीण गृहणियों की मांग पर उन्होंने शराबबंदी का जोखिम तक मोल लिया। इनके अलावा, सड़क, कृषि, ग्रामीण-विद्युतीकरण, जल-नल योजना, बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड आदि जैसे फैसले उन्हें औरों से अलग करते हैं।
यह बात अलग है कि लंबा शासनकाल कुछ नए सवाल पैदा करता है। राज्य की जीडीपी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी के बावजूद वह औद्योगीकरण को विस्तार नहीं दे सके, नतीजतन बिहार में बेरोजगारी के आंकडे़ चौंकाने वाले हैं। सीएमआईई के मुताबिक, जनवरी 2016 में प्रदेश में बेरोजगारी दर जहां 4.4 प्रतिशत थी, वहीं वह अप्रैल 2020 में बढ़कर 46.6 फीसदी हो गई। इन आंकड़ों का इस चुनाव में उनके विरोधी प्रयोग कर सकते हैं, पर इसके बावजूद वह सबसे मजबूत गठबंधन के नेता हैं और इस नाते छठी बार मुख्यमंत्री की कुरसी के प्रबलतम दावेदार भी। उनकी चर्चा सबसे बाद में करने का मकसद यही था कि कोई भी बिहार-कथा बिना उनके खत्म नहीं होती।
आज जय प्रकाश नारायण की जयंती है और इसलिए एक टीस भी उभर रही कि पिछले तीन दशकों से उनके आंदोलन से उपजे लोग सत्ता का रथ हांक रहे हैं, पर बिहार क्या वहां पहुंचा है, जहां पहुंचना चाहिए था? क्या बुजुर्ग जेपी ने इसलिए लाठी खाई थी?

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  • Web Title:hindustan aajkal column by shashi shekhar 11th october 2020