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भुट्टो की फांसी जो फांस बनी

इस निर्णय ने कई सवाल खडे़ कर दिए हैं, जिनमें सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि न्यायिक पवित्रता की रक्षा कैसे की जाए? अगर अदालतें आजाद नहीं होंगी या न्यायाधीश निष्पक्षता नहीं बरतेंगे, तो आम आदमी को न्याय...

भुट्टो की फांसी जो फांस बनी
Shashi Shekhar शशि शेखरSat, 09 Mar 2024 08:37 PM
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पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार यह मान ही लिया कि पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को इंसाफ नहीं मिला था। लगभग 44 साल पहले सात न्यायाधीशों की जिस पीठ ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी, उसने कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। यह फैसला क्या कहता है?
यकीनन, भुट्टो साहब तो दोबारा जिंदा नहीं हो सकते, पर इससे राजनीति, राजनेताओं और अदालतों की दुरभि-संधियों का खुलासा जरूर होता है। सन् 1970 के दशक में पाकिस्तान के सियासी हालात पर नजर रखने वालों के बीच यह चर्चा आम थी कि मुल्क के नए तानाशाह जनरल जियाउल हक किसी भी कीमत पर भुट्टो से छुटकारा पाना चाहते हैं। वह सीधे किसी कार्रवाई को अंजाम देते, तो बगावत के शोले भड़क सकते थे, इसलिए उन्होंने कानूनी प्रक्रिया की आड़ लेना उचित समझा। पुरानी कहावत है- ‘सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।’ जनरल जिया इसकी जीती जागती मिसाल थे। उनकी लाठी द्वारा हांकी जा रही सत्ता इस शर्मनाक खेल को अंजाम देने के बावजूद पूरे एक दशक तक निर्विघ्न तौर पर चलती रही। हालांकि, बाद में वह खुद एक विमान हादसे का शिकार हुए, जिसे तमाम लोग सोची-समझी साजिश मानते हैं। जो दूसरों के लिए गड्ढे खोदते हैं, वे खुद भी देर-सबेर किसी गड्ढे में ही पाए जाते हैं।
पाकिस्तान अपने जन्म से ही षड्यंत्रों और नापाक गठजोड़ों का शिकार रहा है। ऐसा न होता, तो जनता की अदालत में नेता नंबर वन साबित हुए इमरान खान सलाखों के पीछे न होकर प्रधानमंत्री की कुरसी पर बैठे होते, लेकिन आज हम भुट्टो की बात कर रहे हैं। मैं आपको संक्षेप में उन दिनों के समूचे घटनाक्रम से अवगत कराना चाहूंगा।
वह साल 1977 था, जब पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल जियाउल हक ने कभी अपने आका रहे जुल्फिकार अली भुट्टो को दरबदर कर हुकूमत कब्जा ली थी। भुट्टो साहब गिरफ्तार कर लिए गए थे, उन पर नवाब मोहम्मद अहमद खान कसूरी की हत्या के लिए उकसाने का इल्जाम था। रीति और कुरीति, दोनों मामलों में बेहद काइयां जिया समझ गए थे कि वह अपने मनसूबों को लोकतांत्रिक तरीकों से अंजाम नहीं दे पाएंगे। यही वजह है कि उन्होंने मार्शल लॉ लगा दिया था। बताने की जरूरत नहीं कि मार्शल लॉ में सेना के पास असीमित शक्ति आ जाती है। 
मार्शल लॉ लगते ही भुट्टो पर जारी मुकदमे ने रफ्तार पकड़ ली। सिर्फ दो साल के भीतर सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय बेंच ने उन्हें फांसी की सजा सुना दी थी। 4 अप्रैल, 1979 को रावलपिंडी जेल में इस फैसले को अमल में ले आया गया। बाद में फांसी की सजा को अंजाम देने वाले एक अधिकारी ने अपने इंटरव्यू के दौरान बताया था कि भुट्टो जेल में लगातार कहते रहते थे कि मैं बेकुसूर हूं। जब उन्हें फांसी के लिए ले जाया जा रहा था, तब वह यही कहते हुए अपने पलंग से चिपक गए थे। उन्हें जबरन उठाकर फांसी के तख्ते तक ले जाना पड़ा था।
इस दुर्दांत कारनामे के 32 साल बाद समय ने करवट ली और जुल्फिकार अली भुट्टो के दामाद आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति पद पर विराज गए। सन् 2011 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक याचिका पेश की, जिसमें भुट्टो को सजा-ए-मौत सुनाने वाले फैसले की समीक्षा का निवेदन किया गया था। पाकिस्तान का संविधान वहां के राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि जनहित से जुड़े किसी भी मामले की समीक्षा अथवा राय के लिए वह आला अदालत से आग्रह कर सकता है। गुजरे हफ्ते बुधवार को पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय पीठ ने भुट्टो से संबंधित यह फैसला सुनाया। इस निर्णय ने कई सवाल खडे़ कर दिए हैं, जिनमें सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि न्यायिक पवित्रता की रक्षा कैसे की जाए? अगर अदालतें आजाद नहीं होंगी या न्यायाधीश निष्पक्षता नहीं बरतेंगे, तो आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा? यहां तो मामला अपने समय की सबसे चमकदार शख्सियत का है। भुट्टो ने अपने कालखंड में इस उप-महाद्वीप में निर्णायक भूमिका अदा की थी। आज तक उनका शुमार इस उप-महाद्वीप के सबसे करिश्माई नेताओं में होता है। जब वह नाइंसाफी का शिकार हो सकते हैं, तो फिर साधारण जन का क्या!
संयोगवश, कुछ इसी तरह के सवाल इस समय भारत में भी उठ रहे हैं। भुट्टो पर जिस दिन फैसला आया, उससे ठीक एक दिन पहले कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अभिजीत गंगोपाध्याय ने इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता हासिल कर ली। चर्चा है कि वह लोकसभा का अगला चुनाव लड़ेंगे। अगले दिन जस्टिस गंगोपाध्याय का एक बयान सामने आया। उन्होंने कहा, ‘मैंने न्यायाधीश रहते हुए कभी राजनीति नहीं की है। मैंने कभी भी कोई ऐसा निर्णय नहीं दिया, जो राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण हो। मैंने जो निर्णय दिया, जो भी आदेश पारित किया, वह हमेशा मेरे सामने रखे गए तथ्यों के आधार पर था। यदि कोई अत्यधिक भ्रष्ट है और उसका भ्रष्टाचार किसी जज के सामने साबित हो जाता है, तो जज हमेशा उचित एजेंसी द्वारा इसकी जांच सुनिश्चित कराने के लिए आदेश देगा। मैंने भी वही किया है। यह किसी भी पार्टी के पक्ष में नहीं है।’
इससे पहले देश के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अवकाश प्राप्त करते ही जब राज्यसभा की सदस्यता हासिल कर ली थी, तब भी ऐसे ही सवाल उठे थे। न्यायमूर्तियों, सेना के उच्च पदस्थ अधिकारियों और सांविधानिक पदों पर आसीन लोग सेवा से मुक्ति के बाद क्या करें, क्या न करें, इस पर हमारा संविधान खामोश है। इसका मतलब साफ है कि कोई भी अपनी नौकरी खत्म होने के बाद जो चाहे, सो करने को स्वतंत्र है, लेकिन कोई भी पद, जिसमें असीम सत्ता निहित हो, नैतिकता के बिना अधूरा होता है। मैं यह नहीं कह रहा कि राजनीति में आने का मतलब अनैतिक हो जाना है, फिर भी सांविधानिक पदों पर लोगों को अपने लिए कुछ नैतिक मानदंड स्थापित करने चाहिए। 
भुट्टो के साथ जो कुछ हुआ, वह दर्शाता है कि नैतिकता के बिना सत्ता अराजक, और संविधान उस अराजकता का हथियार बन जाता है। यह खतरनाक है। 
यह नेक काम तभी हो सकता है, जब समाज और राजनीति इस पर मिलकर काम करें। इसके लिए राजनेताओं को खुद जिम्मेदार और जवाबदेह बनना पड़ेगा, पर वे इसका उल्टा कर रहे हैं। आज तृणमूल कांग्रेस के जो नेता अभिजीत गंगोपाध्याय पर प्रश्न उठा रहे हैं, उन्हें खुद भी अपने अंदर झांकना चाहिए। संदेशखाली का खलनायक शाहजहां शेख उनकी पार्टी का महत्वपूर्ण मनसबदार हुआ करता था। वे उसके कुकृत्यों से आंख क्यों फेरे हुए थे? आज भी वे उस पर परदा डालने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? 
इन सवालों पर गंभीरता से विचार करने के लिए आजकल से बेहतर कोई वक्त नहीं हो सकता। हमारा देश इस समय आम चुनाव से गुजर रहा है। वोट मांगने वाले और वोट देने वाले इस अवसर का लाभ क्यों नहीं उठाते?  

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