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मौसम जब मौत का कारण बन जाए

अब युद्ध-स्तर पर काम करने का समय आ गया है। भरोसा न हो, तो किसी सुबह उठकर घर से बाहर निकलिए और गहरी सांस लेने की कोशिश कीजिए, आपको सब समझ में आ जाएगा। हम प्रकृति की पैदाइश हैं। हमें बचाए और बनाए...

मौसम जब मौत का कारण बन जाए
Shashi Shekharशशि शेखरSat, 09 Dec 2023 08:42 PM
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आंख खोलते ही सबसे पहले खिड़की का परदा हटाने की आदत है, ताकि सूरज की रोशनी रात की खुमारी दूर कर सके। आजकल ऐसा नहीं हो पा रहा। शीशे के उस पार सूर्य की उजली किरणों की जगह सिर्फ और सिर्फ वायु प्रदूषण की गहरी मोटी परत दिखाई पड़ती है। मेरे जैसे हजारों आशावादियों के सबेरे इसीलिए इन दिनों आशा की जगह निराशा के प्रतीक बन गए हैं।
यह अभिशाप दिल्ली अथवा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अकेला नहीं भोग रहा, हमारे देश के बडे़ हिस्से की हवा जहरीली हो गई है। एक शोध के अनुसार, भारत में हर साल 21 लाख लोग सिर्फ वायु प्रदूषण जनित रोगों से असमय मर जाते हैं। चीन इस मामले में भी हमसे आगे है, पर शेष विश्व की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं। दुनिया में दूषित वायु 51 लाख जीवन लील जाती है। कोरोना के बाद इस रफ्तार में और तेजी आई है।  
इस वैश्विक महामारी के बाद दुनिया में जीवाश्म ईंधन की खपत में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई। अब यह वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण बन गया है, जिससे तापमान में जबरदस्त बढ़ोतरी हो रही है। यह अकारण नहीं है। गुजरता 2023 सवा लाख साल की लंबी इंसानी सभ्यता के दौर में सबसे गरम साल साबित होने जा रहा है। ‘यूनाइटेड नेशन एनवायर्नमेंट प्रोग्राम’ (यूएनईपी) के अनुसार, सदी के अंत तक हमारी धरती का तापमान ढाई से तीन डिग्री तक बढ़ सकता है। वह जब बढे़गा, तब बढे़गा, लेकिन बला की गरमी अभी से लोगों की जिंदगियां लील रही है। बेतहाशा बढ़ती गरमी की वजह से बुजुर्गों की मौत के मामले में पिछले तीन दशकों में 85 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है।  
इसके चलते लोग जलावतनी तक के लिए मजबूर हो रहे हैं। हालांकि, अभी यह प्रवृत्ति शुरुआती दौर में है, मगर हालात और बिगडे़, तो संसार के तमाम देशों को शरणार्थियों की नई खेप के लिए तैयार रहना होगा। ऐसा नहीं है कि सिर्फ हवा की गुणवत्ता और गरमी पर दुष्प्रभाव पड़ा है, अब हर मौसम चरम पर पहुंचने लगा है। हमारा अपना देश साल के शुरुआती नौ महीनों में लगभग हर दिन मौसमी ज्यादतियों का गवाह बना है। भारतीयों की कुल आबादी में 80 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो आए दिन जलवायु असंतुलन से प्रभावित हो रहे हैं। पिछले एक साल के दौरान बेंगलुरु, विशाखापट्टनम और ठाणे जैसे शहर इससे बेतरह आक्रांत हुए। कभी इनको अपनी अच्छी आब-ओ-हवा के लिए जाना जाता था।

मौसम का बेमौसमी परिवर्तन सिर्फ हमारे या आपके स्वास्थ्य पर असर नहीं डाल रहा, बल्कि उसकी मार जेब पर भी पड़ रही है। पिछले साल मौसम की ज्यादती के कारण दुनिया में 360 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। अर्थशा्त्रिरयों का अनुमान है कि अगर इसे रोकने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो अगले 25 से 30 सालों में वैश्विक जीडीपी में सालाना 4.4 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। यह आर्थिक बदहाली भय, भूख और गरीबी को बढ़ावा देगी। नतीजतन, करोड़ों लोगों की जिंदगियां छिन्न-भिन्न हो जाएंगी। यहां यह भी गौरतलब है कि शेष दुनिया की तुलना में दक्षिण एशिया को तीन गुना ज्यादा नुकसान झेलना पड़ सकता है। दुर्भाग्य से हम और आप धरती के इसी बदनसीब हिस्से में बसते हैं।  
धरती के बाशिंदों के भोजन के लिए किसान को अन्न उपजाना पड़ता है। कृषि के लिए जमीन के बाद अगर कुछ सर्वाधिक जरूरी है, तो वह है जल। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हम जितना जल धरती से खींचते हैं, उसका 70 फीसदी सिर्फ कृषि कार्यों में लग जाता है। यही हाल रहा, तो अगले दो सालों में दुनिया अकल्पनीय भूजल संकट से दो-चार होने जा रही है।  
हमारे अपने देश भारत के तमाम महानगर अभी से इस संकट से दो-चार हो रहे हैं। वह दिन दूर नहीं, जब हमें पानी की राशनिंग और उसकी कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी का सामना करना पड़ सकता है। गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कावेरी, कृष्णा और गोदावरी जैसी सदानीराओं के देश की संतानें अभी तक इस मसले पर अनमनी आत्मघाती तंद्रा की जकड़ में हैं। वे इतनी छोटी सी बात भूल गई हैं कि सिर्फ 1990 के दशक तक मंझोले-छोटे शहरों और गांवों में कोई बोतल बंद पानी खरीदने की सोच भी नहीं सकता था। भारत में बोतल बंद जल का पहला प्लांट वर्ष 1965 में ठाणे में स्थापित किया गया था। तब किसी ने सोचा भी न था कि गंगा-यमुना के देश में पांच दशक बीतते न बीतते वह हमारी जिंदगी की जरूरत बन जाएगा।
मुफ्त और शुद्ध पेयजल तेजी से अतीत की बात होता जा रहा है।  

रही बात कल-कल बहती नदियों की, तो वे खुद इतिहास का विषय बनती जा रही हैं। समूची दुनिया की नदियों के बहाव में कमी दर्ज की जा रही है। वे तेजी से अपना रास्ता भी बदल रही हैं। पिछले वर्ष नदियों के सामान्य प्रवाह में पचास फीसदी से अधिक परिवर्तन दर्ज किया गया है। इसके साथ ही साठ फीसदी जलाशयों में कम या सामान्य प्रवाह दर्ज किया गया। क्या अब भी कोई मानेगा कि यह संकट आज नहीं, तो कल खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगा?  
यहां एक आश्चर्यजनक तथ्य से भी आपको रू-ब-रू कराना चाहूंगा। समूची दुनिया में जैसे-जैसे आर्थिक असमानता बढ़ रही है, वैसे-वैसे ही धनकुबेरों द्वारा कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ रहा है। एक शोध के अनुसार, दुनिया के एक फीसदी अमीर जितना कार्बन उत्सर्जन एक वर्ष में करते हैं, उतने के लिए समूची धरती के निर्धनों को पंद्रह सौ वर्ष काम करना होगा। यही वैषम्य अमीर और गरीब मुल्कों के बीच में भी पाया जाता है। आज जो विकसित देश विकासशील देशों पर तरह-तरह के अंकुश डालना चाहते हैं, वे ही मुख्य तौर पर इस वैश्विक आपदा के जिम्मेदार हैं।  
हालांकि, अब दोष देने का नहीं, बल्कि युद्ध-स्तर पर काम करने का समय आ गया है। भरोसा न हो, तो किसी सुबह उठकर घर से बाहर निकलिए और गहरी सांस लेने की कोशिश कीजिए, आपको सब समझ में आ जाएगा। हम प्रकृति की पैदाइश हैं। हमें बचाए और बनाए रखने के लिए उसने पानी, हवा, उजाला, वृक्ष और फसलें उपलब्ध कराईं, अगर आज वे खतरे में हैं, तो मान लीजिए कि आप सर्वाधिक संकट में हैं। 


@shekharkahin
@shashishekhar.journalist

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